अथ विवाहसंस्कारविधिं वक्ष्यामः
In Hindi:
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथ विवाहसंस्कारविधिं वक्ष्यामः‘विवाह’ उसे कहते हैं कि जो पूर्ण ब्रह्मचर्यव्रत से विद्या बल को प्राप्त तथा सब प्रकार से शुभ गुण, कर्म, स्वभावों में तुल्य, परस्पर प्रीतियुक्त होके निम्नलिखित प्रमाणे सन्तानोत्पत्ति और अपने-अपने वर्णाश्रम के अनुकूल उत्तम कर्म करने के लिये स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध होता है। इसमें प्रमाण—
उदगयन आपूर्यमाणपक्षे पुण्ये नक्षत्रे[1]चौलकर्मोपनयनगोदानविवाहाः॥1॥
सार्वकालमेके विवाहम्॥2॥यह आश्वलायन गृह्यसूत्र और—
आवसथ्याधानं दारकाले॥3॥इत्यादि पारस्कर और—
पुण्ये नक्षत्रे दारान् कुर्वीत॥4॥
लक्षणप्रशस्तान् कुशलेन॥5॥—इत्यादि गोभिलीय गृह्यसूत्र और इसी प्रकार शौनक गृह्यसूत्र में भी है॥
अर्थ—उत्तरायण शुक्लपक्ष अच्छे दिन अर्थात् जिस दिन प्रसन्नता हो, उस दिन विवाह करना चाहिये॥1॥
और कितने ही आचार्यों का ऐसा मत है कि सब काल में विवाह करना चाहिये॥2॥
जिस अग्नि का स्थापन विवाह में होता है, उस का ‘आवसथ्य’ नाम है॥3॥
प्रसन्नता के दिन स्त्री का पाणिग्रहण, जो कि स्त्री सर्वथा शुभ गुणादि से उत्तम हो, करना चाहिये॥4-5॥
इस का समय—पृष्ठ 79-82 तक में लिखे प्रमाणे जानना चाहिए। वधू और वर का आयु, कुल, वास्तव स्थान, शरीर और स्वभाव की परीक्षा अवश्य करें, अर्थात् दोनों सज्ञान और विवाह की इच्छा करनेवाले हों। स्त्री की आयु से वर की आयु न्यून से न्यून ड्योढ़ी और अधिक से अधिक दूनी होवे। परस्पर कुल की परीक्षा भी करनी चाहिये। इसमें प्रमाण—
वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम्।
अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत्॥1॥
गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधि।
उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम्॥2॥
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने॥3॥
महान्त्यपि समृद्धानि गोऽजाविधनधान्यतः।
स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत्॥4॥
हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम्।
क्षय्यामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च॥5॥
नोद्वहेत् कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम्।
नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटां न पिङ्गलाम्॥6॥
नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम्।
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम्॥7॥
अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम्।
तनुलोमकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत् स्त्रियम् ॥8॥
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः॥9॥
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम्।
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः॥10॥
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते ।
अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ॥11॥
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः।
कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते॥12॥
सह नौ चरतां धर्ममिति वाचानुभाष्य च।
कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधिः स्मृतः॥13॥
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः।
कन्याप्रदानं विधिवद् आसुरो धर्म उच्यते॥14॥
इच्छयाऽन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च।
गान्धर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसम्भवः॥15॥
हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात्।
प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते॥16॥
सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति।
स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमोऽधमः॥17॥
ब्राह्मादिषु विवाहेषु चतुर्ष्वेवानुपूर्वशः।
ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते शिष्टसम्मताः॥18॥
रूपसत्त्वगुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः।
पर्याप्तभोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः॥19॥
इतरेषु तु शिष्टेषु नृशंसानृतवादिनः।
जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्मद्विषः सुताः॥20॥
अनिन्दितैः स्त्रीविवाहैरनिन्द्या भवति प्रजा।
निन्दितैर्निन्दिता नॄणां तस्मान्निन्द्यान् विवर्जयेत्॥21॥
अर्थ—ब्रह्मचर्य से 4 चार, 3 तीन, 2 दो अथवा 1 एक वेद को यथावत् पढ़, अखण्डित ब्रह्मचर्य का पालन करके गृहाश्रम का धारण करे॥1॥
यथावत् उत्तम रीति से ब्रह्मचर्य और विद्या को ग्रहण कर, गुरु की आज्ञा से स्नान करके ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने वर्ण की उत्तम लक्षणयुक्त स्त्री से विवाह करे॥2॥
जो स्त्री माता की छः पीढ़ी और पिता के गोत्र की न हो, वही द्विजों के लिए विवाह करने में उत्तम है॥3॥
विवाह में नीचे लिखे हुए 10 दश कुल, चाहे वे गाय आदि पशु, धन और धान्य से कितने ही बड़े हों, उन कुलों की कन्या के साथ विवाह न करे॥4॥
वे 10 दश कुल ये हैं। 1 एक—जिस कुल में उत्तम क्रिया न हो। 2 दूसरा—जिस कुल में कोई भी उत्तम पुरुष न हो। 3 तीसरा—जिस कुल में कोई विद्वान् न हो। 4 चौथा—जिस कुल में शरीर के ऊपर बड़े-बड़े लोम हों। 5 पांचवां—जिस कुल में बवासीर हो। 6 छठा—जिस कुल में क्षयी (राजयक्ष्मा) रोग हो। 7 सातवां—जिस कुल में अग्निमन्दता से आमाशय रोग हो। 8 आठवां—जिस कुल में मृगी रोग हो। 9 नववां—जिस कुल में श्वेतकुष्ठ हो और 10 दसवां—जिस कुल में गलितकुष्ठ आदि रोग हों—उन कुलों की कन्या अथवा उन कुलों के पुरुषों से विवाह कभी न करे॥5॥
पीले वर्णवाली, अधिक अग्वाली जैसी छंगुली आदि, रोगवती (रोगिणी), जिस के शरीर पर कुछ भी लोम न हों, और जिस के शरीर पर बड़े-बड़े लोम हों, व्यर्थ अधिक बोलनेहारी और जिस के पीले बिल्ली के सदृश नेत्र हों॥6॥
तथा जिस कन्या का (ऋक्ष) नक्षत्र पर नाम अर्थात् रेवती, रोहिणी इत्यादि, (वृक्ष) चम्पा, चमेली आदि, (नदी) जिस का गङ्गा, यमुना इत्यादि, (अन्त्य) चाण्डाली आदि, (पर्वत) जिस का विन्ध्याचला इत्यादि, (पक्षी) पक्षी पर, अर्थात् कोकिला, हंसा इत्यादि, (अहि) अर्थात् उरगा, भोगिनी इत्यादि, (प्रेष्य) दासी इत्यादि और जिस कन्या का (भीषण) कालिका, चण्डिका इत्यादि नाम हो, उस से विवाह न करे॥7॥
किन्तु जिस के सुन्दर अङ्ग, उत्तम नाम, हंस और हस्तिनी के सदृश चालवाली, जिस के सूक्ष्म लोम, सूक्ष्म केश और सूक्ष्म दांत हों, जिस के सब अङ्ग कोमल हों, उस स्त्री से विवाह करे॥8॥
ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच, ये विवाह आठ प्रकार के होते हैं॥9॥
1 पहला—ब्राह्म—कन्या के योग्य सुशील, विद्वान् पुरुष का सत्कार करके, कन्या को वस्त्रादि से अलंकृत करके, उत्तम पुरुष को बुला, अर्थात् जिस को कन्या ने प्रसन्न भी किया हो, उस को देना, वह ‘ब्राह्म’ विवाह कहाता है॥10॥
2 दूसरा—दैव—विस्तृत यज्ञ में बड़े-बड़े विद्वानों को वरण कर, उस में कर्म करनेवाले विद्वान् को वस्त्र-आभूषण आदि से कन्या को सुशोभित करके देना, वह ‘दैव’ विवाह है॥11॥
3 तीसरा—आर्ष—1 एक गाय, बैल का जोड़ा अथवा 2 दो जोड़े[2]वर से लेके धर्मपूर्वक कन्यादान करना, वह ‘आर्ष’ विवाह है॥12॥ और
4 चौथा—प्राजापत्य—कन्या और वर को यज्ञशाला में विधि करके सब के सामने तुम दोनों मिलके गृहाश्रम के कर्मों को यथावत् करो, ऐसा कहकर दोनों की प्रसन्नतापूर्वक पाणिग्रहण होना, वह ‘प्राजापत्य’ विवाह कहाता है। ये 4 चार विवाह उत्तम हैं॥13॥
और 5 पांचवाँ—वर की जातिवालों और कन्या को यथाशक्ति धन देकर होम आदि विधि कर कन्या देना, ‘आसुर’ विवाह कहाता है॥14॥
6 छठा—वर और कन्या की इच्छा से दोनों का संयोग होना और अपने मन में मान लेना कि हम दोनों स्त्री-पुरुष हैं, यह काम से हुआ ‘गान्धर्व’ विवाह कहाता है॥15॥
और 7 सातवाँ—हनन, छेदन अर्थात् कन्या के रोकनेवालों का विदारण कर क्रोशती, रोती, कंपती और भयभीत हुई कन्या को बलात्कार हरण करके विवाह करना, वह ‘राक्षस’ विवाह है॥16॥
और [8 आठवाँ]—जो सोती, पागल हुई वा नशा पीकर उन्मत्त हुई कन्या को एकान्त पाकर दूषित कर देना, यह सब विवाहों में नीच से नीच महानीच, दुष्ट, अतिदुष्ट ‘पैशाच’ विवाह है॥17॥
ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्य इन चार विवाहों में पाणिग्रहण किये हुए स्त्री-पुरुषों से जो सन्तान उत्पन्न होते हैं, वे वेदादिविद्या से तेजस्वी, आप्त पुरुषों के सम्मत, अत्युत्तम होते हैं॥18॥
वे पुत्र वा कन्या सुन्दर रूप, बल, पराक्रम, शुद्ध, बुद्ध्यादि, उत्तम गुणयुक्त, बहु धनयुक्त, पुण्यकीर्तिमान् और पूर्ण भोग के भोक्ता, अतिशय धर्मात्मा होकर 100 वर्ष तक जीते हैं॥19॥
इन 4 चार विवाहों से जो बाकी रहे 4 चार आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच, इन 4 चार दुष्ट विवाहों से उत्पन्न हुए सन्तान निन्दित कर्मकर्त्ता, मिथ्यावादी, वेदधर्म के द्वेषी, बड़े नीच स्वभाववाले होते हैं॥20॥
इसलिये मनुष्यों को योग्य है कि जिन निन्दित विवाहों से नीच प्रजा होती हैं, उन का त्याग और जिन उत्तम विवाहों से उत्तम प्रजा होती हैं, उन को किया करें॥21॥
उत्कृष्टायाभिरूपाय वराय सदृशाय च।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्विचक्षणः॥1॥
काममामरणात् तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि।
न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित्॥2॥
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यृतुमती सती।
ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद् विन्देत सदृशं पतिम्॥3॥
अर्थ—यदि माता-पिता कन्या का विवाह करना चाहें तो अति उत्कृष्ट शुभगुण, कर्म, स्वभाववाला, कन्या के सदृश रूपलावण्यादि गुणयुक्त वर ही को, चाहे वह कन्या-माता की छह पीढ़ी के भीतर भी हो, तथापि उसी को कन्या देना, अन्य को कभी न देना कि जिस से दोनों अति प्रसन्न होकर गृहाश्रम की उन्नति और उत्तम सन्तानों की उत्पत्ति करें॥1॥
चाहे मरण-पर्यन्त कन्या पिता के घर में विना विवाह के बैठी भी रहे, परन्तु गुणहीन असदृश, दुष्ट पुरुष के साथ कन्या का विवाह कभी न करे और वर-कन्या भी अपने आप स्वसदृश के साथ ही विवाह करें॥2॥
जब कन्या विवाह करने की इच्छा करे, तब रजस्वला होने के दिन से 3 तीन वर्ष को छोड़के 4 चौथे वर्ष में विवाह करे॥3॥
प्रश्न—‘अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा च रोहिणी।‘इत्यादि श्लोकों की क्या गति होगी ?
