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Rigveda / 6 / 75 / 6

रथे॒ तिष्ठ॑न्नयति वा॒जिनः॑ पु॒रो यत्र॑यत्र का॒मय॑ते सुषार॒थिः। अ॒भीशू॑नां महि॒मानं॑ पनायत॒ मनः॑ प॒श्चादनु॑ यच्छन्ति र॒श्मयः॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 75 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : पायुर्भारद्वाजः | देवता : सारथिः, रश्मयः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर वीरजन किसके तुल्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : रथे॑। तिष्ठ॑न्। न॒य॒ति॒। वा॒जिनः॑। पु॒रः। यत्र॑ऽयत्र। का॒मय॑ते। सु॒ऽसा॒र॒थिः। अ॒भीशू॑नाम्। म॒हि॒मान॑म्। प॒ना॒य॒त॒। मनः॑। प॒श्चात्। अनु॑। य॒च्छ॒न्ति॒। र॒श्मयः॑ ॥६॥

पदार्थ : हे विद्वान् वीरपुरुषो ! जैसे (सुषारथिः) अच्छा सारथि (रथे) रथ पर (तिष्ठन्) स्थित होता हुआ (यत्रयत्र) जहाँ-जहाँ (पुरः) पहिले (कामयते) कामना करता है वहाँ-वहाँ (वाजिनः) वेगवाले अश्वों की (नयति) प्राप्ति कराता है, जैसे (रश्मयः) किरणें सूर्य के (पश्चात्) पीछे (अनु, यच्छन्ति) अनुकूल नियम से जाती हैं, वैसे वहाँ-वहाँ (अभीशूनाम्) बाहुओं की (महिमानम्) महिमा को (मनः) और चित्त को तुम (पनायत) व्यवहार में लाओ वा उनकी स्तुति करो ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा आदि वीरपुरुषो ! तुम जितेन्द्रिय होकर अपने कार्य के पार रथ से अच्छे सारथी के समान जाओ तथा प्रधान के अनुकूल जानेवाले बड़े व्यवहार को करके सुन्दर शिक्षा को भृत्यों को पहुँचा कर कामसिद्धि करो ॥६॥