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सामान्यप्रकरणम्

In Hindi:

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : सामान्यप्रकरणम्

महर्षि दयानन्द व्याख्या :

नीचे लिखी हुई क्रिया सब संस्कारों में करनी चाहिये। परन्तु जहां-कहीं विशेष होगा, वहां सूचना कर दी जायेगी कि यहां पूर्वोक्त अमुक कर्म न करना, और इतना अधिक करना, स्थान-स्थान में जना दिया जायेगा।



यज्ञदेश— यज्ञ का देश पवित्र, अर्थात् जहां स्थल वायु शुद्ध हो, किसी प्रकार का उपद्रव न हो।



यज्ञशाला— इसी को ‘यज्ञमण्डप’ भी कहते हैं। यह अधिक से अधिक 16 सोलह हाथ सम चौरस चौकोण, और न्यून से न्यून 8 आठ हाथ की हो। यदि भूमि अशुद्ध हो तो यज्ञशाला की पृथिवी, और जितनी गहरी वेदी बनानी हो, उतनी पृथिवी दो-दो हाथ खोद अशुद्ध मिट्टी निकालकर उस में शुद्ध मिट्टी भरें। यदि 16 सोलह हाथ की सम चौरस हो तो चारों ओर 20 बीस खम्भे, और जो 8 आठ हाथ की हो तो 12 बारह खम्भे लगाकर उन पर छाया करें।



वह छाया की छत्त वेदी की मेखला से 10 दश हाथ ऊंची अवश्य होवे। और यज्ञशाला के चारों दिशा में 4 चार द्वार रखें और यज्ञशाला के चारों ओर ध्वजा पताका पल्लव आदि बांधें। नित्य मार्जन तथा गोमय से लेपन करें और कुंकुम, हल्दी, मैदा की रेखाओं से सुभूषित किया करें। मनुष्यों को योग्य है कि सब मङ्गलकार्यों में अपने और पराये कल्याण के लिये यज्ञ द्वारा ईश्वरोपासना करें। इसीलिए निम्नलिखित सुगन्धित आदि द्रव्यों की आहुति यज्ञकुण्ड में देवें।



यज्ञकुण्ड का परिमाण



जो लक्ष आहुति करनी हों तो चार-चार हाथ का चारों ओर सम चौरस चौकोण कुण्ड ऊपर और उतना ही गहिरा और चतुर्थांश नीचे, अर्थात् तले में 1 एक हाथ चौकोण लम्बा-चौड़ा रहे। इसी प्रकार जितनी आहुति करनी हों, उतना ही गहिरा-चौड़ा कुण्ड बनाना, परन्तु अधिक आहुतियों में दो-दो हाथ अर्थात् दो लक्ष आहुतियों में छह हस्त परिमाण का चौड़ा और सम चौरस कुण्ड बनाना। और जो पचास हजार आहुति देनी हों तो एक हाथ घटावे। अर्थात् तीन हाथ गहिरा-चौड़ा सम चौरस और पौन हाथ नीचे तथा पच्चीस हजार आहुति देनी हों तो दो हाथ चौड़ा-गहिरा सम चौरस और आध हाथ नीचे। दश हजार आहुति तक इतना ही, अर्थात् दो हाथ चौड़ा-गहिरा सम चौरस और आध हाथ नीचे रखना। पांच हजार आहुति तक डेढ़ हाथ चौड़ा-गहिरा सम चौरस और साढ़े आठ अंगुल नीचे रहे। यह कुण्ड का परिमाण विशेष घृताहुति का है। यदि इसमें 2500 (ढाई हजार) आहुति मोहनभोग, खीर और 2500 (ढाई हजार) घृत की देवें तो दो ही हाथ का चौड़ा-गहिरा सम चौरस और आध हाथ नीचे कुण्ड रखें।



चाहे घृत की हजार आहुति देनी हों तथापि सवा हाथ से न्यून चौड़ा-गहिरा सम चौरस और चतुर्थांश नीचे न बनावें। और इन कुण्डों में 15 पन्द्रह अंगुल की मेखला अर्थात् पांच-पांच अंगुल की ऊंची 3 तीन बनावें। और ये 3 तीन मेखला यज्ञशाला की भूमि के तले से ऊपर करनी। प्रथम 5 पांच अंगुल ऊंची और 5 पांच अंगुल चौड़ी, इसी प्रकार दूसरी और तीसरी मेखला बनावें।





