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Rigveda / 7 / 22 / 3

बोधा॒ सु मे॑ मघव॒न्वाच॒मेमां यां ते॒ वसि॑ष्ठो॒ अर्च॑ति॒ प्रश॑स्तिम्। इ॒मा ब्रह्म॑ सध॒मादे॑ जुषस्व ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 22 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिगनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर मनुष्यों में कैसे वर्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : बोध॑। सु। मे॒। म॒घ॒ऽव॒न्। वाच॑म्। आ। इ॒माम्। याम्। ते॒। वसि॑ष्ठः। अर्च॑ति। प्रऽश॑स्तिम्। इ॒मा। ब्रह्म॑। स॒ध॒ऽमादे॑। जु॒ष॒स्व॒ ॥३॥

पदार्थ : हे (मघवन्) प्रशंसित धनवाले विद्वान् ! आप (याम्) जिस (ते) आपके विषय की (प्रशस्तिम्) प्रशंसित वाणी को (वसिष्ठः) अतीव वसनेवाला (आ, अर्चति) अच्छे प्रकार सत्कृत करता है (इमाम्) इस (मे) मेरी (वाचम्) वाणी को आप (सु, बोध) अच्छे प्रकार जानो उससे (सधमादे) एक से स्थान में (इमा) इन (ब्रह्म) धन वा अन्नों का (जुषस्व) सेवन करो ॥३॥

भावार्थ : वही विद्वान् उत्तम है, जो जिस प्रकार की उत्तम शास्त्र विषय में बुद्धि अपने लिये चाहे, उसी को औरों के लिये चाहे और जो-जो उत्तम अपने लिये पदार्थ हो, उसे पराये के लिये भी जाने ॥३॥