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Samveda/20

आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः पश्यन्ति वासरम्। परो यदिध्यते दिवि॥२०

Veda : Samveda | Mantra No : 20

In Hindi:

ऋषि : वत्सः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : योगी जन कब परमेश्वर की अलौकिक ज्योति का दर्शन करते हैं, इस विषय को कहते हैं।

पदपाठ : आत्। इत्। प्रत्नस्य। रेतसः। ज्योतिः। पश्यन्ति। वासरम्। परः।यत्। इध्यते। दिवि ।१०। आ.३३.अ.१३.पदं.११९.डो.दशति ।२।

पदार्थ : (आत् इत्) उसके अनन्तर ही (प्रत्नस्य) सनातन, (रेतसः) वीर्यवान् परमसामर्थ्यशाली परमात्म-सूर्य की (वासरम्) राग, द्वेष, मोह आदि के अन्धकार को दूर करनेवाली, अथवा अणिमा आदि ऐश्वर्यों की निवासक, अथवा दिव्य दिन उत्पन्न कर देनेवाली (ज्योतिः) ज्योति को—योगदर्शनोक्त ज्योतिष्मती वृत्ति को, ज्ञानदीप्ति को या (विवेकख्याति) को, योगीजन (पश्यन्ति) देख पाते हैं, (यत्) जब, वह परमात्म-सूर्य (परः) परे (दिवि) आत्मारूप द्युलोक में (इध्यते) प्रदीप्त हो जाता है ॥१०॥श्लेष से सूर्य के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए ॥१०॥

भावार्थ : जैसे प्रातःकाल उदित सूर्य जब मध्याह्न के आकाश में पहुँच जाता है, तभी लोग उसके अन्धकार-निवारक, देदीप्यमान, दिन को उत्पन्न करनेवाले सम्पूर्ण प्रभामण्डल को देख पाते हैं, वैसे ही जब योगियों से ध्यान किया गया परमात्मा उनके आत्म-लोक में जगमगाने लगता है, तभी वे उसके राग, द्वेष आदि के विनाशक, योगसिद्धियों के निवासक, जीवन्मुक्तिरूप दिन के जनक दिव्य प्रकाश का साक्षात्कार करने में समर्थ होते हैं ॥१०॥ इस दशति में परमात्मा के गुण-कर्म-स्वभाव का वर्णन करते हुए उसे रिझाने का, उसके प्रति नमस्कार करने का, उसे स्तोत्र अर्पण करने का, मनुष्यों को परमेश्वर की स्तुति के साथ-साथ कर्म में भी प्रेरित करने का और परम ज्योति के दर्शन का वर्णन है, अतः इस दशति के अर्थ की पूर्व दशति के अर्थ के साथ संगति है ॥प्रथम प्रपाठक, प्रथम अर्ध में द्वितीय दशति समाप्त ॥प्रथम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