यज्ञसमिधा



पलाश, शमी, पीपल, बड़, गूलर, आंब, बिल्व आदि की समिधा वेदी के प्रमाणे छोटी-बड़ी कटवा लेवें, परन्तु ये समिधा कीड़ा लगीं, मलिन-देशोत्पन्न और अपवित्र पदार्थ आदि से दूषित न हों। अच्छे प्रकार देख लेवें। और चारों ओर बराबर और बीच में चुनें।



होम के द्रव्य चार प्रकार



(प्रथम—सुगन्धित) कस्तूरी, केशर, अगर, तगर, श्वेतचन्दन, इलायची, जायफल, जावित्री आदि। (द्वितीय—पुष्टिकारक) घृत, दूध, फल, कन्द, अन्न, चावल, गेहूं, उड़द आदि। (तीसरे—मिष्ट) शक्कर, सहत, छुवारे, दाख आदि। (चौथे—रोगनाशक) सोमलता अर्थात् गिलोय आदि ओषधियाँ।



स्थालीपाक



नीचे लिखे विधि से भात, खिचड़ी, खीर, लड्डू, मोहनभोग आदि सब उत्तम पदार्थ बनावें। इस का प्रमाण—



ओं देवस्त्वा सविता पुनात्वच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः॥



इस मन्त्र का यह अभिप्राय है कि होम के सब द्रव्य को यथावत् शुद्ध कर लेना अवश्य चाहिये, अर्थात् सब को यथावत् शोध-छान, देख-भाल, सुधार कर करें। इन द्रव्यों को यथायोग्य मिलाके पाक करना। जैसे किसेर घी के मोहनभोग में रत्तीभर कस्तूरी, मासेभर केशर, दो मासे जायफल-जावित्री, सेरभर मीठा, सब डालकर मोहनभोग बनाना। इसी प्रकार अन्य मीठा भात, खीर, खिचड़ी, मोदक आदिहोम के लिये बनावें।



चरु अर्थात् होम के लिये पाक बनाने की विधि—



‘ओम् अग्नये त्वा जुष्टं निर्वपामि’ अर्थात् जितनी आहुति देनी हों, प्रत्येक आहुति के लिये चार-चार मूठी चावल आदि ले के (ओम् अग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि) अर्थात् अच्छे प्रकार जल से धोके पाकस्थाली में डाल अग्नि से पका लेवें। जब होम के लिये दूसरे पात्र में लेना हो, तभी नीचे लिखी आज्यस्थाली वा शाकल्यस्थाली में निकालके यथावत् सुरक्षित रखें, और उस पर घृत सेचन करें।



यज्ञपात्र



विशेषकर चांदी, सोना अथवा काष्ठ के पात्र होने चाहियें। निम्नलिखित प्रमाणे—



अथ पात्रलक्षणान्युच्यन्ते



बाहुमात्र्यः पाणिमात्रपुष्कराः, षडङ्गुलखातास्त्वग्बला हंसमुख-प्रसेकाः, मूलदण्डाश्चतस्रः स्रुचो भवन्ति। तत्र पालाशी जुहूः, आश्वत्थ्युपभृत्, वैकङ्कती ध्रुवा, अग्निहोत्रहवणी च।



अरत्निमात्रः खादिरः स्रुवः, अङ्गुष्ठपर्वमात्रपुष्करः, तथाविधो द्वितीयो वैकङ्कतः स्रुवः।



