Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 3 / 4

वि यस्य॑ ते पृथि॒व्यां पाजो॒ अश्रे॑त्तृ॒षु यदन्ना॑ स॒मवृ॑क्त॒ जम्भैः॑। सेने॑व सृ॒ष्टा प्रसि॑तिष्ट एति॒ यवं॒ न द॑स्म जु॒ह्वा॑ विवेक्षि ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 3 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह विद्युत् कैसी है और कैसे प्रकट करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : वि। यस्य॑। ते॒। पृ॒थि॒व्याम्। पाजः॑। अश्रे॑त्। तृ॒षु। यत्। अन्ना॑। स॒म्ऽअवृ॑क्त। जम्भैः॑। सेना॑ऽइव। सृ॒ष्टा। प्रऽसि॑तिः। ते॒। ए॒ति॒। यव॑म्। न। द॒स्म॒। जु॒ह्वा॑। वि॒वे॒क्षि॒ ॥४॥

पदार्थ : हे (दस्म) दुःखों के नाश करनेहारे विद्वन् ! जिस (जुह्वा) होमसाधन से (यवम्) यवों को (न) जैसे, वैसे विद्युद्विद्या को (विवेक्षि) व्याप्त होते हो वह (ते) तुम्हारी (सृष्टा) प्रयुक्त क्रिया (प्रसितिः) प्रबल बन्धन होती हुई (सेनेव) सेना के तुल्य (एति) प्राप्त होती है और (यत्) जो (जम्भैः) गात्रविक्षेपों से (अन्ना) अन्नों को (समवृक्त) अच्छे प्रकार वर्जित करता अर्थात् शरीर से छुड़ाता है (यस्य) जिस (ते) उस विद्युत् के (पाजः) बल को (पृथिव्याम्) पृथिवी में (तृषु) शीघ्र (वि, अश्रेत्) आश्रय करता है, उसको तुम जानो ॥४॥

भावार्थ : जो विद्वान् लोग विद्युद्विद्या को जानते हैं, वे उत्तम सेना के तुल्य शत्रुओं को शीघ्र जीत सकते हैं। जैसे घी आदि से अग्नि प्रज्वलित होता, वैसे घर्षण आदि से विद्युत् अग्नि प्रकट करना चाहिये ॥४॥