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Samveda/1345

यत्सानोः सान्वारुहो भूर्यस्पष्ट कर्त्वम्। तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति॥१३४५

Veda : Samveda | Mantra No : 1345

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में परमेश्वर के सहायक होने का वर्णन है।

पदपाठ : यत् । सानोः । सानु । आरुहः । आ । अरुहः । भूरि । अस्पष्ट । कर्त्वम् । तत् । इन्द्रः । अर्थम् । चेतति । बूथेन । वृष्णिः । एजति॥

पदार्थ : मनुष्य (यत्) जब (सानोः सानु) एक शिखर से दूसरे उच्चतर शिखर पर, अर्थात् एक लक्ष्य को पार करके उससे ऊँचे दूसरे लक्ष्य पर (आरुहः) चढ़कर पहुँच जाता हैऔर (भूरि) बहुत से (कर्त्वम्) करने योग्य कार्य को (अस्पष्ट) करता है, (तत्) तब (इन्द्रः) विघ्नविनाशक परमेश्वर, उसके (अर्थम्) उदेश्य को (चेतति) जान लेता है और (वृष्णिः) बल, सुख, आदि को बरसानेवाला होता हुआ (यूथेन) गुणसमूह के साथ (एजति) उसे प्राप्त होता है ॥२॥

भावार्थ : प्रगति के पथ पर जाते हुए मनुष्य का जगदीश्वर परम सहायक हो जाता है ॥२॥