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Samveda/1142

नाभिं यज्ञाना सदन रयीणां महामाहावमभि सं नवन्त। वैश्वानर रथ्यमध्वराणां यज्ञस्य केतुं जनयन्त देवाः (कु)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥११४२

Veda : Samveda | Mantra No : 1142

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा का विषय है।

पदपाठ : नाभिम् ।यज्ञानाम् ।सदनम् ।रयीणाम् ।महाम् ।आहावम्। आ ।हावम् ।अभि ।सम् ।नवन्त ।वैश्वानरम् ।वैश्व ।नरम् ।रथ्यम् ।अध्वराणाम् ।यज्ञस्य ।केतुम। जनयन्त। देवाः॥

पदार्थ : (यज्ञानाम्) पूजा-कर्मों के (नाभिम्) केन्द्र, (रयीणाम्) धनों के (सदनम्) सदन, (महाम्) महान् तेजों के (आहावम्) कूप परमात्मा की, लोग (अभि सं नवन्त) चारों ओर भली-भाँति स्तुति करते हैं। (अध्वराणाम्) हिंसारहित व्यवहारों के (रथ्यम्) रथी, (यज्ञस्य) परोपकाररूप यज्ञ के (केतुम्) ध्वज के समान स्थित, (वैश्वानरम्) सबके नेता परमात्मा को (देवाः) विद्वान् उपासक (जनयन्त) अपने अन्तरात्मा में प्रकट करते हैं ॥३॥

भावार्थ : विविध गुणों के भण्डार जगदीश्वर की पूजा करके योगाभ्यास द्वारा उसका साक्षात्कार अपने अन्तरात्मा में सबको करना चाहिए ॥३॥