वारणं बाहुमात्रं मकराकारम्, अग्निहोत्रहवणीनिधानार्थं कूर्चम्।



अरत्निमात्रं खादिरं खड्गाकृति वज्रम्।



वारणान्यहोमसंयुक्तानि। तत्रोलूखलं नाभिमात्रम्।मुसलं शिरोमात्रम्।



अथवा मुसलोलूखले वार्क्षे सारदारुमये शुभे इच्छाप्रमाणे भवतः।तथा—



खादिरं मुसलं कार्यं पालाशः स्यादुलूखलः।



यद्वोभौ वारणौ कार्यौ तदभावेऽन्यवृक्षजौ॥



शूर्पं वैणवमेव वा ऐषीकं नलमयं वाऽचर्मबद्धम्।



प्रादेशमात्री वारणी शम्या। कृष्णाजिनमखण्डम्।



दृषदुपले अश्ममये। वारणीं 24 हस्तमात्रीं, 22 अरत्निमात्रीं वा खातमध्यां मध्यसंगृहीतामिडापात्रीम्।



अरत्निमात्राणि ब्रह्मयजमानहोतृपत्न्यासनानि।



मुञ्जमयं त्रिवृतं व्याममात्रं योक्त्रम्।



प्रादेशदीर्घे अष्टाङ्गुलायते षडङ्गुलखातमण्डलमध्ये पुरोडाशपात्र्यौ।



प्रादेशमात्रं द्व्यङ्गुलपरीणाहं तीक्ष्णाग्रं शृतावदानम्।



आदर्शाकारे चतुरस्रे वा प्राशित्रहरणे। तयोरेकमीषत्खातमध्यम्।



षडङ्गुलं कङ्कतिकाकारमुभयतः खातं षडवत्तम्।



द्वादशाङ्गुलमर्द्धचन्द्राकारमष्टाङ्गुलोत्सेधमन्तर्द्धानकटम्।



उपवेशोऽरत्निमात्रः।



मुञ्जमयी रज्जुः।



खादिरान् द्वादशाङ्गुलदीर्घान् चतुरङ्गुलमस्तकान् तीक्ष्णाग्रान् शङ्कून्।



यजमानपूर्णपात्रं पुरुषचतुष्टयाहारपाकपर्याप्तम्।



समिदिध्मार्थं पलाशशाखामयम्।



कौशं बर्हिः। ऋत्विग्वरणार्थं कुण्डलाङ्गुलीयकवासांसि।



पत्नीयजमानपरिधानार्थं क्षौमवासश्चतुष्टयम्।



अग्न्याधेयदक्षिणार्थं चतुर्विंशतिपक्षे एकोनपञ्चाशद् गावः, द्वादशपक्षे पञ्चविंशतिः, षट्पक्षे त्रयोदश, सर्वेषु पक्षेषु आदित्येष्टौ



धेनुः। वरार्थं चतस्रो गावः।



पात्रों का चित्र आदि अलग से पी डी एफ फाईल में दिया गया है।



समिध पलाश की 18 हस्त, 3 इध्म, परिधि 3 पलाश की बाहुमात्र। सामिधेनी समित् प्रादेशमात्र। समीक्षण लेर 5। शाटी 1। दृषदुपल 1 दीर्घ अंगुल 12। पृ॰ 15 उपल अंगुल 6। नेतु व्याम=हाथ 4, त्रिवृत् तृण वा गोबाल का।







अथ ऋत्विग्वरणम्



यजमानोक्तिः—‘ओमावसोः सदने सीद’।



इस मन्त्र का उच्चारण करके ऋत्विज् को कर्म कराने की इच्छा से स्वीकार करने के लिए प्रार्थना करे।



ऋत्विगुक्तिः—‘ओं सीदामि’।



ऐसा कहके जो उस के लिये आसन बिछाया हो उस पर बैठे।



यजमानोक्तिः—‘अहमद्योक्तकर्मकर्मकरणाय भवन्तं वृणे’।



ऋत्विगुक्तिः—‘वृतोऽस्मि’।



ऋत्विजों के लक्षण— अच्छे विद्वान्, धार्मिक, जितेन्द्रिय कर्म करने में कुशल, निर्लोभ, परोपकारी दुर्व्यसनों से रहित, कुलीन, सुशील, वैदिक मत वाले, वेदवित् एक, दो, तीन अथवा चार का वरण करें।



जो एक हो तो उस का पुरोहित, और जो दो हों तो ऋत्विक्, पुरोहित और 3 तीन हों तो ऋत्विक्, पुरोहित और अध्यक्ष, और जो चार हों तो होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा।



