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Rigveda / 7 / 22 / 4

श्रु॒धी हवं॑ विपिपा॒नस्याद्रे॒र्बोधा॒ विप्र॒स्यार्च॑तो मनी॒षाम्। कृ॒ष्वा दुवां॒स्यन्त॑मा॒ सचे॒मा ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 22 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्ची पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर पढ़ने-पढ़ानेवाले परस्पर कैसे वर्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : श्रु॒धि। हव॑म्। वि॒ऽपि॒पा॒नस्य॑। अद्रेः॑। बोध॑। विप्र॒स्य। अर्च॑तः। म॒नी॒षाम्। कृ॒ष्व। दुवां॑सि। अन्त॑मा। सचा॑। इ॒मा ॥४॥

पदार्थ : हे परम विद्वान् ! आप (विपिपानस्य) विविध प्रकार के पीने जिस से बनें उस (अद्रेः) मेघ के समान (अर्चतः) सत्कार करते हुए (विप्रस्य) उत्तम बुद्धिवाले जन के (हवम्) शब्दसमूह को (श्रुधि) सुनो (मनीषाम्) उत्तम बुद्धि को (बोध) जानो और (इमा) इन (अन्तमा) समीपस्थ (दुवांसि) सेवनों को (सचा) सम्बन्ध करो ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे जिज्ञासु विद्यार्थी जनो ! तुम अपना पढ़ा हुआ परीक्षा लेनेवाले विद्वान् को सुनाओ, वहाँ वे जो उपदेश करें, उनका निरन्तर सेवन करो ॥४॥