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Rigveda / 7 / 4 / 4

अ॒यं क॒विरक॑विषु॒ प्रचे॑ता॒ मर्ते॑ष्व॒ग्निर॒मृतो॒ नि धा॑यि। स मा नो॒ अत्र॑ जुहुरः सहस्वः॒ सदा॒ त्वे सु॒मन॑सः स्याम ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 4 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : कौन विद्वान् अधिक कर विश्वास के योग्य हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒यम्। क॒विः। अक॑विषु। प्रऽचे॑ताः। मर्ते॑षु। अ॒ग्निः। अ॒मृतः॑। नि। धा॒यि॒। सः। मा। नः॒। अत्र॑। जु॒हु॒रः॒। स॒ह॒स्वः॒। सदा॑। त्वे इति॑। सु॒ऽमन॑सः। स्या॒म॒ ॥४॥

पदार्थ : हे (सहस्वः) प्रशस्त बलवाले ! जो (अयम्) प्रत्यक्ष आप (अकविषु) न्यून बुद्धिवाले अविद्वानों में (कविः) तीव्र बुद्धियुक्त विद्वान् (मर्त्तेषु) मनुष्यों में (प्रचेताः) चेत करानेवाले (अग्निः) विद्युत् अग्नि के तुल्य (अमृतः) अपने स्वरूप से नाशरहित पुरुष को (नि, धायि) धारण करते हैं (सः) सो आप (अत्र) इस व्यवहार में (नः) हमको (मा) मत (जुहुरः) मारिये जिससे हम लोग (त्वे) आप में (सुमनसः) सुन्दर प्रसन्न चित्तवाले (सदा) सदा (स्याम) होवें ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो यह दीर्घ ब्रह्मचर्य के साथ विद्वानों से विद्या को ग्रहण करता है, वही विद्वान् प्रशंसित बुद्धिवाला, मनुष्यों में महान् कल्याणकारी हो। उसके प्रति सब मनुष्य यदि मित्रता से वर्तें तो अविद्वान् भी बुद्धिमान् होवें ॥४॥