इन का आसन वेदी के चारों ओर, अर्थात् होता का वेदी से पश्चिम आसन पूर्व मुख, अध्वर्यु का उत्तर आसन दक्षिणमुख, उद्गाता का पूर्व आसन पश्चिम मुख, और ब्रह्मा का दक्षिण आसन उत्तर में मुख होना चाहिए और यजमान का आसन पश्चिम में और वह पूर्वाभिमुख, अथवा दक्षिण मेंआसन पर बैठकेउत्तराभिमुख रहे। इन ऋत्विजों को सत्कारपूर्वक आसन पर बैठाना, और वे प्रसन्नतापूर्वक आसन पर बैठें। और उपस्थित कर्म के विना दूसरा कर्म वा दूसरी बात कोई भी न करें।



औरअपने-अपने जलपात्र से सब जने, जो कि यज्ञ करने को बैठे हों, वे इन मन्त्रों से तीन-तीन आचमन करें, अर्थात् एक-एक से एक-एक वार आचमन करें। वे मन्त्र ये हैं—



ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा॥1॥इस से एक।



ओम् अमृतापिधानमसि स्वाहा॥2॥इस से दूसरा।



ओं सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा॥3॥इस से तीसरा आचमन करके, तत्पश्चात् नीचे लिखे मन्त्रों से जल करके अंगों का स्पर्श करें—



ओं वाङ्म आस्येऽस्तु॥1॥इस मन्त्र से मुख।



ओं नसोर्मे प्राणोऽस्तु॥2॥इस मन्त्र से नासिका के दोनों छिद्र।



ओं अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु॥3॥इस मन्त्र से दोनों आँखें।



ओं कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु॥4॥इस मन्त्र से दोनों कान।



ओं बाह्वोर्मे बलमस्तु॥5॥इस मन्त्र से दोनों बाहु।



ओम् ऊर्वोर्मऽओजोऽस्तु॥6॥इस मन्त्र से दोनों जंघा और



ओम् अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनूस्तन्वा मे सह सन्तु॥



इस मन्त्र से दाहिने हाथ से जल-स्पर्श करके मार्जन करना। पूर्वोक्त समिधाचयन वेदी में करें।पुनः—



ओं भूर्भुवः स्वः॥



इस मन्त्र का उच्चारण करके ब्राह्मण क्षत्रिय वा वैश्य के घर से अग्नि ला, अथवा घृत का दीपक जला, उस से कपूर में लगा, किसी एक पात्र में धर, उस में छोटी-छोटी लकड़ी लगाके यजमान वा पुरोहित उस पात्र को दोनों हाथों से उठा, यदि गर्म हो तो चिमटे से पकड़कर अगले मन्त्र से अग्न्याधान करे। वह मन्त्र यह है—



ओं भूर्भुवः॒ स्वर्द्यौरि॑व भू॒म्ना पृ॑थि॒वीव॑ वरि॒म्णा।



तस्या॑स्ते पृथिवि देवयजनि पृ॒ष्ठेऽग्निम॑न्ना॒दम॒न्नाद्या॒याद॑धे॥यजुः अ॰ 3। मं॰ 5॥



इस मन्त्र से वेदी के बीच में अग्नि को धर, उस पर छोटे-छोटे काष्ठ और थोड़ा कपूर धर, अगला मन्त्र पढ़के व्यजन से अग्नि को प्रदीप्त करे—



ओम् उद्बु॑ध्यस्वाग्ने॒ प्रति॑जागृहि॒ त्वमि॑ष्टापू॒र्त्ते संसृ॑जेथाम॒यं च॑।



अ॒स्मिन्त्स॒धस्थे॒ऽअध्युत्त॑रस्मि॒न् विश्वे॑ देवा॒ यज॑मानश्च सीदत॥यजुः अ॰ 15। मं॰ 54॥



जब अग्नि समिधाओं में प्रविष्ट होने लगे, तब चन्दन की अथवा ऊपरलिखित पलाशादि की तीन लकड़ी आठ-आठ अंगुल की घृत में डुबा, उन में से एक-एक निकाल नीचे लिखे एक-एक मन्त्र से एक-एक समिधा को अग्नि में चढ़ावें। वे मन्त्र ये हैं—



