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Rigveda / 7 / 57 / 6

उ॒त स्तु॒तासो॑ म॒रुतो॑ व्यन्तु॒ विश्वे॑भि॒र्नाम॑भि॒र्नरो॑ ह॒वींषि॑। ददा॑त नो अ॒मृत॑स्य प्र॒जायै॑ जिगृ॒त रा॒यः सू॒नृता॑ म॒घानि॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 7 | Sukta : 57 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्या क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒त। स्तु॒तासः॑। म॒रुतः॑। व्य॒न्तु॒। विश्वे॑भिः। नाम॑ऽभिः। नरः॑। ह॒वींषि॑। ददा॑त। नः॒। अ॒मृत॑स्य। प्र॒ऽजायै॑। जि॒गृ॒त। रा॒यः। सू॒नृता॑। म॒घानि॑ ॥६॥

पदार्थ : हे (मरुतः) पवनों के सदृश मनुष्यो (नरः) अग्रणी ! आप लोग (विश्वेभिः) सम्पूर्ण (नामभिः) संज्ञाओं से (नः) हम लोगों के लिये हम लोगों के (हवींषि) देने योग्य पदार्थों को (ददात) दीजिये (उत) और (स्तुतासः) प्रशंसा को प्राप्त हुए जन देने योग्य द्रव्यों को (व्यन्तु) प्राप्त होवें, हम लोगों और (अमृतस्य) अविनाशी की (प्रजायै) प्रजा के सुख के लिये (रायः) शोभाओं वा लक्ष्मियों को और (सूनृता) धर्म्म से इकट्ठे किये गये (मघानि) धनों को (जिगृत) उगलिये ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो प्रशंसा करनेवाले मनुष्य सम्पूर्ण शब्द और अर्थ के सम्बन्धों से सम्पूर्ण विद्याओं को प्राप्त कर और शोभित होकर प्रजाजनों के लिये सत्य वचन को देते हैं, वे सम्पूर्ण सुख को प्राप्त होते हैं ॥६॥