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Rigveda / 7 / 3 / 3

उद्यस्य॑ ते॒ नव॑जातस्य॒ वृष्णोऽग्ने॒ चर॑न्त्य॒जरा॑ इधा॒नाः। अच्छा॒ द्याम॑रु॒षो धू॒म ए॑ति॒ सं दू॒तो अ॑ग्न॒ ईय॑से॒ हि दे॒वान् ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 3 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर विद्वान् बिजुली से क्या सिद्ध करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : उत्। यस्य॑। ते॒। नव॑ऽजातस्य। वृष्णः॑। अग्ने॑। चर॑न्ति। अ॒जराः॑। इ॒धा॒नाः। अच्छ॑। द्याम्। अ॒रु॒षः। धू॒मः। ए॒ति॒। सम्। दू॒तः। अ॒ग्ने॒। ईय॑से। हि। दे॒वान् ॥३॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्युत् अग्नि के तुल्य गुप्त प्रतापवाले ! (यस्य) जिस (नवजातस्य) नवीन प्रकट हुए (वृष्णः) विद्या से बलवान् (ते) आप विद्वान् के निकटवर्ती जैसे (अग्ने) प्रसिद्ध अग्नि के तुल्य कार्यसाधक (इधानाः) प्रकाशमान जलते हुए (अजराः) खर्चरहित अग्नि (उत्, चरन्ति) ऊपर को उठते वा चलते हैं (अरुषः) गर्भस्थ पुरुष (द्याम्) प्रकाश को प्राप्त होकर जिसका (धूमः) धुआँ (अच्छा, एति) अच्छा जाता है जो (दूतः) दूत के तुल्य (देवान्) विद्वानों को प्राप्त होता, जब उसको (हि) ही आप (सम्, ईयसे) प्राप्त होते हो, तब कार्य करने को समर्थ होते हो ॥३॥

भावार्थ : हे विद्वन् ! यदि आप विद्युत् की विद्या को जानें तो आप किस-किस कार्य को सिद्ध न कर सकें ॥३॥