ओम् अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा॥ इदमग्नये जातवेदसे इदं न मम॥1॥इस मन्त्र से एक,



ओं स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो॑धय॒ताति॑थिम्।



आस्मि॑न् ह॒व्या जु॑होतन॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नये इदं न मम॥2॥इस से, और



सुस॑मिद्धाय शो॒चिषे॑ घृ॒तं ती॒व्रं जु॑होतन।



अ॒ग्नये॑ जा॒तवे॑दसे॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नये जातवेदसे इदं न मम॥3॥



इस मन्त्र से अर्थात् इन दोनों से दूसरी।



ओं तन्त्वा॑ स॒मिद्भि॑रङ्गिरो घृ॒तेन॑ वर्धयामसि।



बृ॒हच्छो॑चा यविष्ठ्य॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नयेऽङ्गिरसे इदं न मम॥4॥यजुः अ॰ 3। मं॰ 1, 2, 3॥



इस मन्त्र से तीसरी समिधा की आहुति देवें।



इन मन्त्रों से समिदाधान करके होम का शाकल्य, जो कि यथावत् विधि से बनाया हो, सुवर्ण, चांदी, कांसा आदि धातु के पात्र अथवा काष्ठ-पात्र में वेदी के पास सुरक्षित धरें। पश्चात् उपरिलिखित घृतादि जो कि उष्ण कर छान, पूर्वोक्त सुगन्ध्यादि पदार्थ मिलाकर पात्रों में रखा हो, उसमें से कम से कम 6 मासा भर घृत वा अन्य मोहनभोगादि जो कुछ सामग्री हो, अधिक से अधिक छटांक भर की आहुति देवें, यही आहुति का प्रमाण है।



उसघृत में से चमसा कि जिस में छः मासा ही घृत आवे ऐसा बनाया हो, भरके नीचे लिखे मन्त्र से पांच आहुति देनी—



ओम् अयं त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय स्वाहा॥ इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम॥5॥



तत्पश्चात् वेदी के पूर्व दिशा आदि और अञ्जलि में जल लेके चारों ओर छिड़कावे। उसके ये मन्त्र हैं—



ओम् अदितेऽनुमन्यस्व॥—इस मन्त्र से पूर्व।



ओम् अनुमतेऽनुमन्यस्व॥—इस से पश्चिम।



ओं सरस्वत्यनुमन्यस्व॥—इस से उत्तर। और—



ओं देव॑ सवितः॒ प्रसु॑व य॒ज्ञं प्रसु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य।



दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॑त॒पूः केतं॑ नः पुनातु वा॒चस्पति॒र्वाचं॑ नः स्वदतु॥यजुः अ॰ 30। मं॰ 1



इस मन्त्र से वेदी के चारों ओर जल छिड़कावे।



इसके पश्चात् सामान्यहोमाहुति गर्भाधानादि प्रधान संस्कारों में अवश्य करें। इस में मुख्य होम के आदि और अन्त में जो आहुति दी जाती हैं, उन में से यज्ञकुण्ड के उत्तर भाग में जो एक आहुति, और यज्ञकुण्ड के दक्षिण भाग में दूसरी आहुति देनी होती है, उस का नाम "आघारावाज्याहुति" कहते हैं। और जो कुण्ड के मध्य में आहुतियां दी जाती हैं, उन का नाम "आज्यभागाहुति" कहते हैं। सो घृतपात्र में से स्रुवा को भर अंगूठा, मध्यमा, अनामिका से स्रुवा को पकड़के—



ओम् अग्नये स्वाहा॥ इदमग्नये इदन्न मम॥



इस मन्त्र से वेदी के उत्तर भाग अग्नि में।



ओं सोमाय स्वाहा॥ इदं सोमाय इदं न मम॥



इस मन्त्र से वेदी के दक्षिण भाग में प्रज्वलित समिधा पर आहुति देनी। तत्पश्चात्—



ओं प्रजापतये स्वाहा॥ इदं प्रजापतये इदन्न मम॥



ओम् इन्द्राय स्वाहा॥ इदमिन्द्राय इदन्न मम॥



इन दोनों मन्त्रों से वेदी के मध्य में दो आहुति देनी।



उसके पश्चात्=चार आहुति अर्थात्आघारावाज्यभागाहुतिदेके, जब प्रधान होम अर्थात् जिस-जिस कर्म में जितना-जितना होम करना हो करके, पश्चात् भी पूर्णाहुति पूर्वोक्त चार (आघारावाज्यभागा॰) देवें।



