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Samveda/1110

इमा नु कं भुवना सीषधेमेन्द्रश्च विश्वे च देवाः॥१११०

Veda : Samveda | Mantra No : 1110

In Hindi:

ऋषि : भुवन आप्तयः साधनो वा भौवनः | देवता : विश्वेदेवाः | छन्द : द्विपदा त्रिष्टुप | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४५२ क्रमाङ्क पर अध्यात्म विषय में और राष्ट्र के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ भिन्न अर्थ प्रदर्शित किया जाता है।

पदपाठ : इमा ।नु ।कम् ।भुवना ।सौषधेम ।इन्द्रः ।च ।विश्वे ।च ।देवाः॥

पदार्थ : हम (इन्द्रः च) हमारा जीवात्मा (विश्वे च देवाः) और मन, बुद्धि, प्राण, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय रूप अन्य देव मिलकर (नु कम्) शीघ्र ही (इमा भुवना) इन सब सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, भूमि आदि भुवनों को (सीषधेम) सिद्ध् करें, अर्थात् उनके विषय में ज्ञान प्राप्त कर तथा साधनों का प्रयोग करके उन्हें अपने अनुकूल करें ॥१॥

भावार्थ : विद्वानों को चाहिए कि सब भूगोल और खगोल की विद्याएँ जानकर अन्य लोकों से होनेवाले सब लाभों को प्राप्त करें तथा उनसे सम्भावित हानियों को दूर करें ॥१॥