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Rigveda / 7 / 15 / 7

नि त्वा॑ नक्ष्य विश्पते द्यु॒मन्तं॑ देव धीमहि। सु॒वीर॑मग्न आहुत ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 15 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : नि। त्वा॒। न॒क्ष्य॒। वि॒श्प॒ते॒। द्यु॒ऽमन्त॑म्। दे॒व॒। धी॒म॒हि॒। सु॒ऽवीर॑म्। अ॒ग्ने॒। आ॒ऽहु॒त॒ ॥७॥

पदार्थ : हे (नक्ष्य) व्याप्त वस्तुओं को उत्तम प्रकार जाननेवाले (आहुत) बहुतों से सत्कार को प्राप्त (विश्पते) प्रजारक्षक (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वि (देव) विद्वन् ! जिस (द्युमन्तम्) प्रकाशवाले (सुवीरम्) उत्तम वीर हों जिससे उस अग्नि के तुल्य शुद्ध (त्वा) आपको जैसे (नि, धीमहि) निरन्तर ध्यान करें, वैसे आप हमको निरन्तर आनन्द में स्थिर कीजिये ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे हम लोग आपको न्याय से राज्य पालनरूप व्यवहार में सदा स्थित करें, वैसे आप हमको धर्मयुक्त व्यवहार में प्रतिष्ठित कीजिये ॥७॥