पुनः शुद्ध किये हुए उसी घृतपात्र में से स्रुवा को भरके प्रज्वलित समिधाओं पर व्याहृति की चार आहुति देवें—



ओं भूरग्नये स्वाहा॥ इदमग्नये इदन्न मम॥



ओं भुवर्वायवे स्वाहा॥ इदं वायवे इदन्न मम॥



ओं स्वरादित्याय स्वाहा॥ इदमादित्याय इदन्न मम॥



ओं भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः स्वाहा॥ इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः इदं न मम॥



ये चार घी की आहुति देकर स्विष्टकृत् होमाहुति एक ही है, यह घृत की अथवा भात की देनी चाहिये। उस का मन्त्र—



ओं यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्। अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्यात् सर्वं स्विष्टं सुहुतं करोतु मे। अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्ताहुतीनां कामानां समर्द्धयित्रे सर्वान्नः कामान्त्समर्द्धय स्वाहा॥ इदमग्नये स्विष्टकृते इदं न मम॥



इस से एक आहुति करके,प्राजापत्याहुतिकरें। नीचे लिखे मन्त्र की मन में बोलके देनी चाहिए—



ओं प्रजापतये स्वाहा॥ इदं प्रजापतये इदं न मम॥



इस से मौन करके एक आहुति देकर चार आज्याहुति घृत की देवें।



परन्तु जो नीचे लिखी आहुति चौल, समावर्त्तन और विवाह में मुख्य हैं। वे चार मन्त्र ये हैं—



ओं भूर्भुवः॒ स्वः। अग्न॒ आयुं॑षि पवस॒ आ सु॒वोर्ज॒मिषं॑ च नः।



आ॒रे बा॑धस्व दु॒च्छुनां॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नये पवमानाय इदन्न मम॥1॥



ओं भूर्भुवः॒ स्वः। अ॒ग्निर्ऋषिः॒ पव॑मानः॒ पाञ्च॑जन्यः पु॒रोहि॑तः।



तमी॑महे महाग॒यं स्वाहा॑॥ इदमग्नये पवमानाय इदन्न मम॥2॥



ओं भूर्भुवः॒ स्वः। अग्ने॒ पव॑स्व॒ स्वपा॑ अ॒स्मे वर्चः॑ सु॒वीर्य॑म्।



दध॑द्र॒यिं मयि॒ पोषं॑ स्वाहा॑॥ इदमग्नये पवमानाय इदन्न मम॥3॥



ऋ॰ मं॰ 9। सू॰ 66। मं॰ 19-21॥



ओं भूर्भुवः॒ स्वः। प्रजा॑पते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ ता ब॑भूव। यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ अस्तु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णां स्वाहा॑॥ इदं प्रजापतये इदन्न मम॥4॥ऋ॰ मं॰ 10। सू॰ 121। मं॰ 10॥



इन से घृत की 4 चार आहुति करके "अष्टाज्याहुति" के निम्नलिखित मन्त्रों से सर्वत्र मङ्गल-कार्यों में 8 आठ आहुति देवें, परन्तु किस-किस संस्कार में कहां-कहां देनी चाहियें, यह विशेष बात उस-उस संस्कार में लिखेंगे। वे आठ आहुति-मन्त्र ये हैं—



ओं त्वं नो॑ अग्ने॒ वरु॑णस्य वि॒द्वान् देव॒स्य॒ हेळोऽव॑ यासिसीष्ठाः।



यजि॑ष्ठो वह्नि॑तमः॒ शोशु॑चानो॒ विश्वा॒ द्वेषां॑सि॒ प्र मु॑मुग्ध्य॒स्मत् स्वाहा॑॥ इदमग्नीवरुणाभ्याम् इदं न मम॥1॥



