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Samveda/1856

इन्द्र आसां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः। देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्॥१८५६

Veda : Samveda | Mantra No : 1856

In Hindi:

ऋषि : अप्रतिरथ ऐन्द्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में जीवात्मा की सेनाध्यक्षता में विजयार्थ युद्ध प्रयाण का वर्णन है।

पदपाठ : इन्द्रः । आसाम् । नेता । बृहः । पतिः । दक्षिणा । यज्ञः । पुरः । एतु । सोमः । देवसेनानाम् । देव । सेनानाम् । अभिभञ्जतीनाम् । अभि । भञ्जतीनाम् । जयन्तीनाम् । मरुतः । यन्तु । अग्रम्॥

पदार्थ : (बृहः पतिः) महान् शरीर-रूप राष्ट्र का रक्षक (इन्द्रः) वीर जीवात्मा-रूप सेनापति (आसाम्) इन देव-सेनाओं का (नेता) नेता हो। (दक्षिणा) त्याग की भावना, (यज्ञः) परमेश्वरपूजारूप यज्ञ (सोमः) और शान्ति का व्रत (पुरः एतु) आगे-आगे चले। (अभिभञ्जतीनाम्) अदिव्य भावों तथा अधार्मिक दुष्ट-जनों को तोड़ती-फोड़ती-कुचलती हुई, (जयन्तीनाम्), विजय का उत्कर्ष प्राप्त करती हुई (देवसेनानाम्) दिव्यभावों तथा सदाचारी विद्वान् जनों की सेनाओं के (अग्रम्) आगे-आगे (मरुतः) प्राण तथा वायुवत् बलिष्ठ शूरवीर लोग (यन्तु) चलें ॥२॥

भावार्थ : सबको चाहिए कि अपने जीवात्मा को सेनापति बनाकर त्याग, परमात्मा की उपासना और विश्वशान्ति का आदर्श सामने रख कर, सत्य-अहिंसा आदि दिव्य गुणों की तथा बलिष्ठ योद्धाओं की सेना लेकर, प्राणपण से युद्ध करके देवासुरसङ्ग्राम में विजय प्राप्त करें ॥२॥