Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 7 / 15 / 6

सेमां वे॑तु॒ वष॑ट्कृतिम॒ग्निर्जु॑षत नो॒ गिरः॑। यजि॑ष्ठो हव्य॒वाह॑नः ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 15 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। इ॒माम्। वे॒तु॒। वष॑ट्ऽकृतिम्। अ॒ग्निः। जु॒ष॒त॒। नः॒। गिरः॑। यजि॑ष्ठः। ह॒व्य॒ऽवाह॑नः ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (सः) वह (यजिष्ठः) अत्यन्त यज्ञकर्त्ता (हव्यवाहनः) देने योग्य पदार्थों को प्राप्त होनेवाला (अग्निः) पावक अग्नि (नः) हमारी (इमाम्) इस (वषट्कृतिम्) शुद्ध क्रिया को और (गिरः) वाणियों को (वेतु) प्राप्त हो उसको तुम लोग (जुषत) सेवन करो ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो अग्नि सम्यक् प्रयुक्त किया हुआ हमारी क्रियाओं का सेवन करता वह तुम लोगों को सेवने योग्य है ॥६॥