ओं स त्वं नो॑ अग्नेऽव॒मो भ॑वो॒ती नेदि॑ष्ठो अ॒स्या उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ। अव॑ यक्ष्व नो॒ वरु॑णं॒ ररा॑णो वी॒हि मृ॑ळी॒कं सु॒हवो॑ न एधि॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नीवरुणाभ्याम् इदं न मम॥2॥ऋ॰ मं॰ 4। सू॰ 1। मं॰ 4, 5॥



ओम् इ॒मं मे॑ वरुण श्रुधी॒ हव॑म॒द्या च॑ मृळय। त्वाम॑व॒स्युराच॑के॒ स्वाहा॑॥ इदं वरुणाय इदं न मम॥3॥



ऋ॰ मं॰ 1। सू॰ 25। मं॰ 19॥



ओं तत्त्वा॑ यामि॒ ब्रह्म॑णा॒ वन्द॑मान॒स्तदा शा॑स्ते॒ यज॑मानो ह॒विर्भिः॑।



अहे॑ळमानो वरुणे॒ह बो॒ध्युरु॑शंस॒ मा न॒ आयुः॒ प्र मो॑षीः॒ स्वाहा॑॥



इदं वरुणाय इदं न मम॥4॥—ऋ॰ मं॰ 1। सू॰ 24। मं॰ 11॥



ओं ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता



महान्तः। तेभिर्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्क्काः स्वाहा॥



इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्क्केभ्यः इदं न मम॥5॥



ओम् अयाश्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्त्वमयाऽसि।



अया नो यज्ञं वहास्यया नो धेहि भेषजं स्वाहा॥ इदमग्नये अयसे इदं न मम॥6॥



ओम् उदु॑त्त॒मं वरु॑ण॒ पाश॑म॒स्मदवा॑ध॒मं वि म॑ध्य॒मं श्र॑थाय। अथा॑ व॒यमा॑दित्य व्र॒ते तवाना॑गसो॒ अदि॑तये स्याम॒ स्वाहा॑॥ इदं वरुणायाऽऽदित्यायादितये च इदं न मम॥7॥ऋ॰ मं॰ 1। सू॰ 24। मं॰ 15॥



ओं भव॑तन्नः॒ सम॑नसौ॒ सचे॑तसावरे॒पसौ॑। मा य॒ज्ञं हिं॑सिष्टं॒ मा य॒ज्ञप॑तिं जातवेदसौ शि॒वौ भ॑वतम॒द्य नः॒ स्वाहा॑। इदं जातवेदोभ्याम् इदं न मम॥8॥यजुः अ॰ 5। मं॰ 3॥



सब संस्कारों में मधुर स्वर से मन्त्रोच्चारण यजमान ही करे। न शीघ्र न विलम्ब से उच्चारण करे, किन्तु मध्य भाग जैसा कि जिस वेद का उच्चारण है, करे। यदि यजमान न पढ़ा हो तो इतने मन्त्र तो अवश्य पढ़ लेवे। यदि कोई कार्यकर्त्ता जड़ मन्दमति काला अक्षर भैंस बराबर जानता हो तो वह शूद्र है। अर्थात् शूद्र मन्त्रोच्चारण में असमर्थ हो तो पुरोहित और ऋत्विज् मन्त्रोच्चारण करें, और कर्म उसी मूढ़ यजमान के हाथ से करावें।



पुनः निम्नलिखित मन्त्र से पूर्णाहुति करें। स्रुवा को घृत से भरके—



ओं सर्वं वै पूर्णं स्वाहा॥



इस मन्त्र से एक आहुति देवें। ऐसे दूसरी और तीसरी आहुति देके, जिस को दक्षिणा देनी हो देवें, वा जिस को जिमाना हो जिमा, दक्षिणा देके सब को विदाकर स्त्रीपुरुष हुतशेष घृत, भात वा मोहनभोग को प्रथम जीमके पश्चात् रुचिपूर्वक उत्तमान्न का भोजन करें।





