Rigveda / 1 / 49 / 2
सु॒पेश॑सं सु॒खं रथं॒ यम॒ध्यस्था॑ उष॒स्त्वम् । तेना॑ सु॒श्रव॑सं॒ जनं॒ प्रावा॒द्य दु॑हितर्दिवः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 49 | Mantra No : 2
In English:
Seer : praskaNvaH kaaNvaH | Devta : uShaaH | Metre : nichRRidanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation Under Process
Verse : supeshasa.m sukha.m ratha.m yamadhyasthaa uShastvam . tenaa sushravasa.m jana.m praavaadya duhitardivaH .
Component Words : su.apeshasam . sukham . ratham . yam . adhi.aasthaaH . uShaH . tvam . tena . su.ashravasam . janam . pra . ava . adya . duhitaH . divaH.
In Hindi:
ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : उषाः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : फिर वह कैसी है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।
पदपाठ : सु॒ऽपेश॑सम् । सु॒खम् । रथ॑म् । यम् । अ॒धि॒ऽअस्थाः॑ । उ॒षः॒ । त्वम् । तेन॑ । सु॒ऽश्रव॑सम् । जन॑म् । प्र । अ॒व॒ । अ॒द्य । दु॒हि॒तः॒ । दि॒वः॒॥
पदार्थ : हे (दिवः) प्रकाशमान सूर्य्य की (दुहितः) पुत्री ही के तुल्य (उषः) वर्त्तमान स्त्रि ! तू (यम्) जिस (सुपेशसम्) सुन्दर रूप (सुखम्) आनन्दकारक (रथम्) क्रीड़ा के साधन यान से (अध्यस्थाः) ऊपर बैठने वाले प्राणी आनन्द को बढ़ाते हैं (तेन) उस रथ से (सुश्रवम्) उत्तम श्रवण युक्त (जनम्) विद्वान् मनुष्य की (प्राव) अच्छे प्रकार रक्षा आदि कर ॥२॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्य लोग जैसे सूर्य्य के प्रकाश से सुरूप की प्रसिद्धि होती है वैसे ही विदुषी स्त्री से घर का काम और पुत्रों की उत्पत्ति होती है ऐसा जानकर उनसे उपकार लेवें ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : उषाः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : (सुपेशसम्) सुन्दरस्वरूपम् (सुखम्) आनन्दकारकम् (रथम्) रमणसाधनं यानम् (यम्) वक्ष्यमाणम् (अध्यस्थाः) अध्युपरि तिष्ठन्तीत्यधस्थाः (उषः) उषर्वद्वर्त्तमाने (त्वम्) (तेन) रथेन (सुश्रवसम्) शोभनानि श्रवांसि श्रवणान्यस्मिन्प्रसादे यस्य तम् (जनम्) विद्वांसम् (प्र) प्रकृष्टार्थे (अव) रक्ष (अद्य) अस्मिन् दिने (दुहितः) पुत्रीव (दिवः) प्रकाशस्य ॥२॥
पदपाठ : सु॒ऽपेश॑सम् । सु॒खम् । रथ॑म् । यम् । अ॒धि॒ऽअस्थाः॑ । उ॒षः॒ । त्वम् । तेन॑ । सु॒ऽश्रव॑सम् । जन॑म् । प्र । अ॒व॒ । अ॒द्य । दु॒हि॒तः॒ । दि॒वः॒॥
पदार्थ : हे दिवो दुहितरुषर्वद्वर्त्तमाने स्त्रि ! त्वं यं सुपेशसं सुखं रथमध्यस्था येन जना आनन्दमेधन्ते तेन रथेनाद्य सुश्रवसं जनं प्राव ॥२॥
अन्वय : पुनः सा कीदृशीत्युपदिश्यते।
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। मनुष्यैर्यथा प्रकाशेन सुरूपप्रसिद्धिर्जायते तथा सौभाग्यकारिकया विदुष्या स्त्रिया गृहकृत्यसिद्धिरपत्योत्पत्तिश्च जायत इति विज्ञायोपकर्त्तव्यम् ॥२॥