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Samveda/548

सोमाः पवन्त इन्दवोऽस्मभ्यं गातुवित्तमाः। मित्राः स्वाना अरेपसः स्वाध्यः स्वर्विदः॥५४८

Veda : Samveda | Mantra No : 548

In Hindi:

ऋषि : मनुः सांवरणः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि कैसे परमानन्दरस हमें पवित्र करते हैं।

पदपाठ : सोमाः। पवन्ते। इन्दवः।अस्मभ्यम्। गातुवित्तमाः।गातु। वित्तमाः। मित्राः।मि।त्राःआ। स्वानाः। अरेपसः।अ।रेपसः। स्वध्यः।सु।आद्यः। स्वर्विदः।स्वः।विदः।४।

पदार्थ : (इन्दवः) प्रकाशमय अथवा रस से आर्द्र करनेवाले (सोमाः) परमानन्दरस (पवन्ते) हमें पवित्र करते हैं, जो (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (गातुवित्तमाः) अतिशय सन्मार्ग को प्राप्त करानेवाले, (मित्राः) मित्रभूत, (स्वानाः) सद्गुणों की ओर प्रेरित करनेवाले, (अरेपसः) निष्पाप, निष्कलङ्क, निर्दोष, (स्वाध्यः) उत्कृष्ट ध्यान में सहायक और (स्वर्विदः) मोक्ष प्राप्त करानेवाले हैं ॥४॥इस मन्त्र में अनेक साभिप्राय विशेषणों का योग होने से परिकरालङ्कार है ॥४॥

भावार्थ : जो ब्रह्मानन्दरस जीवन में सन्मार्ग दिखानेवाले, मित्र के सदृश परम उपकारक, शुभगुण-प्रेरक, ध्यान में सहायक और मोक्षप्रापक होते हैं, वे पवित्रता देनेवाले क्यों न होंगे ॥४॥