उत्तर — इन श्लोकों और इन के माननेवालों की दुर्गति, अर्थात् जो इन श्लोकों की रीति से बाल्यावस्था में अपने सन्तानों का विवाह कर-करा, उन को नष्ट-भ्रष्ट रोगी अल्पायु करते हैं, वे अपने कुल का जानो सत्यानाश कर रहे हैं। इसलिए यदि शीघ्र विवाह करें तो वेदारम्भ में लिखे हुए 16 सोलह वर्ष से न्यून कन्या और 25 पच्चीस वर्ष से न्यून पुरुष का विवाह कभी न करें-करावें। इस के आगे जितना अधिक ब्रह्मचर्य रक्खेंगे, उतना ही उन को आनन्द अधिक होगा।
प्रश्न — विवाह निकटवासियों से अथवा दूरवासियों से करना चाहिये?
उत्तर— ‘दुहिता दुर्हिता दूरे हिता भवतीति।’ यह निरुक्त का प्रमाण है कि—जितना दूरदेश में विवाह होगा, उतना ही उन्हें अधिक लाभ होगा।
प्रश्न—अपने गोत्र वा भाई-बहिनों का परस्पर विवाह क्यों नहीं होता?
उत्तर—एक—दोष यह है कि इन के विवाह होने में प्रीति कभी नहीं होती, क्योंकि जितनी प्रीति परोक्ष पदार्थ में होती है, उतनी प्रत्यक्ष में नहीं और बाल्यावस्था के गुण-दोष भी विदित रहते हैं तथा भयादि भी अधिक नहीं रहते। दूसरा—जब तक दूरस्थ एक-दूसरे कुल के साथ सम्बन्ध नहीं होता, तब तक शरीर आदि की पुष्टि भी पूर्ण नहीं होती। तीसरा—दूर सम्बन्ध होने से परस्पर प्रीति, उन्नति, ऐश्वर्य बढ़ता है, निकट से नहीं।
युवावस्था ही में विवाह का प्रमाण—
तमस्मे॑रा युव॒तयो॒ युवा॑नं मर्मृ॒ज्यमा॑नाः॒ परि॑ य॒न्त्यापः॑।
स शु॒क्रेभिः॒ शिक्व॑भी रे॒वद॒स्मे दी॒दाया॑नि॒ध्मो घृ॒तनि॑र्णिग॒प्सु॥1॥
अ॒स्मै ति॒स्रो अ॑व्य॒थ्याय॒ नारी॑र्दे॒वाय॑ दे॒वीर्दि॑धिष॒न्त्यन्न॑म्।
कृता॑ इ॒वोप॒ हि प्र॑स॒र्स्रे अ॒प्सु स पी॒यूषं॑ धयति पूर्व॒सूना॑म्॥2॥
अश्व॒स्यात्र॒ जनि॑मा॒स्य च॒ स्व॑र्द्रु॒हो रि॒षः स॒म्पृचः॑ पाहि सू॒रीन्।
आ॒मासु॑ पू॒र्षु प॒रो अ॑प्रमृ॒ष्यं नारा॑तयो॒ वि न॑श॒न्नानृ॑तानि॥3॥ऋ॰मं॰ 2। सू॰ 35। मं॰ 4-6॥
व॒धूरि॒यं पति॑मि॒च्छन्त्ये॑ति॒ य ईं॒ वहा॑ते॒ महि॑षीमिषि॒राम्।
आस्य॑ श्रवस्या॒द् रथ॒ आ च॑ घो॒षात् पु॒रू स॒हस्रा॒ परि॑वर्तयाते॥4॥ऋ॰मं॰ 5। सू॰ 37। मं॰ 3॥
उप॑ व॒ एषे॒ वन्द्ये॑भिः शू॒पैः प्र य॒ह्वी दि॒वश्चि॒तय॑द्भिर॒र्कैः।
उ॒षासा॒नक्ता॑ वि॒दुषी॑व॒ विश्व॒मा हा॑ वहतो॒ मर्त्या॑य य॒ज्ञम्॥5॥ऋ॰मं॰ 5। सू॰ 41। मं॰ 7॥
अर्थ—जो (मर्मृज्यमानाः) उत्तम ब्रह्मचर्यव्रत और सद्विद्याओं से अत्यन्त (युवतयः) बीसवें वर्ष से चौबीसवें वर्षवाली हैं, वे कन्या लोग जैसे (आपः) जल वा नदी समुद्र को प्राप्त होती हैं, वैसे (अस्मेराः) हम को प्राप्त होनेवाली, अपने-अपने प्रसन्न, अपने-अपने से डेढ़े वा दूने आयुवाले, (तम्) उस ब्रह्मचर्य और विद्या से परिपूर्ण, शुभलक्षणयुक्त (युवानम्) जवान पति को (परियन्ति) अच्छे प्रकार प्राप्त होती हैं। (सः) वह ब्रह्मचारी (शुक्रेभिः) शुद्ध गुण और (शिक्वभिः) वीर्यादि से युक्त होके (अस्मे) हमारे मध्य में (रेवत्) अत्यन्त श्रीयुक्त कर्म को, और (दीदाय) अपने तुल्य युवती स्त्री को प्राप्त होवे। जैसे (अप्सु) अन्तरिक्ष वा समुद्र में (घृतनिर्णिक्) जल को शोधन करनेहारा (अनिध्मः) आप प्रकाशित विद्युत् अग्नि है, इसी प्रकार स्त्री और पुरुष के हृदय में प्रेम बाहर अप्रकाशमान भीतर सुप्रकाशित रहकर उत्तम सन्तान और अत्यन्त आनन्द को गृहाश्रम में दोनों स्त्री-पुरुष प्राप्त होवें॥1॥
हे स्त्री-पुरुषो ! जैसे (तिस्रः) उत्तम मध्यम तथा निकृष्ट स्वभावयुक्त, (देवीः नारीः) विद्वान् नरों की विदुषी स्त्रियां (अस्मै) इस (अव्यथ्याय) पीड़ा से रहित (देवाय) काम के लिये (अन्नम्) अन्नादि उत्तम पदार्थों को (दिधिषन्ति) धारण करती हैं, (कृता इव) की हुई शिक्षायुक्त के समान (अप्सु) प्राणवत् प्रीति आदि व्यवहारों में प्रवृत्त होने के लिये स्त्री से पुरुष और पुरुष से स्त्री (उप प्रसर्स्रे) सम्बन्ध को प्राप्त होती है, (सः हि) वही पुरुष और स्त्री आनन्द को प्राप्त होती है। जैसे जलों में (पीयूषम्) अमृतरूप रस को (पूर्वसूनाम्) प्रथम प्रसूत हुई स्त्रियों का बालक (धयति) दुग्ध पीके बढ़ता है, वैसे इन ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी स्त्री के सन्तान यथावत् बढ़ते हैं॥2॥
जैसे राजादि सब लोग (पूर्षु) अपने नगरों और (आमासु) अपने घर में उत्पन्न हुए पुत्र और कन्यारूप प्रजाओं में उत्तम शिक्षाओं को (परः) उत्तम विद्वान् (अप्रमृष्यम्) शत्रुओं को सहने के अयोग्य, ब्रह्मचर्य से प्राप्त हुए शरीरात्मबलयुक्त देह को (अरातयः) शत्रु लोग (न) नहीं (विनशन्) विनाश कर सकते, और (अनृतानि) मिथ्याभाषणादि दुष्ट दुर्व्यसनों को प्राप्त (न) नहीं होते, वैसे उत्तम स्त्री-पुरुषों को (द्रुहः) द्रोह आदि दुर्गुण और (रिषः) हिंसा आदि पाप (न सम्पृचः) सम्बन्ध नहीं करते। किन्तु जो युवावस्था में विवाह कर प्रसन्नतापूर्वक विधि से सन्तानोत्पत्ति करते हैं, इनके (अस्य) इस (अश्वस्य) महान् गृहाश्रम के मध्य में उत्तम बालकों का (जनिम) जन्म होता है। इसलिये हे स्त्रि वा पुरुष ! तू (सूरीन्) विद्वानों की (पाहि) रक्षा कर। (च) और ऐसे गृहस्थों को (अत्र) इस गृहाश्रम में सदैव (स्वः) सुख बढ़ता रहता है॥3॥
हे मनुष्यो! (यः) जो पूर्वोक्त लक्षणयुक्त पूर्ण जवान (ईम्) सब प्रकार की परीक्षा करके (महिषीम्) उत्तम कुल में उत्पन्न हुई विद्या शुभ गुणरूप सुशीलतादियुक्त (इषिराम्) वर की इच्छा करनेहारी, हृदय को प्रिय स्त्री को (एति) प्राप्त होता है, और जो (पतिम्) विवाह से अपने स्वामी की (इच्छन्ती) इच्छा करती हुई, (इयम्) यह (वधूः) स्त्री अपने सदृश, हृदय को प्रिय पति को (एति) प्राप्त होती है। वह पुरुष वा स्त्री (अस्य) इस गृहाश्रम के मध्य (आश्रवस्यात्) अत्यन्त विद्या धन धान्य युक्त सब ओर से होवे। और वे दोनों (रथः) रथ के समान (आघोषात्) परस्पर प्रिय वचन बोलें। (च) और सब गृहाश्रम के भार को (वहाते) उठा सकते हैं। तथा वे दोनों (पुरु) बहुत (सहस्रा) असङ्ख्य उत्तम कार्यों को (परिवर्तयाते) सब ओर से सिद्ध कर सकते हैं॥4॥
हे मनुष्यो! यदि तुम पूर्ण ब्रह्मचर्य से सुशिक्षित विद्यायुक्त अपने सन्तानों को कराके स्वयंवर विवाह कराओ, तो वे (वन्द्येभिः) कामना के योग्य (चितयद्भिः) सब सत्य विद्याओं को जनानेहारे, (अर्कैः) सत्कार के योग्य, (शूषैः) शरीरात्मबलों से युक्त होके (वः) तुम्हारे लिये (एषे) सब सुख प्राप्त कराने को समर्थ होवें। और वे (उषासानक्ता) जैसे दिन और रात तथा जैसे (विदुषीव) विदुषी स्त्री और विद्वान् पुरुष (विश्वम्) गृहाश्रम के सम्पूर्ण व्यवहार को (आवहतः) सब ओर से प्राप्त होते हैं, (ह) वैसे ही इस (यज्ञम्) सङ्गतरूप गृहाश्रम के व्यवहार को वे स्त्री-पुरुष पूर्ण कर सकते हैं। और (मर्त्याय) मनुष्यों के लिये यही पूर्वोक्त विवाह पूर्ण सुखदायक है। और (यह्वी) बड़े ही शुभ गुण, कर्म, स्वभाववाले स्त्री-पुरुष दोनों (दिवः) कामनाओं को (उप प्र वहतः) अच्छे प्रकार प्राप्त हो सकते हैं, अन्य नहीं॥5॥
जैसे ब्रह्मचर्य में कन्या का ब्रह्मचर्य वेदोक्त है, वैसे ही सब पुरुषों को ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ पूर्ण जवान हो परस्पर परीक्षा करके, जिस से जिस की विवाह करने में पूर्ण प्रीति हो, उसी से उस का विवाह होना अत्युत्तम है। जो कोई युवावस्था में विवाह न कराके बाल्यावस्था में अनिच्छित अयोग्य वर कन्या का विवाह करावेंगे, वे वेदोक्त ईश्वराज्ञा के विरोधी होकर महादुःखसागर में क्योंकर न डूबेंगे? और जो पूर्वोक्त विधि से विवाह करते-कराते हैं, वे ईश्वराज्ञा के अनुकूल होने से पूर्ण सुख को प्राप्त होते हैं।
प्रश्न — विवाह अपने-अपने वर्ण में होना चाहिये, वा अन्य वर्ण में भी?
