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Rigveda / 1 / 59 / 6

प्र नू म॑हि॒त्वं वृ॑ष॒भस्य॑ वोचं॒ यं पू॒रवो॑ वृत्र॒हणं॒ सच॑न्ते। वै॒श्वा॒न॒रो दस्यु॑म॒ग्निर्ज॑घ॒न्वाँ अधू॑नो॒त्काष्ठा॒ अव॒ शम्ब॑रं भेत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 59 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : अग्निर्वैश्वानरः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

पदपाठ : प्र। नु। म॒हि॒ऽत्वम्। वृ॒ष॒भस्य॑। वो॒च॒म्। यम्। पू॒रवः॑। वृ॒त्र॒ऽहन॑म्। सच॑न्ते। वै॒श्वा॒न॒रः। दस्यु॑म्। अ॒ग्निः। ज॒घ॒न्वान्। अधू॑नोत्। काष्ठाः॑। अव॑। शम्ब॑रम्। भे॒त् ॥

पदार्थ : (तम्) जिस परमेश्वर को (पूरवः) विद्वान् लोग अपने आत्मा के साथ (सचन्ते) युक्त करते हैं, जैसे (अग्निः) सर्वत्र व्यापक विद्युत् (वृत्रहणम्) मेघ के नाशकर्त्ता सूर्य को दिखलाती है, जैसे (वैश्वानरः) सम्पूर्ण प्रजा को नियम में रखनेवाला सूर्य्य (दस्युम्) डाकू के तुल्य (शम्बरम्) मेघ को (जघन्वान्) हनन (अधूनोत्) कँपाता (अवभेत्) विदीर्ण करता है, जिस के बीच में (काष्ठाः) दिशा भी व्याप्य है, उस (वृषभस्य) सब से उत्तम सूर्य के (महित्वम्) महिमा को मैं (नु) शीघ्र (प्रवोचम्) प्रकाशित करूँ, वैसे सब विद्वान् लोग किया करें ॥ ६ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस की महिमा को सब संसार प्रकाशित करता है, वही अनन्त शक्तिमान् परमेश्वर सबको उपासना के योग्य है ॥ ६ ॥