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Samveda/1316

असावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेव दस्मो अभि गा अचिक्रदत्। पुनानो वारमत्येष्यव्ययश्येनो न योनिं घृतवन्तमासदत्॥१३१६

Veda : Samveda | Mantra No : 1316

In Hindi:

ऋषि : वसुर्भारद्वाजः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ सोम ओषधि का विषय और जीवात्मा का विषय वर्णित किया जा रहा है।

पदपाठ : आसवि । सोमः । अरुषः । वृषा । हरिः । राजा । इव । दस्मः । अभि । गाः । अचिक्रदत् । पुनानः । वारम् । अति । एषि । अव्ययम् । श्येनः । न । योनिम् । घृतवन्तम् । आ । असदत्॥

पदार्थ : प्रथम—सोमौषधि के पक्ष में। (अरुषः) चमकीले, (वृषा) रसवर्षक, (हरिः) हरे रंग के (सोमः) ओषधिराज सोम में से (असावि) मैंने रस निकाला है। (दस्मः) दर्शनीय यह, मानो (गाः अभि) गाय के दूध में मिलने के लिए (अचिक्रदत्) बोल रहा है, (राजा इव) जैसे कोई राजा (दस्मः) शत्रुओं का विनाशक होता हुआ (गाः अभि) शत्रुओं की भूमियों पर आक्रमण करके (अचिक्रदत्) जयघोष करता है। हे ओषधिराज सोम ! (पुनानः) शुद्ध किये जाते हुए तुम (अव्ययं वारम् अत्येषि) भेड़ के बालों से बनी हुई दशापवित्र नामक छन्नी में से छनकर पार होते हो। देखो, यह ओषधिराज सोम (घृतवन्तम्) घृतयुक्त (योनिम्) यज्ञगृह में (आसदत्) आया है, (श्येनः न) जैसे वायु (घृतवन्तम्) जल-कणों से युक्त (योनिम्) अन्तरिक्ष में (आसदत्) आता है ॥द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। (सोम) प्रेरक जीवात्मा (असावि) ऐश्वर्यवान् किया गया है। (अरुषः) ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशमान, (वृषा) ज्ञानवर्षक, (हरिः) देहरूप रथ को चलानेवाला, (दस्मः) शत्रुओं का विनाशक यह आत्मा (गाः अभि) इन्द्रियों को लक्ष्य करके (अचिक्रदत्) कर्तव्य-अकर्तव्य का उपदेश करे, (राजा इव) जैसे कोई राजा (गाः अभि) प्रजाओं को लक्ष्य करके (अचिक्रदत्) राजनियमों की घोषणा करता है। हे जीवात्मन् ! तू (पुनानः) स्वयं को पवित्र करता हुआ (वारम् अति) रुकावट डालनेवाले विघ्नों को पार करके (अव्ययम्) अविनश्वर परमात्मा को (एषि) प्राप्त कर। (श्येनः न योनिम्) बाज पक्षी जैसे उड़ान भरने के लिए अन्तरिक्ष को प्राप्त करता है, वैसे ही यह आत्मा (घृतवन्तम्) तेजस्वी (योनिम्) जगत् के कारण परमात्मा को (आसदत्) प्राप्त करे ॥१॥यहाँ श्लेष और श्लिष्टोपमा अलङ्कार हैं। प्रथम व्याख्या में ‘अभि गा अचिक्रदत्’ में व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा है ॥१॥

भावार्थ : जैसे पक्षी उड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँच जाते हैं, वैसे ही मनुष्य उन्नति करके परमात्मा को प्राप्त करें ॥१॥