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Rigveda / 1 / 49 / 3

वय॑श्चित्ते पत॒त्रिणो॑ द्वि॒पच्चतु॑ष्पदर्जुनि । उषः॒ प्रार॑न्नृ॒तूँरनु॑ दि॒वो अन्ते॑भ्य॒स्परि॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 49 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : उषाः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर वह कैसी है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

पदपाठ : वयः॑ । चि॒त् । ते॒ । प॒त॒त्रिणः॑ । द्वि॒पत् । चतुः॑ऽपत् । अ॒र्जु॒नि॒ । उषः॑ । प्र । आ॒र॒न् ऋ॒तून् । अनु॑ । दि॒वः । अन्ते॑भ्यः । परि॑॥

पदार्थ : हे स्त्रि ! जैसे (अर्जुनि) अच्छे प्रकार प्रयत्न का निमित्त (उषः) उषा (दिवः) सूर्य्यप्रकाश के (अन्तेभ्यः) समीप से (ऋतून्) ऋतुओं को सिद्ध और (द्विपत्) मनुष्यादि तथा (चतुष्पत्) पशु आदि का बोध कराती हुई सबको प्राप्त होके जैसे इससे (पतत्त्रिणः) नीचे ऊचे उड़नेवाले (वयः) पक्षी (प्रारन्) इधर उधर जाते (चित्) वैसे ही (ते) तेरे गुण हों ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालंकार है जैसे उषा मुहूर्त्त, प्रहर, दिन, मास, ऋतु, अयन अर्थात् दक्षिणायन और वर्षो का विभाग करती हुई सब प्राणियों के व्यवहार और चेतनता को करती है वैसे ही स्त्री सब गृहकृत्यों को पृथक्-२ करें ॥३॥