उत्तर — अपने-अपने वर्ण में। परन्तु वर्णव्यवस्था गुण, कर्मों के अनुसार होनी चाहिये, जन्ममात्र से नहीं। जो पूर्ण विद्वान् धर्मात्मा परोपकारी जितेन्द्रिय मिथ्याभाषणादि दोषरहित, विद्या और धर्मप्रचार में तत्पर रहे, इत्यादि उत्तम गुण जिस में हों, वह ब्राह्मण-ब्राह्मणी। विद्या, बल, शौर्य, न्यायकारित्वादि गुण जिस में हों, वह क्षत्रिय-क्षत्रिया और विद्वान् होके कृषि पशु-पालन व्यापार देशभाषाओं में चतुरतादि गुण जिस में हों, वह वैश्य-वैश्या और जो विद्याहीन मूर्ख हो, वह शूद्र-शूद्रा कहावे। इसी क्रम से विवाह होना चाहिए, अर्थात् ब्राह्मण का ब्राह्मणी, क्षत्रिय का क्षत्रिया, वैश्य का वैश्या, और शूद्र का शूद्रा के साथ ही विवाह होने में आनन्द होता है, अन्यथा नहीं।
इस वर्णव्यवस्था में प्रमाण—
धर्मचर्यया जघन्यो वर्णः पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ॥1॥
अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णो जघन्यं जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ॥2॥आपस्तम्बे॥
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
क्षत्रियाज्जातमेवन्तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च॥3॥मनुस्मृतौ॥
अर्थ— धर्माचरण से नीच वर्ण उत्तम-उत्तम वर्ण को प्राप्त होता है। और उस वर्ण में जो-जो कर्त्तव्य अधिकाररूप कर्म हैं, वे सब गुण, कर्म उस पुरुष और स्त्री को प्राप्त होवें॥1॥ वैसे ही अधर्माचरण से उत्तम-उत्तम वर्ण नीचे-नीचे के वर्ण को प्राप्त होवें। और वे ही उस-उस वर्ण के अधिकार और कर्मों के कर्त्ता होवें॥2॥ उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव से जो शूद्र है, वह वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण तथा क्षत्रिय, ब्राह्मण वर्ण के अधिकार और कर्मों को प्राप्त होता है। वैसे ही नीच कर्म और गुणों से जो ब्राह्मण है, वह क्षत्रिय वैश्य शूद्र; और क्षत्रिय वैश्य शूद्र तथा वैश्य शूद्र वर्ण के अधिकार और कर्मों को प्राप्त होता है॥3॥
इसी प्रकार वर्णव्यवस्था होने से पक्षपात न होकर सब वर्ण उत्तम बने रहते, और उत्तम बनने में प्रयत्न करते। और उत्तम वर्ण भय से कि मैं नीच वर्ण न हो जाऊं, इसलिये बुरे कर्म छोड़ उत्तम कर्मों ही को किया करते हैं। इस से संसार की बड़ी उन्नति है। आर्यावर्त्त देश में जब तक ऐसी वर्णव्यवस्था, पूर्वोक्त ब्रह्मचर्य विद्याग्रहण उत्तमता से स्वयंवर विवाह होता था, तभी देश की उन्नति थी। अब भी ऐसा ही होना चाहिये, जिस से आर्यावर्त्त देश अपनी पूर्वावस्था को प्राप्त होकर आनन्दित होवे।
अब वधू-वर एक-दूसरे के गुण, कर्म और स्वभाव की परीक्षा इस प्रकार करें—
दोनों का तुल्य शील, समान बुद्धि, समान आचार, समान रूपादि गुण, अहिंसकता, सत्य मधुरभाषण, कृतज्ञता, दयालुता, अहङ्कार, मत्सर, ईर्ष्या, काम, क्रोध, निर्लोभता, देश का सुधार, विद्याग्रहण, सत्योपदेश करने में निर्भयता, उत्साह; कपट, द्यूत, चोरी, मद्य-मांसाहारादि दोषों का त्याग, गृह कामों में अतिचतुरता हो। जब-जब प्रातःसायं वा परदेश से आकर मिलें, तब-तब ‘नमस्ते’ इस वाक्य से परस्पर नमस्कार कर, स्त्री पति के चरणस्पर्श, पादप्रक्षालन, आसनदान करे। तथा दोनों परस्पर प्रेम बढ़ानेहारे वचनादि व्यवहारों से वर्त्तकर आनन्द भोगें। वर के शरीर से स्त्री का शरीर पतला और पुरुष के स्कन्धे के तुल्य स्त्री का शिर होना चाहिये। तत्पश्चात् भीतर की परीक्षा स्त्री-पुरुष वचनादि-व्यवहारों से करें।
ओम् ऋतमग्रे प्रथमं जज्ञ ऋते सत्यं प्रतिष्ठितम्। यदियं कुमार्य्यभिजाता तदियमिह प्रतिपद्यताम्। यत्सत्यं तद् दृश्यताम्॥
अर्थ—जब विवाह करने का समय निश्चय हो चुके, तब कन्या चतुर पुरुषों से वर की, और वर चतुर स्त्रियों से कन्या की परोक्ष में परीक्षा करावे। पश्चात् उत्तम विद्वान् स्त्री-पुरुषों की सभा करके दोनों परस्पर संवाद करें कि— ‘हे स्त्री वा हे पुरुष! इस जगत् के पूर्व ऋत=यथार्थस्वरूप महत्तत्व उत्पन्न हुआ था और उस महत्तत्व में सत्य, त्रिगुणात्मक, नाशरहित प्रकृति प्रतिष्ठित है। जैसे पुरुष और प्रकृति के योग से विश्व उत्पन्न हुआ है, वैसे मैं कुमारी और मैं कुमार पुरुष इस समय दोनों विवाह करने की सत्य प्रतिज्ञा करती वा करता हूँ। उस को यह कन्या और मैं वर प्राप्त होवें और अपनी प्रतिज्ञा को सत्य करने के लिए दृढोत्साही रहें॥"
विधि—जब कन्या रजस्वला होकर पृष्ठ 27-28 में लिखे प्रमाणे शुद्ध हो जाय, तब जिस दिन गर्भाधान की रात्रि निश्चित की हो, उस रात्रि में विवाह करने के लिए प्रथम ही सब सामग्री जोड़ रखनी चाहिए और पृष्ठ 12-17 में लिखे प्रमाणे यज्ञशाला, वेदी, ऋत्विक्, यज्ञपात्र, शाकल्य आदि सब सामग्री शुद्ध करके रखनी उचित है। पश्चात्[3]एक घण्टेमात्र रात्रि जाने पर—
ओं काम वेद ते नाम मदो नामासि समानयामुं सुरा ते अभवत्।
परमत्र जन्माग्रे तपसो निर्मितोऽसि स्वाहा॥1॥
ओम् इमं त उपस्थं मधुना संसृजामि प्रजापतेर्मुखमेतत् द्वितीयम्।
तेन पुंसोभिभवासि सर्वानवशान्वशिन्यसि राज्ञि स्वाहा॥2॥
ओम् अग्निं क्रव्यादमकृण्वन् गुहानाः स्त्रीणामुपस्थमृषयः पुराणाः।
तेनाज्यमकृण्वंस्त्रैशृङ्गं त्वाष्ट्रं त्वयि तद्दधातु स्वाहा ॥3॥
इन मन्त्रों से सुगन्धित शुद्ध जल से पूर्ण कलशों को लेके वधू और वर स्नान कर, पश्चात् वधू उत्तम वस्त्रालङ्कार धारण करके उत्तम आसन पर पूर्वाभिमुख बैठे। तत्पश्चात् पृष्ठ 4 से 11 तक लिखे प्रमाणेईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरणकरें। तत्पश्चात् पृष्ठ 18-19 में लिखे प्रमाणेअग्न्याधान समिदाधान, पृष्ठ 13 में लिखे प्रमाणे स्थालीपाक आदि यथोक्त कर वेदी के समीप रखे। वैसे ही वर भी एकान्त अपने घर में जाके उत्तम वस्त्रालङ्कार [धारण] करके यज्ञशाला में आ उत्तमासन पर पूर्वाभिमुख बैठके पृष्ठ 4-11 में लिखे प्रमाणे[4]ईश्वरस्तुति-प्रार्थनोपासनाकर वधू के घर को जाने का ढंग करे।
तत्पश्चात् कन्या के और वर पक्ष के पुरुष बड़े सम्मान से वर को घर ले जावें। जिस समय वर वधू के घर में प्रवेश करे, उसी समय वधू और कार्यकर्त्ता मधुपर्क आदि से वर का निम्नलिखित प्रकार से आदर-सत्कार करें—
उस की रीति यह है कि वर वधू के घर में प्रवेश करके पूर्वाभिमुख खड़ा रहे और वधू तथा कार्यकर्त्ता वर के समीप उत्तराभिमुख खड़े रहके, वधू और कार्यकर्त्ता—
ओं साधु भवानास्तामर्चयिष्यामो भवन्तम्॥
इस वाक्य को बोलें। उस पर वर—
ओम् अर्चय॥
ऐसा प्रत्युत्तर देवे।
पुनः जो वधू और कार्यकर्त्ता ने वर के लिये उत्तम आसन सिद्ध कर रखा हो, उस को वधू हाथ में ले वर के आगे खड़ी रहके—
ओं विष्टरो विष्टरो विष्टरः प्रतिगृह्यताम्॥
यह उत्तम आसन है, आप ग्रहण कीजिये। वर—
ओं प्रतिगृह्णामि॥
इस वाक्य को बोलके वधू के हाथ से आसन ले, बिछा उस पर सभामण्डप में पूर्वाभिमुख बैठके, वर—
ओं वर्ष्मोऽस्मि समानानामुद्यतामिव सूर्यः।
इमं तमभितिष्ठामि यो मा कश्चाभिदासति॥
इस मन्त्र को बोले।
तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता एक सुन्दर पात्र में पूर्ण जल भरके कन्या के हाथ में देवे और कन्या—
ओं पाद्यं पाद्यं पाद्यं प्रतिगृह्यताम्॥
इस वाक्य को बोलके वर के आगे धरे। पुनः वर—
ओं प्रतिगृह्णामि॥
इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से उदक ले पग-प्रक्षालन[5]करे और उस समय—
ओं विराजो दोहोऽसि विराजो दोहमशीय मयि पाद्यायै विराजो दोहः॥
इस मन्त्र को बोले।
तत्पश्चात् फिर भी कार्यकर्त्ता दूसरा शुद्ध लोटा पवित्र जल से भर कन्या के हाथ में देवे। पुनः कन्या—
ओम् अर्घोऽर्घोऽर्घः प्रतिगृह्यताम्॥
इस वाक्य को बोलके वर के हाथ में देवे। और वर—
ओं प्रतिगृह्णामि॥
इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से जलपात्र लेके, उस से मुखप्रक्षालन करे और उसी समय वर मुख धोके—
ओम् आप स्थ युष्माभिः सर्वान् कामानवाप्नवानि॥1॥
ओं समुद्रं वः प्रहिणोमि स्वां योनिमभिगच्छत।
अरिष्टा अस्माकं वीरा मा परासेचि मत्पयः॥2॥
इन मन्त्रों को बोले। तत्पश्चात् वेदी के पश्चिम बिछाये हुए उसी शुभासन पर पूर्वाभिमुख बैठे।
तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता एक सुन्दर उपपात्र जल से पूर्ण भर, उस मंर आचमनी रख, कन्या के हाथ में देवे। और उस समय कन्या—
ओम् आचमनीयमाचमनीयमाचमनीयं प्रतिगृह्यताम्॥
इस वाक्य को बोलके वर के सामने करे। और वर—
ओं प्रतिगृह्णामि॥
इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ में से जलपात्र को ले सामने धर, उस में से दाहिने हाथ में जल, जितना अंगुलियों के मूल तक पहुंचे उतना लेके, वर—
ओम् आ मागन् यशसा संसृज वर्चसा।
तं मा कुरु प्रियं प्रजानामधिपतिं पशूनामरिष्टिं तनूनाम्॥
इस मन्त्र से एक आचमन। इसी प्रकार दूसरी और तीसरी वार इसी मन्त्र को पढ़के दूसरा और तीसरा आचमन करे।
तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता मधुपर्क[6]का पात्र कन्या के हाथ में देवे और कन्या—
ओं मधुपर्को मधुपर्को मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम्॥
ऐसी विनति वर से करे और वर—
ओं प्रतिगृह्णामि॥
इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से ले और उस समय—
ओं मि॒त्रस्य॑ त्वा॒ चक्षु॑षा॒ प्रती॑क्षे॥
इस मन्त्रस्थ वाक्य को बोलके मधुपर्क को अपनी दृष्टि से देखे और—
ओं दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनोर्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्यां॒ प्रति॑ गृह्णामि॥
इस मन्त्र को बोलके मधुपर्क के पात्र को वाम हाथ में लेवे और—
ओं भूर्भुवः॒ स्वः। मधु॒ वाता॑ ऋताय॒ते मधु॑ क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वः। माध्वी॑र्नः स॒न्त्वोष॑धीः॥1॥
ओं भूर्भुवः॒ स्वः। मधु॒ नक्त॑मु॒तोषसो॒ मधु॑म॒त्पार्थि॑वं॒ रजः॑। मधु॒ द्यौर॑स्तु नः पि॒ता॥2॥
ओं भूर्भुवः॒ स्वः। मधु॑मान्नो॒ वन॒स्पति॒र्मधु॑माँ अस्तु॒ सूर्यः॑। माध्वी॒र्गावो॑ भवन्तु नः॥3॥
इन 3 तीन मन्त्रों से मधुपर्क की ओर अवलोकन करे।
ओं नमः श्यावास्यायान्नशने यत्त आविद्धं तत्ते निष्कृन्तामि॥
इस मन्त्र को पढ़, दाहिने हाथ की अनामिका और अङ्गुष्ठ से मधुपर्क को तीन वार बिलोवे और उस मधुपर्क में से वर—
ओं वसवस्त्वा गायत्रेण च्छन्दसा भक्षयन्तु॥
—इस मन्त्र से पूर्व दिशा।
ओं रुद्रास्त्वा त्रैष्टुभेन च्छन्दसा भक्षयन्तु॥
—इस मन्त्र से दक्षिण दिशा।
ओम् आदित्यास्त्वा जागतेन च्छन्दसा भक्षयन्तु॥
—इस मन्त्र से पश्चिम दिशा, और
ओं विश्वे त्वा देवा आनुष्टुभेन च्छन्दसा भक्षयन्तु॥
—इस मन्त्र से उत्तर दिशा में थोड़ा-थोड़ा छोड़े, अर्थात् छींटे देवे।
ओं भूतेभ्यस्त्वा परिगृह्णामि॥
इस मन्त्रस्थ वाक्य को बोलके पात्र के मध्य भाग में से लेके ऊपर की ओर तीन वार फेंकना। तत्पश्चात् उस मधुपर्क के तीन भाग करके तीन कांसे के पात्रों में धर, भूमि में अपने सम्मुख तीनों पात्र रखे। रखके—
ओं यन्मधुनो मधव्यं परमं रूपमन्नाद्यम्। तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण रूपेणान्नाद्येन परमो मधव्योऽन्नादोऽसानि॥
इस मन्त्र को एक-एक वार बोलके एक-एक भाग में से वर थोड़ा-थोड़ा प्राशन करे वा सब प्राशन करे। जो उन पात्रों में शेष उच्छिष्ट मधुपर्क रहा हो, वह किसी अपने सेवक को देवे वा जल में डाल देवे। तत्पश्चात्—
ओम् अमृतापिधानमसि स्वाहा॥
ओं सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा॥
इन दो मन्त्रों से दो आचमन, अर्थात् एक से एक और दूसरे से दूसरा वर करे। तत्पश्चात् वर पृष्ठ 18 में लिखे प्रमाणे चक्षुरादि इन्द्रियों का जल से स्पर्श करे। पश्चात् कन्या—
ओं गौर्गौर्गौः प्रतिगृह्यताम्॥
इस वाक्य से वर की विनति करके अपनी शक्ति के योग्य वर को गोदानादि द्रव्य, जो कि वर के योग्य हो, अर्पण करे। और वर—
ओं प्रतिगृह्णामि॥
इस वाक्य से उस को ग्रहण करे। इस प्रकार मधुपर्क विधि यथावत् करके, वधू और कार्यकर्त्ता वर को सभामण्डपस्थान से घर में ले जाके शुभ आसन पर पूर्वाभिमुख बैठाके, वर के सामने पश्चिमाभिमुख वधू को बैठावे।[7]
और कार्यकर्त्ता उत्तराभिमुख बैठके—
ओम् अमुक[8]गोत्रोत्पन्नामिमाममुकनाम्नीम्[9]अलङ्कृतां कन्यां
प्रतिगृह्णातु भवान्॥
इस प्रकार बोलके वर का हाथ चत्ता अर्थात् हथेली ऊपर रखके, उसके हाथ में वधू का दक्षिण हाथ चत्ता ही रखना, और वर—
ओं प्रतिगृह्णामि॥ऐसा बोलके—
ओं जरां गच्छ परिधत्स्व वासो भवा कृष्टीनामभिशस्तिपावा। शतं च जीव शरदः सुवर्चा रयिं च पुत्राननुसंव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः॥
इस मन्त्र को बोलके वधू को उत्तम वस्त्र देवे। तत्पश्चात्—
ओं या अकृन्तन्नवयन् या अतन्वत याश्च देवीस्तन्तूनभितो ततन्थ। तास्त्वा देवीर्जरसे संव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः॥
इस मन्त्र को बोलके वधू को वर उपवस्त्र देवे और उन वस्त्रों को वधू ले के दूसरे घर में एकान्त में जा उन्हीं वस्त्रों को धारण कर और उपवस्त्र को यज्ञोपवीतवत् धारण करे।
ओं परिधास्यै यशोधास्यै दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि। शतं च जीवामि शरदः पुरूची रायस्पोषमभिसंव्ययिष्ये॥
इस मन्त्र को पढ़के वर आप अधोवस्त्र धारण करे। और—
ओं यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेन्द्राबृहस्पती।
यशो भगश्च मा विदद्यशो मा प्रतिपद्यताम्॥
इस मन्त्र को पढ़के द्विपट्टा (दुपट्टा) धारण करे।
इस प्रकार वधू वस्त्र-परिधान करके जब तक संभले, तब तक कार्यकर्त्ता अथवा दूसरा कोई यज्ञमण्डप में जा कुण्ड के समीपस्थ हो पृष्ठ 19 में लिखे प्रमाणे इन्धन और कर्पूर वा घृत से कुण्ड के अग्नि को प्रदीप्त करे और आहुति के लिए सुगन्ध डाला हुआ घी बटलोई में करके कुण्ड के अग्नि पर गरम कर, कांसे के पात्र में रक्खे और स्रुवादि होम के पात्र तथा जलपात्र इत्यादि सामग्री यज्ञकुण्ड के समीप जोड़कर रक्खे।
और वरपक्ष का एक पुरुष शुद्ध वस्त्र धारण कर, शुद्ध जल से पूर्ण एक कलश को लेके यज्ञकुण्ड की परिक्रमा कर कुण्ड के दक्षिण भाग में उत्तराभिमुख हो कलशस्थापन, अर्थात् भूमि पर अच्छे प्रकार अपने आगे धरके, जब तक विवाह का कृत्य पूरण न हो जाय, तब तक उत्तराभिमुख बैठा रहे।
और उसी प्रकार वर के पक्ष का दूसरा पुरुष हाथ में दण्ड लेके कुण्ड के दक्षिणभाग में कार्य-समाप्ति पर्यन्त उत्तराभिमुख बैठा रहे।
और इसी प्रकार सहोदर वधू का भाई अथवा सहोदर न हो तो चचेरा भाई, मामा का पुत्र अथवा मौसी का लड़का हो, वह चावल वा जुआर की धाणी और शमी वृक्ष के सूखे पत्ते इन दोनों को मिला कर शमीपत्रयुक्त धाणी की 4 चार अञ्जलि एक शुद्ध सूप में रखके, धाणीसहित सूप लेके यज्ञकुण्ड के पश्चिमभाग में पूर्वाभिमुख बैठा रहे।
तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता एक सपाट शिला, जो कि सुन्दर चिकनी हो उस को तथा वधू और वर को कुण्ड के समीप बैठाने के लिए दो कुशासन वा यज्ञिय तृणासन अथवा यज्ञिय वृक्ष की छाल के, जो कि प्रथम से सिद्ध कर रक्खे हों, उन आसनों को रखवावे।
तत्पश्चात् वस्त्र धारण की हुई कन्या को कार्यकर्त्ता वर के सम्मुख लावे और उस समय वर और कन्या—
ओं सम॑ञ्जन्तु॒ विश्वे॑ दे॒वाः समापो॒ हृद॑यानि नौ।
सं मा॑त॒रिश्वा॒ सं धा॒ता समु॒ देष्ट्री॑ दधातु नौ[10]॥1॥
इस मन्त्र को बोलें। तत्पश्चात् वर अपने दक्षिण हाथ से वधू का दक्षिण हाथ पकड़के—
ओं यदैषि मनसा दूरं दिशोऽनुपवमानो वा।
हिरण्यपर्णो वैकर्णः स त्वा मन्मनसां करोतु असौ[11]॥2॥
इस मन्त्र को बोलके, उस को लेके घर के बाहर मण्डपस्थान में कुण्ड के समीप हाथ पकड़े हुए दोनों आवें और वधू तथा वर—
ओं भूर्भुवः॒ स्वः। अघो॑रचक्षु॒रप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॒ सु॒मनाः॑ सु॒वर्चाः॑।
वी॒र॒सूर्दे॒वृका॑मा स्यो॒ना शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे[12]॥3॥
ओं भूर्भुवः स्वः। सा नः पूषा शिवतमामैरय सा न ऊरू उशती विहर।
यस्यामुशन्तः प्रहराम शेफं यस्यामु कामा बहवो निविष्ट्यै॥
इन 4 चार मन्त्रों को वर बोलके, दोनों वर वधू यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करके, कुण्ड के पश्चिम भाग में प्रथम स्थापन किये हुए आसन पर पूर्वाभिमुख वर के दक्षिण भाग में वधू और वधू के वाम भाग में वर बैठके, वधू—
ओं प्र मे पतियानः पन्थाः कल्पतां शिवा अरिष्टा पतिलोकं गमेयम्॥
इस मन्त्र को बोले।
तत्पश्चात् पृष्ठ 17-18 में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड के समीप दक्षिण भाग में उत्तराभिमुख पुरोहित की स्थापना करनी। तत्पश्चात् पृष्ठ 18 में लिखे प्रमाणे (ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा) इत्यादि तीन मन्त्रों से प्रत्येक मन्त्र से एक-एक आचमन, वैसे तीन आचमन वर-वधू और पुरोहित और कार्यकर्त्ता करके, हस्त और मुख-प्रक्षालन एक शुद्धपात्र में करके दूर रखवा दें। हाथ और मुख पोंछके पृ॰ 19 में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड में (ओं भूर्भुवः स्वर्द्यौरिव॰) इस मन्त्र से अग्न्याधान पृ॰ 19 में लिखे प्रमाणे (ओम् अयन्त इध्म॰) इत्यादि मन्त्रों सेसमिदाधान, और पृष्ठ 20 में लिखे प्रमाणे (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि 3 तीन मन्त्रों से कुण्ड के तीन ओर, और (ओं देव सवितः प्रसुव॰) इस मन्त्र से कुण्ड के चारों ओर दक्षिण हाथ की अञ्जलि से शुद्ध जल सेचन करके, कुण्ड में डाली हुई समिधा प्रदीप्त हुए पश्चात् पृष्ठ 20-21 में लिखे प्रमाणे वधू-वर पुरोहित और कार्यकर्त्ताआघारावाज्यभागाहुति4 चार घी की देवें। तत्पश्चात् पृ॰ 21 में लिखे प्रमाणेव्याहृतिआहुति 4 चार घी की और पृष्ठ 22-23 में लिखे प्रमाणेअष्टाज्याहुति8 आठ, ये सब मिलके 16 सोलह आज्याहुति देके प्रधान होम का प्रारम्भ करें।
