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Rigveda / 6 / 75 / 7

ती॒व्रान्घोषा॑न्कृण्वते॒ वृष॑पाण॒योऽश्वा॒ रथे॑भिः स॒ह वा॒जय॑न्तः। अ॒व॒क्राम॑न्तः॒ प्रप॑दैर॒मित्रा॑न् क्षि॒णन्ति॒ शत्रूँ॒रन॑पव्ययन्तः ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 6 | Sukta : 75 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : पायुर्भारद्वाजः | देवता : अश्वाः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य किन से किन्हें जीतें, इस विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : ती॒व्रान्। घोषा॑न्। कृ॒ण्व॒ते॒। वृष॑ऽपाण॒यः। अश्वाः॑। रथे॑भिः। स॒ह। वा॒जय॑न्तः। अ॒व॒ऽक्राम॑न्तः। प्रऽप॑दैः। अ॒मित्रा॑न्। क्षि॒णन्ति॑। शत्रू॑न्। अन॑पऽव्ययन्तः ॥७॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (प्रपदैः) अति उत्तम गमनों से (अवक्रामन्तः) इधर-उधर जाते और (अनपव्ययन्तः) व्यर्थ खर्च को न प्राप्त होते हुए तथा (रथेभिः) रमणीय यानों के (सह) साथ (वाजयन्तः) आप जाते वा दूसरों को ले जाते हुए (वृषपाणयः) वृष के समान व्यवहार जिनका वे (अश्वाः) घोड़े वा अग्नि आदि पदार्थ (तीव्रान्) तीक्ष्ण (घोषान्) शब्दों को (कृण्वते) करते हैं और (अमित्रान्) वैर करते हुए (शत्रून्) शत्रुजनों को (क्षिणन्ति) क्षीण करते हैं, उनको तुम क्षीण करो ॥७॥

भावार्थ : हे राजपुरुषो ! तुम घोड़ों को अच्छे प्रकार शिक्षा देकर तथा अग्नि आदि का संप्रयोग और शत्रुओं को आक्रमण कर जीतो ॥७॥