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Rigveda / 1 / 59 / 7

वै॒श्वा॒न॒रो म॑हि॒म्ना वि॒श्वकृ॑ष्टिर्भ॒रद्वा॑जेषु यज॒तो वि॒भावा॑। शा॒त॒व॒ने॒ये श॒तिनी॑भिर॒ग्निः पु॑रुणी॒थे ज॑रते सू॒नृता॑वान् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 59 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : अग्निर्वैश्वानरः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर अगले मन्त्र में ईश्वर के गुणों का उपदेश किया है ॥

पदपाठ : वै॒श्वा॒न॒रः। म॒हि॒म्ना। वि॒श्वऽकृ॑ष्टिः। भ॒रत्ऽवा॑जेषु। य॒ज॒तः। वि॒भाऽवा॑। शा॒त॒ऽव॒ने॒ये। श॒तिनी॑भिः। अ॒ग्निः। पु॒रु॒ऽनी॒थे। ज॒र॒ते॒। सू॒नृता॑ऽवान् ॥

पदार्थ : जो (विश्वकृष्टीः) सबका उत्पन्नकर्त्ता (यजतः) पूजन के योग्य (विभावा) विशेष करके प्रकाशमान (सूनृतावान्) प्रशंसनीय अन्नादि का आधार (वैश्वानरः) सबको प्राप्त करानेवाला (अग्निः) सूर्य्य के समान जगदीश्वर अपने जगद्रूप (महिम्ना) महिमा के साथ (भरद्वाजेषु) धारण करने वा जानने योग्य पृथिवी आदि पदार्थों में (शतिनीभिः) असंख्यात गतियुक्त क्रियाओं से सहित (पुरुणीथे) बहुत प्राणियों में प्राप्त (शातवनेये) असंख्यात विभागयुक्त क्रियाओं से सिद्ध हुए संसार में वर्त्तता है, उसका जो मनुष्य (जरते) अर्चन पूजन करता है, वह निरन्तर सत्कार को प्राप्त होता है ॥ ७ ॥

भावार्थ : जो असख्यात पदार्थों में असंख्यात क्रियाओं का हेतु बिजुलीरूप अग्नि के समान ईश्वर है, वही सब जगत् को धारण करता है, उसका पूजन जो मनुष्य करता है, वह सदा महिमा को प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ इस सूक्त में वैश्वानर शब्दार्थ वर्णन से इसके अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