प्रधान होम के समय वधू अपने दक्षिण हाथ को वर के दक्षिण स्कन्धे पर स्पर्श करके पृ॰ 21-22 में लिखे प्रमाणे (ओं भूर्भुवः स्वः। अग्न आयूंषि॰) इत्यादि 4 चार मन्त्रों से अर्थात् एक-एक से एक-एक मिलके 4 चार आज्याहुति क्रम से करें। और—
ओं भूर्भुवः॒ स्वः। त्व॑मर्य॒मा भ॑वसि॒ यत्क॒नीनां॒ नाम॑ स्वधाव॒न्गुह्यं॑ बिभर्षि।
अ॒ञ्जन्ति॑ मि॒त्रं सुधि॑तं॒ न गोभि॒र्यद्दम्प॑ती॒ सम॑नसा कृणोषि॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नये इदन्न मम॥
इस मन्त्र को बोलके 5 पांचवीं आज्याहुति देनी। तत्पश्चात्—
ओम् ऋ॑ता॒षाड् ऋ॒तधा॑मा॒ग्निर्ग॑न्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट्॥ इदमृताषाहे ऋतधाम्नेऽग्नये गन्धर्वाय इदन्न मम॥1॥
ओम् ऋ॑ता॒षाडृ॒तधा॑मा॒ग्निर्ग॑न्ध॒र्वस्तस्यौ॑षधयोऽप्स॒रसो॒ मुदो॒ नाम॑। ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदमोषधिभ्योऽप्सरोभ्यो मुद्भ्यः इदन्न मम॥2॥
ओं सं॑हि॒तो वि॒श्वसा॑मा॒ सूर्यो॑ गन्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॑ स्वाहा॒ वाट्॥ इदं संहिताय विश्वसाम्ने सूर्याय गन्धर्वाय इदन्न मम॥3॥
ओं सं॑हि॒तो वि॒श्वसा॑मा॒ सूर्यो॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॒ मरी॑चयोऽप्स॒रस॑ आ॒युवो॒ नाम॑। ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदं मरीचिभ्योऽप्सरोभ्य आयुभ्यः इदन्न मम॥4॥
ओं सु॑षु॒म्णः सूय॑र्रश्मिश्च॒न्द्रमा॑ गन्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट्॥ इदं सुषुम्णाय सूर्यरश्मये चन्द्रमसे गन्धर्वाय इदन्न मम॥5॥
ओं सु॑षु॒म्णः सूर्य॑रश्मिश्च॒न्द्रमा॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॒ नक्ष॑त्राण्यप्स॒रसो॑ भे॒कुर॑यो॒ नाम॑। ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदं नक्षत्रेभ्योऽप्सरोभ्यो भेकुरिभ्यः इदन्न मम॥6॥
ओम् इ॑षि॒रो वि॒श्वव्य॑चा॒ वातो॑ गन्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट्॥ इदमिषिराय विश्वव्यचसे वाताय गन्धर्वाय इदन्न मम॥7॥
ओम् इ॑षि॒रो वि॒श्वव्य॑चा॒ वातो॑ गन्ध॒र्वर्स्तस्यापो॑ अप्स॒रस॒ ऊर्ज्जो॒ नाम॑ ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदमद्भ्योऽप्सरोभ्यऽऊर्ग्भ्यः इदन्न मम॥8॥
ओं भु॒ज्युः सुप॒र्णो य॒ज्ञो ग॑न्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट्॥ इदं भुज्यवे सुपर्णाय यज्ञाय गन्धर्वाय इदन्न मम॥9॥
ओं भु॒ज्युः सु॑प॒र्णो य॒ज्ञो ग॑न्ध॒र्वस्तस्य॒ दक्षि॑णा अप्स॒रस॑ स्ता॒वा नाम॑। ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदं दक्षिणाभ्योऽप्सरोभ्यः स्तावाभ्यः इदन्न मम॥10॥
ओं प्र॒जाप॑तिर्वि॒श्वव॑र्मा॒ मनो॑ गन्ध॒र्वः। स न॑ इ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट्॥ इदं प्रजापतये विश्वकर्मणे मनसे गन्धर्वाय इदन्न मम॥11॥
ओं प्र॒जाप॑तिर्वि॒श्वक॑र्मा॒ मनो॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॑ ऋक्सा॒मान्य॑प्स॒रस॒ एष्ट॑यो॒ नाम॑। ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥ इदमृक्सामेभ्योऽप्सरोभ्य एष्टिभ्यः इदन्न मम॥12॥
इन 12 बारह मन्त्रों से 12 बारह आज्याहुति देनी।
तत्पश्चात् जयाहोम करना—
ओं चित्तं च स्वाहा॥ इदं चित्ताय इदन्न मम॥1॥
ओं चित्तिश्च स्वाहा॥ इदं चित्त्यै इदन्न मम॥2॥
ओम् आकूतं च स्वाहा॥ इदमाकूताय इदन्न मम॥3॥
ओं आकूतिश्च स्वाहा॥ इदमाकूत्यै इदन्न मम॥4॥
ओं विज्ञातं च स्वाहा॥ इदं विज्ञाताय इदन्न मम॥5॥
ओं विज्ञातिश्च स्वाहा॥ इदं विज्ञात्यै इदन्न मम॥6॥
ओं मनश्च स्वाहा॥ इदं मनसे इदन्न मम॥7॥
ओं शक्वरीश्च स्वाहा॥ इदं शक्वरीभ्यः इदन्न मम॥8॥
ओं दर्शश्च स्वाहा॥ इदं दर्शाय इदन्न मम॥9॥
ओं पौर्णमासं च स्वाहा॥ इदं पौर्णमासाय इदन्न मम॥10॥
ओं बृहच्च स्वाहा॥ इदं बृहते इदन्न मम॥11॥
ओं रथन्तरं च स्वाहा॥ इदं रथन्तराय इदन्न मम॥12॥
ओं प्रजापतिर्जयानिन्द्राय वृष्णे प्रायच्छदुग्रः पृतना जयेषु।
तस्मै विशः समनमन्त सर्वाः स उग्रः स इहव्यो बभूव स्वाहा॥ इदं प्रजापतये जयानिन्द्राय इदन्न मम॥13॥
इन मन्त्रों से प्रत्येक से एक-एक करके जयाहोम की 13 तेरह आज्याहुति देनी।
तत्पश्चात् अभ्यातन होम करना। इसके मन्त्र ये हैं—
ओम् अग्निर्भूतानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदमग्नये भूतानामधिपतये इदन्न मम॥1॥
ओम् इन्द्रो ज्येष्ठानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदमिन्द्राय ज्येष्ठानामधिपतये इदन्न मम॥2॥
ओं यमः पृथिव्याऽअधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं यमाय पृथिव्या अधिपतये इदन्न मम॥3॥
ओं वायुरन्तरिक्षस्याधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं वायवे अन्तरिक्षस्याधिपतये इदन्न मम॥4॥
ओं सूर्यो दिवोऽधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं सूर्याय दिवोऽधिपतये इदन्न मम॥5॥
ओं चन्द्रमा नक्षत्राणामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं चन्द्रमसे नक्षत्राणामधिपतये इदन्न मम॥6॥
ओं बृहस्पतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं बृहस्पतये ब्रह्मणोऽधिपतये इदन्न मम॥7॥
ओं मित्रः सत्यानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं मित्राय सत्यानामधिपतये इदन्न मम॥8॥
ओं वरुणोऽपामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं वरुणायापामधिपतये इदन्न मम॥9॥
ओं समुद्रः स्रोत्यानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं समुद्राय स्रोत्यानामधिपतये इदन्न मम॥10॥
ओम् अन्नं साम्राज्यानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदमन्नाय साम्राज्यानामधिपतये इदन्न मम॥11॥
ओं सोमऽओषधीनामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं सोमाय ओषधीनामधिपतये इदन्न मम॥12॥
ओं सविता प्रसवानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं सवित्रे प्रसवानामधिपतये इदन्न मम॥13॥
ओं रुद्रः पशूनामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं रुद्राय पशूनामधिपतये इदन्न मम॥14॥
ओं त्वष्टा रूपाणामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं त्वष्ट्रे रूपाणामधिपतये इदन्न मम॥15॥
ओं विष्णुः पर्वतानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं विष्णवे पर्वतानामधिपतये इदन्न मम॥16॥
ओं मरुतो गणानामधिपतयस्ते मावन्त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं मरुद्भ्यो गणानामधिपतिभ्यः इदन्न मम॥17॥
ओं पितरः पितामहाः परेऽवरे ततास्ततामहा इह मावन्त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा॥ इदं पितृभ्यः पितामहेभ्यः परेभ्योऽवरेभ्य-स्ततेभ्यस्ततामहेभ्यश इदन्न मम॥18॥
इस प्रकार अभ्यातन होम की अठारह आज्याहुति दिये पीछे, पुनः—
ओम् अग्निरैतु प्रथमो देवतानां सोऽस्यै प्रजां मुञ्चतु मृत्युपाशात्। तदयं राजा वरुणोऽनुमन्यतां यथेयं स्त्री पौत्रमघन्न रोदात् स्वाहा॥ इदमग्नये इदन्न मम॥1॥
ओम् इमामग्निस्त्रायतां गार्हपत्यः प्रजामस्यै नयतु दीर्घमायुः। अशून्योपस्था जीवतामस्तु माता पौत्रमानन्दमभिविबुध्यतामियं स्वाहा॥ इदमग्नये इदन्न मम॥2॥
ओं स्वस्ति नोऽग्ने दिवा पृथिव्या विश्वानि धेह्ययथा यजत्र। यदस्यां मयि दिवि जातं प्रशस्तं तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रं स्वाहा॥ इदमग्नये इदन्न मम॥3॥
ओं सुगन्नु पन्थां प्रदिशन्न एहि ज्योतिष्मध्ये ह्यजरन्नऽआयुः। अपैतु मृत्युरमृतं म आगाद् वैवस्वतो नोऽअभयं कृणोतु स्वाहा॥ इदं वैवस्वताय इदन्न मम॥4॥
ओं परं मृत्योऽअनु परेहि पन्थां यत्र नोऽअन्य इतरो देवयानात्। चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्त्स्वाहा॥ इदं मृत्यवे इदन्न मम॥5॥
ओं द्यौस्ते पृष्ठं रक्षतु वायुरूरू अश्विनौ च। स्तनन्धयस्ते पुत्रान्त्सविताभिरक्षत्वावाससः परिधानाद् बृहस्पतिर्विश्वे देवा अभिरक्षन्तु पश्चात्स्वाहा॥ इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यः इदन्न मम॥6॥
ओं मा ते गृहेषु निशि घोष उत्त्थादन्यत्र त्वद्रुदत्यः संविशन्तु मा त्वं रुदत्युरऽआवधिष्ठा जीवपत्नी पतिलोके विराज पश्यन्ती प्रजां सुमनस्यमानां स्वाहा॥ इदमग्नये इदन्न मम॥7॥
ओम् अप्रजस्यं पौत्रमर्त्यं पाप्मानमुत वाऽअघम्। शीर्ष्णस्रजमिवोन्मुच्य द्विषद्भ्यः प्रतिमुञ्चामि पाशं स्वाहा॥ इदमग्नये इदन्न मम॥8॥
इन प्रत्येक मन्त्रों से एक-एक आहुति करके आठ आज्याहुति दीजिये।
तत्पश्चात् पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि 4 चार मन्त्रों से 4 चार आज्याहुति दीजिये।
ऐसे होम करके वर आसन से उठ पूर्वाभिमुख बैठी वधू के सम्मुख पश्चिमाभिमुख खड़ा रहकर अपने वामहस्त से वधू का दहिना हाथ चत्ता धरके ऊपर को उचाना। और अपने दक्षिण हाथ से वधू के उठाये हुए दक्षिण हस्ताञ्जलि अंगुष्ठासहित चत्ती ग्रहण करके, वर—
