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Samveda/1745

आ नो रत्नानि बिभ्रतावश्विना गच्छतं युवम्। रुद्रा हिरण्यवर्तनी जुषाणा वाजिनीवसू माध्वी मम श्रुत हवम् (वा)।।॥१७४५

Veda : Samveda | Mantra No : 1745

In Hindi:

ऋषि : अवस्युरात्रेयः | देवता : अश्विनौ | छन्द : पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : आगे फिर वही विषय है।

पदपाठ : आ । नः । रत्नानि । विभ्रतौ । अश्विना । गच्छतम् । ब्रुवम् । रुद्रा । हिरण्यवर्तनी । हिरण्य । वर्तनीइति । जुषाणा । वाजिनीवसू । वाजिनी । वसूइति । माध्वीइति । मम् । श्रुतम् । हवम्॥

पदार्थ : हे (अश्विना) योगशास्त्र के अध्यापक और योग-विधियों के प्रशिक्षक ! (रत्नानि) योगसिद्धि के रमणीय ऐश्वर्यों को (बिभ्रतौ) धारण करनेवाले (युवम्) तुम दोनों (नः) हम योग-जिज्ञासुओं के पास (आगच्छतम्) आओ। हे (रुद्रा) रोदक योग-विघ्न आदि को दूर करनेवाले, (हिरण्य-वर्तनी) तेजस्वी मार्ग का अवलम्बन करनेवाले (जुषाणा) प्रीति करनेवाले (वाजिनीवसू) योगाभ्यास-क्रिया ही जिनका धन है ऐसे, (माध्वी) मधुर प्राणविद्या को जाननेवाले योगाध्यापक और योगप्रशिक्षको ! तुम दोनों (मम) मुझ योग-जिज्ञासु की (हवम्) पुकार को (श्रुतम्) सुनो ॥३॥

भावार्थ : वे ही योगाध्यापक और योग-प्रशिक्षक योगविद्या देने में सफल होते हैं, जो स्वयं योग-सिद्धियों से युक्त और योगविद्या के धुरंधर होते हैं ॥३॥इस खण्ड में जगदीश्वर, जगन्माता और योगाभ्यास के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥उन्नीसवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