मङ्गलकार्य



अर्थात् गर्भाधानादि संन्यास-संस्कार पर्यन्त पूर्वोक्त औरनिम्नलिखित सामवेदोक्त वामदेव्यगान अवश्य करें। वे मन्त्र ये हैं—



ओं भूर्भुवः॒ स्वः᳖ । क꣡या꣢ नश्चि꣣त्र꣡꣯ आ भु꣢꣯वदू꣣ती꣢ स꣣दा꣡वृ꣣धः꣢ स꣡खा꣢।



क꣢या꣣ श꣡चि꣢ष्ठया वृ꣣ता꣢ ॥१॥





ओं भूर्भुवः॒ स्वः᳖ । क꣡स्त्वा꣢ स꣣त्यो꣡꣯ मदा꣢꣯नां꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठो मत्स꣣द꣡न्धसः꣢।



दृ꣣ढा꣡ चि꣢दा꣣रु꣢जे꣣ व꣡सु꣢ ॥२॥



ओं भूर्भुवः॒ स्वः᳖ । अ꣣भी꣢꣫षु णः꣣ स꣡खी꣢नामवि꣣ता꣡ जरि꣢तॄ꣣णा꣢म्।



श꣣तं꣡ भ꣡वास्यू꣣त꣡ये꣢ ॥३॥



महावामदेव्यम्



का꣣ऽ५या꣢꣯ । नश्चा꣤३ यित्रा꣢३ आ꣤꣯भुवा꣥त् । ऊ꣡ । ती꣯ स꣢दा꣡꣯वृधः꣢ ।



स꣡ खा । औ꣢३ हो꣢꣯हा꣢यि । क꣡या२३ श꣢चायि꣢ ।ष्ठ꣣यौ꣢꣯हो३। हु꣡म्मा२।



वाऽ२र्तो३ऽ५हा꣢यि ॥ (१)॥



का꣣ऽ५स्त्वा꣢꣯ । स꣤त्यो३मा꣢३दा꣤ना꣥म् । मा꣡ । हिष्ठो꣢꣯मा꣡त्साद꣢न्ध । सा



औ꣢३हो꣢꣯ हा꣢यि । दृ꣡ढा२३ चिदा꣢ । रु꣣꣯जौ꣢हो३। हु꣡म्मा꣥२ । वा꣡ऽ३सो ३



ऽ ५ हा꣢यि ॥ (२)॥



आ꣣ऽ५भी꣢꣯।षु꣤णाः३ सा꣢३खी꣤ना꣥म् । आ꣡ । वि꣢꣯ता ज꣡रायि तॄ꣢꣯ ।



णा꣡म् । औ२३ हो꣢꣯ हायि । श꣡ता२३म्भवा꣢ । सि꣣꣯यौ꣢हो꣢३ हु꣡म्मा꣥२ ।



ता꣡ऽ२ यो३ऽ५हा꣢यि ॥ (३)॥साम॰ उत्तरार्चिके। अध्याये 1। खं॰ 3। मं॰ 1, 2, 3॥



यह महावामदेव्यगान होने के पश्चात् गृहस्थ स्त्रीपुरुष कार्यकर्त्ता सद्धर्मी लोकप्रिय परोपकारी सज्जन विद्वान् वा त्यागी पक्षपात रहित संन्यासी, जो सदा विद्या की वृद्धि और सब के कल्याणार्थ वर्तनेवाले हों उनको नमस्कार, आसन, अन्न, जल, वस्त्र, पात्र, धन आदि के दान से उत्तम प्रकार से यथासामर्थ्य सत्कार करें। पश्चात् जो कोई देखने ही के लिये आये हों, उन को भी सत्कारपूर्वक विदा कर दें। अथवा जो संस्कार-क्रिया को देखना चाहें, वे पृथक्-पृथक् मौन करके बैठे रहें, कोई बातचीत हल्ला-गुल्ला न करने पावें। सब लोग ध्यानावस्थित प्रसन्नवदन रहें। विशेष कर्मकर्त्ता और कर्म करानेवाले शान्ति धीरज और विचारपूर्वक क्रम से कर्म करें और करावें। यह सामान्यविधि अर्थात् सब संस्कारों में कर्त्तव्य है॥



॥ इति सामान्यप्रकरणम्॥