ओं गृ॒भ्णामि॑ ते सौभग॒त्वाय॒ हस्तं॒ मया॒ पत्या॑ ज॒रद॑ष्टि॒र्यथासः॑।
भगो॑ अर्य॒मा स॑वि॒ता पुर॑न्धि॒र्मह्यं॑ त्वादु॒र्गार्ह॑पत्याय दे॒वाः॥1॥[13]
ओं भग॑स्ते॒ हस्त॑मग्रभीत् सवि॒ता हस्त॑मग्रभीत्।
पत्नी॒ त्वम॑सि॒ धर्म॑णाहं गृ॒हप॑ति॒स्तव॑॥2॥[14]
ममे॒यम॑स्तु॒ पोष्या॒ मह्यं॑ त्वादा॒द् बृह॒स्पतिः॑।
मया॒ पत्या॑ प्रजावति॒ शं जी॑व श॒रदः॑ श॒तम्॥3॥[15]
त्वष्टा॒ वासो॒ व्यदधाच्छु॒भे कं बृह॒स्पतेः॑ प्र॒शिषा॑ कवी॒नाम्।
तेने॒मां नारीं॑ सवि॒ता भग॑श्च सू॒र्यामि॑व॒ परि॑ धत्तां प्र॒जया॑॥4॥[16]
इ॒न्द्रा॒ग्नी द्यावा॑पृथि॒वी मा॑त॒रिश्वा॑ मि॒त्रावरु॑णा॒ भगो॑ अ॒श्विनोभा॒।
बृह॒स्पति॑र्म॒रुतो॒ ब्रह्म॒ सोम॑ इ॒मां नारीं॑ प्र॒जया॑ वर्धयन्तु॥5॥[17]
अहं वि ष्या॑मि॒ मयि॑ रू॒पम॑स्या॒ वेद॒दित् पश्य॒न्मन॑सा कु॒लाय॑म्।
न स्तेय॑मद्मि॒ मन॒सोद॑मुच्ये स्व॒यं श्रथ्ना॒नो वरु॑णस्य॒ पाशा॑न्॥6॥[18]
इन पाणिग्रहण के 6 छह मन्त्रों को बोलके, पश्चात् वर वधू की हस्ताञ्जलि पकड़के उठावे और उस को साथ लेके जो कुण्ड की दक्षिण दिशा में प्रथम स्थापन किया था, उस को वही पुरुष जो कलश के पास बैठा था, वर-वधू के साथ उसी कलश को ले चले। यज्ञकुण्ड की दोनों प्रदक्षिणा करके—
ओम् अमोऽहमस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहम्। सामाहमस्मि ऋक्त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वं तावेव विवहावहै सह रेतो दधावहै॥ प्रजां प्रजनयावहै पुत्रान् विन्दावहै बहून् ते सन्तु जरदष्टयः॥ संप्रियौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतम्॥7॥[19]
इन प्रतिज्ञा-मन्त्रों से दोनों प्रतिज्ञा करके—
पश्चात् वर वधू के पीछे रहके, वधू के दक्षिण ओर समीप में जा उत्तराभिमुख खड़ा रहके, वधू की दक्षिणाञ्जलि अपनी दक्षिणाञ्जलि से पकड़के दोनों खड़े रहें। और वह पुरुष पुनः कुण्ड के दक्षिण में कलश लेके वैसे बैठे। तत्पश्चात् वधू की माता अथवा भाई जो प्रथम चावल और ज्वार की धाणी सूप में रखी थी, उस को बायें हाथ में लेके दाहिने हाथ से वधू का दक्षिण पग उठवाके पत्थर की शिला पर चढ़वावे। और उस समय वर—
ओम् आरोहेममश्मानमश्मेव त्वं स्थिरा भव।
अभितिष्ठ पृतन्यतोऽवबाधस्व पृतनायतः॥1॥
इस मन्त्र को बोले।
तत्पश्चात् वधू वर कुण्ड के समीप आके पूर्वाभिमुख दोनों खड़े रहें और यहां वधू दक्षिण ओर रहके अपनी हस्ताञ्जलि को वर की हस्ताञ्जलि पर रक्खे।
तत्पश्चात् वधू की मां वा भाई, जो बायें हाथ में धाणी का सूपड़ा पकड़के खड़ा रहा हो, वह धाणी का सूपड़ा भूमि पर धर अथवा किसी के हाथ में देके, जो वधू-वर की एकत्र की हुई अर्थात् नीचे वर की और ऊपर वधू की हस्ताञ्जलि है, उस में प्रथम थोड़ा घृत सिंचन करके, पश्चात् प्रथम सूप में से दाहिने हाथ की अञ्जलि से दो वार लेके वरवधू की एकत्र की हुई अञ्जलि में धाणी डाले। पश्चात् उस अञ्जलिस्थ धाणी पर थोड़ा सा घी सिंचन करे। पश्चात् वधू वर की हस्ताञ्जलि सहित अपनी हस्ताञ्जलि को आगे से नमाके—
ओम् अर्यमणं देवं कन्या अग्निमयक्षत। स नो अर्यमा देवः प्रेतो मुञ्चतु मा पतेः स्वाहा॥ इदमर्यम्णे अग्नये इदन्न मम॥1॥
ओम् इयं नार्युपब्रूते लाजानावपन्तिका। आयुष्मानस्तु मे पतिरेधन्तां ज्ञातयो मम स्वाहा॥ इदमग्नये इदन्न मम॥2॥
ओम् इमाँल्लाजानावपाम्यग्नौ समृद्धिकरणं तव। मम तुभ्यं च संवननं तदग्निरनुमन्यतामियं स्वाहा॥ इदमग्नये इदन्न मम॥3॥
इन 3 तीन मन्त्रों में एक-एक मन्त्र से एक-एक वार थोड़ी-थोड़ी धाणी की आहुति तीन वार प्रज्वलित ईंधन पर देके, वर—
ओं सरस्वति प्रेदमव सुभगे वाजिनीवति। यान्त्वा विश्वस्य भूतस्य प्रजायामस्याग्रतः। यस्यां भूतं समभवद् यस्यां विश्वमिदं जगत्। तामद्य गाथां गास्यामि या स्त्रीणामुत्तमं यशः॥1॥
इस मन्त्र को बोलके अपने जमणे हाथ की हस्ताञ्जलि से वधू की हस्ताञ्जलि पकड़के, वर—
ओं तुभ्यमग्रे पर्यवहन्त्सूर्यां वहतुना सह।
पुनः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह॥1॥
ओं कन्यला पितृभ्यः पतिलोकं यतीयमप दीक्षामयष्ट।
कन्या उत त्वया वयं धारा उदन्या इवातिगाहेमहि द्विषः॥2॥
इन मन्त्रों को पढ़ यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करके, यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पूर्व की ओर मुख करके थोड़ी देर दोनों खड़े रहें।
तत्पश्चात् पूर्वोक्त प्रकार कलश सहित यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा कर, पुनः दो वार इसी प्रकार, अर्थात् सब मिलके 4 चार परिक्रमा करके, अन्त में यज्ञकुण्ड के पश्चिम में थोड़ा खड़ा रहके, उक्त रीति से तीन वार क्रिया पूरी हुए पश्चात् यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पूर्वाभिमुख वधू-वर खड़े रहें। पश्चात् वधू की मां अथवा भाई उस सूप को तिरछा करके उस में बाकी रही हुई धाणी को वधू की हस्ताञ्जलि में डाल देवे। पश्चात् वधू—
ओं भगाय स्वाहा॥ इदं भगाय इदन्न मम॥
इस मन्त्र को बोलके प्रज्वलित अग्नि पर वेदी में उस धाणी की एक आहुति देवे। पश्चात् वर वधू को दक्षिण भाग में रखके कुण्ड के पश्चिम पूर्वाभिमुख बैठके—
ओं प्रजापतये स्वाहा॥ इदं प्रजापतये इदन्न मम॥
इस मन्त्र को बोलके स्रुवा से एक घृत की आहुति देवे।
तत्पश्चात् एकान्त में जाके वधू के बंधे हुये केशों को वर—
प्र त्वा॑ मुञ्चामि॒ वरु॑णस्य॒ पाशा॒द् येन॒ त्वाब॑ध्नात् सवि॒ता
सु॒शेवः॑। ऋ॒तस्य॒ योनौ॑ सुकृ॒तस्य॑ लो॒केऽरि॑ष्टां त्वा स॒ह पत्या॑ दधामि॥1॥
प्रेतो मुञ्चामि॒ नामुतः॑ सुब॒द्धाम॒मु॑तस्करम्।
यथे॒यमि॑न्द्र मीढ्वः सुपु॒त्रा सु॒भगास॑ति॥2॥
इन दोनों मन्त्रों को बोलके प्रथम वधू के केशों को छोड़ना।
तत्पश्चात् सभामण्डप में आके ‘सप्तपदी-विधि’ का आरम्भ करे। इस समय वर के उपवस्त्र के साथ वधू के उत्तरीय वस्त्र की गांठ देनी, इसे ‘जोड़ा’ कहते हैं। वधू-वर दोनों जने आसन पर से उठके वर अपने दक्षिण हाथ से वधू की दक्षिण हस्ताञ्जलि पकड़के
यज्ञकुण्ड के उत्तरभाग में जावें। तत्पश्चात् वर अपना दक्षिण हाथ वधू के दक्षिण स्कन्धे पर रखके दोनों समीप-समीप उत्तराभिमुख खड़े रहें। तत्पश्चात् वर—
मा सव्येन दक्षिणमतिक्राम॥
ऐसा बोलके वधू को उस का दक्षिण पग उठवाके चलने के लिए आज्ञा देनी। और—
ओम् इष एकपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वा नयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥
इस मन्त्र को बोलके वर अपने साथ वधू को लेकर ईशान दिशा में एक पग[20]चले और चलावे।
ओम् ऊर्ज्जे द्विपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वा नयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥इस मन्त्र से दूसरा।
ओं रायस्पोषाय त्रिपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वा नयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥इस मन्त्र से तीसरा।
ओं मयोभवाय चतुष्पदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वा नयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥इस मन्त्र से चौथा।
ओं प्रजाभ्यः पञ्चपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वा नयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥इस मन्त्र से पांचवां।
ओं ऋतुभ्यः षट्पदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वा नयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥इस मन्त्र से छठा। और—
ओं सखे सप्तपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वा नयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥इस मन्त्र से सातवां पग चलना।
इस रीति से इन 7 सात मन्त्रों से 7 सात पग ईशान दिशा में चलाके वर-वधू दोनों गांठ बंधे हुए शुभासन पर बैठें।
तत्पश्चात् प्रथम से जो जल के कलश को लेके यज्ञकुण्ड के दक्षिण की ओर में बैठाया था, वह पुरुष उस पूर्व-स्थापित जलकुम्भ को लेके वधू वर के समीप आवे। और उस में से थोड़ा सा जल लेके वधू-वर के मस्तक पर छिटकावे। और वर—
ओम् आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ऽ ऊ॒र्जे द॑धातन। म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से॥1॥
ओं यो वः॑ शि॒वत॑मो॒ रस॒स्तस्य॑ भाजयते॒ह नः॑। उ॒श॒तीरि॑व मा॒तरः॑॥2॥
ओं तस्मा॒ऽ अरं॑ गमाम वो॒ यस्य॒ क्षया॑य॒ जिन्व॑थ। आपो॑ ज॒नय॑था च नः॥3॥
ओम् आपः शिवाः शिवतमाः शान्ताः शान्ततमास्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्॥4॥
इन 4 चार मन्त्रों को बोले। तत्पश्चात् वधू-वर वहां से उठके—
ओं तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत्। पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तं जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तं शृणु॑याम श॒रदः॑ श॒तं प्र ब्र॑वाम श॒रदः॑ श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रदः॑ श॒तं भूय॑श्च श॒रदः॑ श॒तात्॥1॥
