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Samveda/1324

त्व सुतो मदिन्तमो दधन्वान्मत्सरिन्तमः। इन्दुः सत्राजिदस्तृतः॥१३२४

Veda : Samveda | Mantra No : 1324

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि आराधना किया गया परमेश्वर क्या करता है।

पदपाठ : त्वम् । सुतः । मदिन्तमः । दधन्वान् । मत्सरिन्तमः । इन्दुः । सत्राजित् । सत्रा । जित् । अस्तृतः अ । स्तृतः॥

पदार्थ : हे परमात्मन् ! (इन्दुः) तेजस्वी (त्वम्) आप (सुतः) आराधना किये हुए (मदिन्तमः) अतिशय प्रसन्न, (दधन्वान्) धारणकर्ता, (मत्सरिन्तमः) अत्यन्त आनन्द देनेवाले, (सत्राजित्) एक साथ उपासक के सब काम, क्रोध आदि रिपुओं को जीत लेनेवाले और (अस्तृतः) स्वयं सदा अहिंसित होते हो ॥२॥

भावार्थ : सच्चे हृदय से की गयी परमेश्वर की उपासना बहुत से फलों को देनेवाली होती है ॥२॥