Rigveda / 7 / 4 / 3
अ॒स्य दे॒वस्य॑ सं॒सद्यनी॑के॒ यं मर्ता॑सः श्ये॒तं ज॑गृ॒भ्रे। नि यो गृभं॒ पौरु॑षेयीमु॒वोच॑ दु॒रोक॑म॒ग्निरा॒यवे॑ शुशोच ॥३॥
Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 4 | Mantra No : 3
In English:
Seer : vasiShThaH | Devta : agniH | Metre : bhurikpa~NktiH | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : asya devasya sa.msadyaniike ya.m martaasaH shyeta.m jagRRibhre. ni yo gRRibha.m pauruSheyiimuvocha durokamagniraayave shushocha .3.
Component Words : asya. devasya. sam.asadi. aniike. yam. martaasaH. shyetam. jagRRibhre. ni. yaH. gRRibham. pauruSheyiim. uvocha. duH.aokam. agniH. aayave. shushocha .3.
In Hindi:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर कैसे विद्वान् को सभासद् और अध्यक्ष करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : अ॒स्य। दे॒वस्य॑। स॒म्ऽसदि॑। अनी॑के। यम्। मर्ता॑सः। श्ये॒तम्। ज॒गृ॒भ्रे। नि। यः। गृभ॑म्। पौरु॑षेयीम्। उ॒वोच॑। दुः॒ऽओक॑म्। अ॒ग्निः। आ॒यवे॑। शु॒शो॒च॒ ॥३॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (पौरुषेयीम्) पुरुषसम्बन्धी कार्य्यों की रीति का (नि गृभम्) निरन्तर ग्रहण करने को (उवोच) कहता है (अग्निः) अग्नि के तुल्य तेजस्वी (आयवे) जीवन के लिये (शुशोच) शोच करता है (यम्) जिस (श्येतम्) श्वेत (दुरोकम्) शत्रुओं से दुःख के साथ सेवने योग्य को (अस्य) इस (देवस्य) विद्वान् की (संसदि) सभा वा (अनीके) सेना में (मर्त्तासः) मनुष्य (जगृभ्रे) ग्रहण करते हैं, उसी को सभापति सेनापति करो ॥३॥
भावार्थ : विद्वानों को चाहिये कि अच्छे प्रकार परीक्षा कर सभासदों और अध्यक्षों को नियत करें। जो बलवान् और अधिक अवस्थावाले हों, वे ही राज्य को अच्छे प्रकार भूषित कर सकते हैं ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनर्विद्वांसं कीदृशं सभ्यमध्यक्षं च कुर्य्युरित्याह ॥
पदपाठ : अ॒स्य। दे॒वस्य॑। स॒म्ऽसदि॑। अनी॑के। यम्। मर्ता॑सः। श्ये॒तम्। ज॒गृ॒भ्रे। नि। यः। गृभ॑म्। पौरु॑षेयीम्। उ॒वोच॑। दुः॒ऽओक॑म्। अ॒ग्निः। आ॒यवे॑। शु॒शो॒च॒ ॥३॥
पदार्थ : (अस्य) (देवस्य) विदुषः (संसदि) सभायाम् (अनीके) सैन्ये (यम्) (मर्त्तासः) मनुष्याः (श्येतम्) श्वेतं शुभ्रम् (जगृभ्रे) गृह्णन्ति (नि) (यः) (गृभम्) गृहीतुम् (पौरुषेयीम्) पौरुषेयस्य रीतिम् (उवोच) वदति (दुरोकम्) शत्रुभिर्दुःसेवम् (अग्निः) पावक इव (आयवे) जीवनाय (शुशोच) शोचति ॥३॥
अन्वय : हे मनुष्या ! यः पौरुषेयीं निगृभमुवोचाग्निरिवाऽऽयवे शुशोच यं श्येतं दुरोकमस्य देवस्य संसद्यनीके च मर्त्तासो जगृभ्रे तमेव सभ्यं सेनापतिं च कुरुत ॥३॥
भावार्थ : विद्वद्भिः सुपरीक्ष्य विद्वांस एव सभ्या अध्यक्षाश्च कर्त्तव्याः ये वीर्य्यवन्तो दीर्घायुषो भवन्ति त एव राज्यं सुभूषयितुमर्हन्ति ॥३॥