इस मन्त्र को पढ़के सूर्य का अवलोकन करें।
तत्पश्चात् वर वधू के दक्षिण स्कन्धे पर अपना दक्षिण हाथ लेके उस से वधू का हृदय स्पर्श करके—
ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनु चित्तं ते अस्तु।
मम वाचमेकमना जुषस्व प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥[21]
इस मन्त्र को बोले और उसी प्रकार वधू भी अपने दक्षिण हाथ से वर के हृदय का स्पर्श करके इसी ऊपर लिखे हुए मन्त्र को बोले।[22]
तत्पश्चात् वर वधू के मस्तक पर हाथ धरके—
सु॒म॒ङ्गलीरि॒यं व॒धूरि॒मां स॒मेत॒ पश्य॑त ।
सौभा॑ग्यमस्यै द॒त्त्वा याथास्तं॒ वि परे॑तन॥
इस मन्त्र को बोलके कार्यार्थ आये हुए लोगों की ओर अवलोकन करना और इस समय सब लोग—
‘ओं सौभाग्यमस्तु। ओं शुभं भवतु॥‘
इस वाक्य से आशीर्वाद देवें।
तत्पश्चात् वधू-वर यज्ञकुण्ड के समीप पूर्ववत् बैठके, पुनः पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणे दोनों (ओं यदस्य कर्मणो॰) इस स्विष्टकृत् मन्त्र से होमाहुति अर्थात् एक आज्याहुति और पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि 4 चार मन्त्रों से एक-एक से एक-एक आहुति करके 4 चारआज्याहुतिदेवें। और इस प्रमाणे विवाह का विधि पूरा हुए पश्चात् दोनों जने आराम, अर्थात् विश्राम करें।
इस रीति से थोड़ा सा विश्राम करके विवाह का उत्तर-विधि करें।
यह उत्तर-विधि सब वधू के घर की ईशान दिशा में, विशेष करके एक घर प्रथम से बना रखा हो, वहां जाके करना।
तत्पश्चात् सूर्य अस्त हुए पीछे [जब] आकाश में नक्षत्र दीखें, उस समय वधू-वर यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पूर्वाभिमुख आसन पर बैठें और पृष्ठ 19 में लिखे प्रमाणेअग्न्याधान(ओं भूर्भुवः स्वर्द्यौ॰) इस मन्त्र से करें। यदि प्रथम ही सभामण्डप ईशान दिशा में हुआ, और प्रथमअग्न्याधानकिया हो तो अग्न्याधान न करें। (ओं अयन्त इध्म॰) इत्यादि 4 चार मन्त्रों से समिदाधान करके, जब अग्नि प्रदीप्त होवे तब पृष्ठ 20-21 में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्नये स्वाहा) इत्यादि 4 चार मन्त्रों सेआघारावाज्यभागाहुति4 चार और पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि 4 चार मन्त्रों से 4 चारव्याहृतिआहुति, ये सब मिलके 8 आठ आज्याहुति देवें।
तत्पश्चात् प्रधान-होम करें निम्नलिखित मन्त्रों से—
ओं लेखासन्धिषु पक्ष्मस्वारोकेषु च यानि ते। तानि ते पूर्णाहुत्या सर्वाणि शमयाम्यहं स्वाहा॥ इदं कन्यायै इदन्न मम॥
ओं केशेषु यच्च पापकमीक्षिते रुदिते च यत्। तानि ते पूर्णाहुत्या सर्वाणि शमयाम्यहं स्वाहा॥ इदं कन्यायै इदन्न मम॥
ओं शीलेषु यच्च पापकं भाषिते हसिते च यत्। तानि ते पूर्णाहुत्या सर्वाणि शमयाम्यहं स्वाहा॥ इदं कन्यायै इदन्न मम॥
ओम् आरोकेषु च दन्तेषु हस्तयोः पादयोश यत्। तानि ते पूर्णाहुत्या सर्वाणि शमयाम्यहं स्वाहा॥ इदं कन्यायै इदन्न मम॥
ओम् ऊर्वोरुपस्थे जङ्घयोः सन्धानेषु च यानि ते। तानि ते पूर्णाहुत्या सर्वाणि शमयाम्यहं स्वाहा॥ इदं कन्यायै इदन्न मम॥
ओं यानि कानि च घोराणि सर्वाङ्गेषु तवाभवन्। पूर्णाहुतिभिराज्यस्य सर्वाणि तान्यशीशमं स्वाहा॥ इदं कन्यायै इदन्न मम॥
ये 6 छह मन्त्र हैं। इन में से एक-एक मन्त्र बोल, एक-एक से 6 छह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात् पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि 4 चार व्याहृति मन्त्रों से 4 चार आज्याहुति देके—
वधू-वर वहां से उठके सभामण्डप के बाहर उत्तर दिशा में जावें।
तत्पश्चात् वर—
ध्रुवं पश्य॥
ऐसा बोलके वधू को ध्रुव का तारा दिखलावे[23]
और वधू वर से बोले कि मैं—
पश्यामि॥ध्रुव के तारे को देखती हूं।
तत्पश्चात् वधू बोले—
ओं ध्रुवमसि ध्रुवाहं पतिकुले भूयासम् (अमुष्य[24]असौ)॥
इस मन्त्र को बोलके, तत्पश्चात्—
अरुन्धतीं पश्य॥
ऐसा वाक्य बोलके वर वधू को अरुन्धती का तारा दिखलावे। और वधू—
पश्यामि॥ऐसा कहके—
ओम् अरुन्धत्यसि रुद्धाहमस्मि (अमुष्य[25]असौ)॥
इस मन्त्र को बोलके वर वधू की ओर देखके वधू के मस्तक पर हाथ धरके—
ओं ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवं विश्वमिदं जगत्।
ध्रुवासः पर्वता इमे ध्रुवा स्त्री पतिकुले इयम्॥[26]
ओं ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि ध्रुवैधि पोष्ये मयि।
मह्यं त्वादाद् बृहस्पतिर्मया पत्या प्रजावती सं जीव शरदः शतम्॥[27]
इन दोनों मन्त्रों को बोले।
पश्चात् वधू और वर दोनों यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पूर्वाभिमुख होके कुण्ड के समीप बैठें। और पृष्ठ 18 में लिखे प्रमाणे (ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा) इत्यादि 3 तीन मन्त्रों से एक-एक से एक-एक आचमन करके तीन-तीन आचमन दोनों करें। पश्चात् पृष्ठ 19 में लिखी हुई समिधाओं से यज्ञकुण्ड में अग्नि को प्रदीप्त करके, पृष्ठ 13 में लिखे प्रमाणे घृत और स्थालीपाक अर्थात् भात को उसी समय बनावें। पृष्ठ 19 में लिखे प्रमाणे (ओम् अयन्त इध्म॰) इत्यादि 4 चार मन्त्रों से समिधा होम दोनों जने करके, पश्चात् पृष्ठ 20-21 में लिखे प्रमाणेआघारावाज्यभागाहुति4 चार और पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणेव्याहृतिआहुति 4 चार, दोनों मिलके 8 आठ आज्याहुति वर-वधू देवें।
तत्पश्चात् जो ऊपर सिद्ध किया हुआ ओदन, अर्थात् भात, उस को एक पात्र में निकालके उस के ऊपर स्रुवा से घृत सेचन करके, घृत और भात को अच्छे प्रकार मिलाकर दक्षिण हाथ से थोड़ा-थोड़ा भात दोनों जने लेके —
ओम् अग्नये स्वाहा॥ इदमग्नये इदन्न मम॥
ओं प्रजापतये स्वाहा॥ इदं प्रजापतये इदन्न मम॥
ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा॥ इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यः इदन्न मम॥
ओम् अनुमतये स्वाहा॥ इदमनुमतये इदन्न मम॥
इन में से प्रत्येक मन्त्र से एक-एक करके 4 चार स्थालीपाक अर्थात् भात की आहुति देनी। तत्पश्चात् पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणे (ओं यदस्य कर्मणो॰) इस मन्त्र से 1 एक स्विष्टकृत् आहुति देनी। तत्पश्चात् पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणेव्याहृतिआहुति 4 चार और पृष्ठ 22-23 में लिखे प्रमाणेअष्टाज्याहुति8 आठ, दोनों मिलके 12 बारह आज्याहुति देनी।
तत्पश्चात् शेष रहा हुआ भात एक पात्र में निकालके उस पर घृत-सेचन और दक्षिण हाथ रखके—
ओम् अन्नपाशेन मणिना प्राणसूत्रेण पृश्निना।
बध्नामि सत्यग्रन्थिना मनश्च हृदयं च ते॥1॥[28]
ओं यदेतद्धृदयं तव तदस्तु हृदयं मम।
यदिदं हृदयं मम तदस्तु हृदयं तव॥2॥[29]
ओम् अन्नं प्राणस्य षड्विंशस्तेन बध्नामि त्वा असौ॥3॥[30]
इन तीनों मन्त्रों को मन से जपके वर उस भात में से प्रथम थोड़ा सा भक्षण करके, जो उच्छिष्ट शेष भात रहे वह अपनी वधू के लिये खाने को देवे। और जब वधू उस को खा चुके, तब वधू-वर यज्ञ-मण्डप में सन्नद्ध हुए शुभासन पर नियम प्रमाणे पूर्वाभिमुख बैठें और पृष्ठ 23-24 में लिखे प्रमाणे सामवेदोक्तमहावामदेव्यगानकरें।
तत्पश्चात् पृष्ठ 4-11 में लिखे प्रमाणे ईश्वर कीस्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरणकर्म करके क्षार लवण रहित मिष्ट, दुग्ध, घृतादिसहित भोजन करें।
तत्पश्चात् पृष्ठ 23, 24 में लिखे प्रमाणे पुरोहितादि सद्धर्मी और कार्यार्थ इकट्ठे हुए लोगों को सम्मानार्थ उत्तम भोजन कराना। तत्पश्चात् यथायोग्य पुरुषों का पुरुष और स्त्रियों का स्त्री आदर- सत्कार करके विदा कर देवें।
तत्पश्चात् दश घटिका रात जाय, तब वधू और वर पृथक्-पृथक् स्थान में भूमि में बिछौना करके तीन रात्रिपर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत सहित रहकर शयन करें और ऐसा भोजन करें कि स्वप्न में भी वीर्यपात न होवे। तत्पश्चात् चौथे दिवस विधिपूर्वक गर्भाधानसंस्कार करे। यदि चौथे दिवस कोई अड़चन आवे तो अधिक दिन ब्रह्मचर्यव्रत में दृढ़ रह कर जिस दिन दोनों की इच्छा हो, और पृष्ठ 27-28 में लिखे प्रमाणे गर्भाधान की रात्रि भी हो, उस रात्रि में यथाविधि गर्भाधान करें।
तत्पश्चात् दूसरे वा तीसरे दिन प्रातःकाल वर पक्षवाले लोग वधू और वर को रथ में बैठाके बड़े सम्मान से अपने घर में लावें और जो वधू अपने माता-पिता के घर को छोड़ते समय आँख में अश्रु भर लावे तो—
जी॒वं रु॑दन्ति॒ वि म॑यन्ते अध्व॒रे दी॒र्घामनु॒ प्रसि॑तिं दीधियु॒र्नरः॑।
वा॒मं पि॒तृभ्यो॒ य इ॒दं स॑मेरि॒रे मयः॒ पति॑भ्यो॒ जन॑यः परि॒ष्वजे॑॥
इस मन्त्र को वर बोले। और रथ में बैठते समय वर अपने साथ दक्षिण बाजू वधू को बैठावे। उस समय में वर—
पू॒षा त्वे॒तो न॑यतु हस्त॒गृह्या॒श्विना॑ त्वा॒ प्र व॑हतां॒ रथे॑न।
गृ॒हान् ग॑च्छ गृ॒हप॑त्नी॒ यथासो॑ व॒शिनी॒ त्वं वि॒दथ॒मा व॑दासि॥1॥
सु॒किं॒शु॒कं श॑ल्म॒लिं वि॒श्वरू॑पं॒ हिर॑ण्यवर्णं सु॒वृतं॑ सुच॒क्रम्।
