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Rigveda / 7 / 57 / 5

कृ॒ते चि॒दत्र॑ म॒रुतो॑ रणन्तानव॒द्यासः॒ शुच॑यः पाव॒काः। प्र णो॑ऽवत सुम॒तिभि॑र्यजत्राः॒ प्र वाजे॑भिस्तिरत पु॒ष्यसे॑ नः ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 57 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वान् जन कैसे होकर क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : कृ॒ते। चि॒त्। अत्र॑। म॒रुतः॑। र॒ण॒न्त॒। अ॒न॒व॒द्यासः॑। शुच॑यः। पा॒व॒काः। प्र। नः॒। अ॒व॒त॒। सु॒म॒तिऽभिः॑। य॒ज॒त्राः॒। प्र। वाजे॑भिः। ति॒र॒त॒। पु॒ष्यसे॑। नः॒ ॥५॥

पदार्थ : हे विद्वान् जनो ! जैसे (अनवद्यासः) नहीं निन्दा करने योग्य और धर्म्माचरण से युक्त (शुचयः) पवित्र और (पावकाः) पवित्र करनेवाले (मरुतः) मनुष्य (चित्) भी (कृते) उत्तम कर्म्म में (अत्र) इस संसार में (रणन्त) रमें, वैसे (यजत्राः) मिलनेवाले हुए आप लोग (सुमतिभिः) उत्तम बुद्धिवाले मनुष्यों और (वाजेभिः) अन्न आदिकों के साथ (नः) हम लोगों की (प्र, अवत) रक्षा कीजिये और (नः) हम लोगों को (पुष्यसे) पुष्टि के लिये (प्र, तिरत) निष्पन्न कीजिये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो यथार्थवक्ता, धार्मिक, पवित्र, विद्वान् होके सब सबकी रक्षा करते हैं, वे सब को पुष्ट और सुखी कर सकते हैं ॥५॥