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Samveda/1305

स मह्ना विश्वा दुरितानि साह्वानग्नि ष्टवे दम आ जातवेदाः। स नो रक्षिषद्दुरितादवद्यादस्मान्गृणत उत नो मघोनः॥१३०५

Veda : Samveda | Mantra No : 1305

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि परमेश्वर हमें किस तरह उपकृत करे।

पदपाठ : सः । मह्ना । विश्वा । दुरितानि । दुः । इतानि । साह्वान् । अग्निः । स्तवे । दमे । आ । जातवेदाः । जात । वेदाः । सः । नः । रक्षिषत् । दुरितात् । दुः । इतात् । अवद्यात् । अस्मान् । गृणतः । उत । नः । मघोनः॥ ।

पदार्थ : (मह्ना) महिमा से (विश्वा) सब (दुरितानि) पाप, दुःख, दुर्गुण, दुर्व्यसन आदियों को (साह्वान्) नष्ट कर देनेवाला, (जातवेदाः) सर्वज्ञ और सर्वान्तर्यामी (अग्निः) अग्रणायक परमेश्वर (दमे) अन्तरात्मा-रूप घर में (आ स्तवे) प्रतिष्ठा पाता है। (सः) वह परमेश्वर (नः) हमें (अवद्यात्) निन्दनीय (दुरितात्) पाप से (रक्षिषत्) बचाये। (गृणतः) अर्चना करनेवाले (अस्मान्) हम स्तोताओं को (उत्) और (नः) हमारे (मघोनः) धनिक पुत्र, पौत्र, पत्नी आदि की (रक्षिषत्) रक्षा करे ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा को ध्याकर, उससे शुभ प्रेरणा पाकर हम और हमारे सम्बन्धी जन सब दुर्गुण, दुर्व्यसन, दुःख आदि को दूर कर देवें ॥२॥