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Samveda/392

यस्य त्यच्छम्बरं मदे दिवोदासाय रन्धयन्। अय स सोम इन्द्र ते सुतः पिब॥३९२

Veda : Samveda | Mantra No : 392

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा के वीरतापूर्ण कर्म की प्रशंसा करते हुए उसका आह्वान किया गया है।

पदपाठ : यस्य। त्यत्। शंबरम्।शम्।बरम्। मदे। दिवोदासाय।दिवः।दासाय। रन्धयन्। अयम्। सः। सोमः। इन्द्र। ते । सुतः। पिब ।२ ।

पदार्थ : हे (इन्द्र) विघ्नविदारक परमात्मन् ! (यस्य) जिस पुरुषार्थमिश्रित भक्तिरूप सोमरस के (मदे) हर्ष में (दिवोदासाय) मन आदि को प्रकाश देनेवाले जीवात्मा की सहायता के लिए, आप (शम्बरम्) योगमार्ग में आये आनन्द और शान्ति के आच्छादक विघ्नसमूह को (रन्धयन्) विनष्ट करते हुए (त्यत्) प्रसिद्ध वीर कर्म को करते हो, (अयं सः) यह वह (सोमः) पुरुषार्थमिश्रित भक्तिरस (ते) आपके लिए (सुतः) अभिषुत है, उसका (पिब) पान करो ॥२॥

भावार्थ : पुरुषार्थपूर्ण भक्ति से आराधना किया गया परमेश्वर योगसाधक के मार्ग में आये हुए सब विघ्नों का निराकरण करके योगसिद्धि प्रदान करता है ॥२॥