आ रो॑ह सूर्ये अ॒मृत॑स्य लो॒कं स्योनं पत्ये॑ वह॒तुं कृ॑णुष्व॥2॥
इन दो मन्त्रों को बोलके रथ को चलावे।
यदि वधू को वहां से अपने घर लाने के समय नौका पर बैठना पड़े तो इस निम्नलिखित मन्त्र को पूर्व बोलके नौका पर बैठें—
अश्म॑न्वती रीयते॒ सं र॑भध्व॒मुत्ति॑ष्ठत॒ प्र त॑रता सखायः।
और नाव से उतरते समय—
अत्रा॑ जहाम॒ ये अस॒न्नशे॑वाः शि॒वान्व॒यमुत्त॑रेमा॒भि वाजा॑न्॥
इस उत्तरार्द्ध मन्त्र को बोलके नाव से उतरें।
पुनः इसी प्रकार मार्ग में चार मार्गों का संयोग, नदी, व्याघ्र, चोर आदि से भय वा भयङ्कर स्थान, ऊंचे-नीचे खाढ़ावाली पृथिवी, बड़े-बड़े वृक्षों का झुण्ड वा श्मशान भूमि आवे, तो—
मा वि॑दन् परिप॒न्थिनो॒ य आ॒सीद॑न्ति॒ दम्प॑ती। सु॒गेभि॑र्दु॒र्गमती॑ता॒मप॑ द्रा॒न्त्वरा॑तयः॥
इस मन्त्र को बोले।
तत्पश्चात् वधू-वर जिस रथ में बैठके जाते हों, उस रथ का कोई अङ्ग टूट जाय, अथवा किसी प्रकार का अकस्मात् उपद्रव होवे तो मार्ग में कोई अच्छा स्थान देखके निवास करना। और साथ रक्खे हुए विवाहाग्नि को प्रकट करके उस में पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणे 4 चारव्याहृतिआज्याहुति देनी। पश्चात् पृष्ठ 23-24 में लिखे प्रमाणेवामदेव्यगानकरना।
पश्चात् जब वधू-वर का रथ वर के घर के आगे आ पहुँचे, तब कुलीन, पुत्रवती, सौभाग्यवती वा कोई ब्राह्मणी वा अपने कुल की स्त्री आगे-सामने आकर वधू का हाथ पकड़के वर के साथ रथ से नीचे उतारे और वर के साथ सभामण्डप में ले जावे। सभामण्डप द्वारे आते ही वर वहां कार्यार्थ आये हुए लोगों की ओर अवलोकन करके—
सु॒म॒ङ्गलीरि॒यं व॒धूरि॒मां स॒मेत॒ पश्य॑त । सौभा॑ग्यमस्यै द॒त्त्वा याऽथास्तं॒ वि परे॑तन॥
इस मन्त्र को बोले। और आये हुए लोग—
ओं सौभाग्यमस्तु। ओं शुभं भवतु॥इस प्रकार आशीर्वाद देवें। तत्पश्चात् वर—
इ॒ह प्रि॒यं प्र॒जया॑ ते॒ समृ॑ध्यताम॒स्मिन् गृ॒हे गार्ह॑पत्याय जागृहि।
ए॒ना पत्या॑ त॒न्वं१॒॑ सं सृ॑ज॒स्वाऽधा॒ जिव्री॑ वि॒दथ॒मा व॑दाथः॥
इस मन्त्र को बोलके वधू को सभामण्डप में ले जावे।
तत्पश्चात् वधू-वर पूर्व-स्थापित यज्ञकुण्ड के समीप जावें।
उस समय वर—
ओम् इ॒ह गावः॒ प्रजा॑यध्वमि॒हाश्वा इ॒ह पूरु॑षाः।
इ॒हो स॒हस्र॑दक्षि॒णोऽपि॑ पू॒षा नि षी॑दतु॥
इस मन्त्र को बोलके यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पीठासन अथवा तृणासन पर वधू को अपने दक्षिण भाग में पूर्वाभिमुख बैठावे।
तत्पश्चात् पृष्ठ 18 में लिखे प्रमाणे (ओम् अमृतोपस्तरणमसि) इत्यादि 3 तीन मन्त्रों से एक-एक से एक-एक करके तीन-तीन आचमन करें। तत्पश्चात् पृष्ठ 19 में लिखे प्रमाणे कुण्ड में यथाविधि समिधा-चयन,अग्न्याधानकरें। जब उसी कुण्ड में अग्नि प्रज्वलित हो, तब उस पर घृत सिद्ध करके पृष्ठ 19 में लिखे प्रमाणेसमिदाधानकरके प्रदीप्त हुए अग्नि में पृष्ठ 21-23 में लिखे प्रमाणेआघारावाज्यभागाहुति4 चार औरव्याहृतिआहुति 4 चार,अष्टाज्याहुति8 आठ, सब मिलके 16 सोलह आज्याहुति वधू-वर करके प्रधानहोम का प्रारम्भ निम्नलिखित मन्त्रों से करें—
ओम् इह धृतिः स्वाहा॥ इदमिह धृत्यै इदन्न मम॥
ओम् इह स्वधृतिः स्वाहा॥ इदमिह स्वधृत्यै इदन्न मम॥
ओम् इह रन्तिः स्वाहा॥ इदमिह रन्त्यै इदन्न मम॥
ओम् इह रमस्व स्वाहा॥ इदमिह रमाय इदन्न मम॥
ओम् मयि धृतिः स्वाहा॥ इदं मयि धृत्यै इदन्न मम॥
ओम् मयि स्वधृतिः स्वाहा॥ इदं मयि स्वधृत्यै इदन्न मम॥
ओम् मयि रमः स्वाहा॥ इदं मयि रमाय इदन्न मम॥
ओम् मयि रमस्व स्वाहा॥ इदं मयि रमाय इदन्न मम॥
इन प्रत्येक मन्त्रों से एक-एक करके 8 आठ आज्याहुति देके—
ओम् आ नः॑ प्र॒जां ज॑नयतु प्र॒जाप॑तिराजर॒साय॒ सम॑नक्त्वर्य॒मा।
अदु॑र्मङ्गलीः पतिलोकमा वि॑श॒ शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॒ स्वाहा॑॥[31]इदं सूर्यायै सावित्र्यै इदन्न मम॥1॥
ओम् अघो॑रचक्षु॒रप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒मनाः॑ सु॒वर्चाः॑।
वी॒र॒सूर्दे॒वृ॒का॑मा स्यो॒ना शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॒ स्वाहा॑॥[32]
इदं सूर्यायै सावित्र्यै इदन्न मम॥2॥
ओम् इ॒मां त्वमि॑न्द्र मीढ्वः सुपु॒त्रां सु॒भगां॑ कृणु। दशा॑स्यां
पु॒त्राना धे॑हि॒ पति॑मेकाद॒शं कृ॑धि॒ स्वाहा॑[33]॥ इदं सूर्यायै सावित्र्यै इदन्न मम॥3॥
ओं स॒म्राज्ञी॒ श्वशु॑रे भव स॒म्राज्ञी॑ श्व॒श्र्वां भ॑व।
नना॑न्दरि स॒म्राज्ञी॑ भव स॒म्राज्ञी॑ अधि॑ दे॒वृषु॒ स्वाहा॑॥[34]इदं सूर्यायै सावित्र्यै इदन्न मम॥4॥
इन 4 चार मन्त्रों से एक-एक से एक-एक करके 4 चारआज्याहुतिदेके, पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणेस्विष्टकृत्होमाहुति 1 एक,व्याहृतिआज्याहुति 4 चार औरप्राजापत्याहुति1 एक, ये सब मिलके 6 छह आज्याहुति देकर—
सम॑ञ्जन्तु॒ विश्वे॑ दे॒वाः समापो॒ हृद॑यानि नौ।
सं मा॑त॒रिश्वा॒ सं धा॒ता समु॒ देष्ट्री॑ दधातु नौ॥[35]
इस मन्त्र को बोलके दोनों दधिप्राशन करें।
तत्पश्चात्—
अहं भो अभिवादयामि॥[36]
इस वाक्य को बोलके दोनों वधू-वर, वर की माता-पिता आदि वृद्धों को प्रीतिपूर्वक नमस्कार करें।
पश्चात् सुभूषित होकर शुभासन पर बैठके पृष्ठ 23-24 में लिखे प्रमाणेवामदेव्यगानकरके, उसी समय पृष्ठ 4-6 में लिखे प्रमाणेईश्वरोपासनाकरनी। उस समय कार्यार्थ आये हुए सब स्त्री-पुरुष ध्यानावस्थित होकर परमेश्वर का ध्यान करें।
तथा वधू-वर, पिता, आचार्य और पुरोहित आदि को कहें कि—
ओं स्वस्ति भवन्तो ब्रुवन्तु॥
आप लोग स्वस्तिवाचन करें।
तत्पश्चात् पिता, आचार्य, पुरोहित जो विद्वान् हों, अथवा उन के अभाव में यदि वधू-वर विद्वान् वेदवित् हों तो वे ही दोनों पृ॰ 7-11 में लिखे प्रमाणेस्वस्तिवाचनका पाठ बड़े प्रेम से करें।
पाठ हुए पश्चात् कार्यार्थ आये हुए स्त्री-पुरुष सब—
ओं स्वस्ति ओं स्वस्ति ओं स्वस्ति॥
इस वाक्य को बोलें।
तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता, पिता, चाचा, भाई आदि पुरुषों को तथा माता, चाची, भगिनी आदि स्त्रियों को यथावत् सत्कार करके विदा करें।
तत्पश्चात् यदि किसी विशेष कारण से श्वशुरगृह में गर्भाधानसंस्कार न हो सके तो वधू-वर क्षार-आहार और विषय-तृष्णारहित व्रतस्थ होके पृष्ठ 27-28 में लिखे प्रमाणे विवाह के चौथे दिवस में गर्भाधान संस्कार करें। अथवा उस दिन ऋतुकाल न हो, तो किसी दूसरे दिन गर्भस्थापन करें और जो वर दूसरे देश से विवाह के लिए आया हो तो वह जहाँ जिस स्थान में विवाह करने के लिये जाकर उतरा हो, उसी स्थान में गर्भाधान करे।
पुनः अपने घर आके पति, सासु, स्वशुर, ननन्द, देवर देवराणी, ज्येष्ठ-जेठानी आदि कुटुम्ब के मनुष्य वधू की पूजा, अर्थात् सत्कार करें। सदा प्रीतिपूर्वक परस्पर वर्त्तें और मधुरवाणी, वस्त्र, आभूषण आदि से सदा प्रसन्न और सन्तुष्ट वधू को रक्खें तथा वधू भी सब को प्रसन्न रक्खे और वर उस वधू के साथ पत्नीव्रतादि सद्धर्म से वर्ते तथा पत्नी भी पति के साथ पतिव्रतादि सद्धर्म चाल-चलन से सदा पति की आज्ञा में तत्पर और उत्सुक रहे तथा वर भी स्त्री की सेवा-प्रसन्नता में तत्पर रहे॥
॥ इति विवाहसंस्कारविधिः समाप्तः॥
[1]यह नक्षत्रादि का विचार कल्पनायुक्त है, इस से प्रमाण नहीं।
[2]यह बात मिथ्या है, क्योंकि आगे मनुस्मृति में निषेध किया है और युक्तिविरुद्ध भी है। इसलिये कुछ भी न ले-देकर दोनों की प्रसन्नता से पाणिग्रहण होना ‘आर्ष’ विवाह है।
[3]यदि आधी रात तक विधि पूरा न हो सके तो मध्याह्नोत्तर आरम्भ कर देवें कि जिस से मध्य रात्रि तक विवाहविधि पूरा हो जावे।
[4]विवाह में आये हुए भी स्त्रीपुरुष एकाग्रचित्त, ध्यानावस्थित होके इन तीन कर्मों के अनुसार ईश्वर का चिन्तन किया करें।
[5]यदि घर का प्रवेशक द्वार पूर्वाभिमुख हो तो वर उत्तराभिमुख और वधू तथा कार्यकर्त्ता पूर्वाभिमुख खड़े रहके, यदि ब्राह्मण वर्ण हो तो प्रथम दक्षिण पग पश्चात् बायां, और अन्य क्षत्रियादि वर्ण हो तो प्रथम बायाँ पग धोवे, पश्चात् दाहिना।
[6]मधुपर्क उस को कहते हैं—जो दही में घी वा शहद मिलाया जाता है। उस का परिमाण—12 बारह तोले दही में 4 चार तोले शहद अथवा 4 चार तोले घी मिलाना चाहिए, और यह मधुपर्क कांसे के पात्र में होना उचित है।
[7]यदि सभामण्डप स्थापन न किया हो तो जिस घर में मधुपर्क हुआ हो उस से दूसरे घर में वर को ले जावे।
[8]"अमुक" इस पद के स्थान में जिस गोत्र और कुल में वधू उत्पन्न हुई हो उस का उच्चारण अर्थात् उस का नाम लेना।
[9]"अमुकनाम्नीम्" इस स्थान पर वधू का नाम द्वितीया विभक्ति के एकवचन से बोलना।
[10]वर और कन्या बोलें कि (विश्वे देवाः) इस यज्ञशाला में बैठे हुए विद्वान् लोगो ! आप हम दोनों को (समञ्जन्तु) निश्चय करके जानें कि मैं अपनी प्रसन्नतापूर्वक इस वर वा इस वधू को गृहाश्रम में एकत्र रहने के लिए एक-दूसरे का स्वीकार करते हैं कि (नौ) हमारे दोनों के (हृदयानि) हृदय (आपः) जल के समान (सम्) शान्त और मिले हुए रहेंगे। जैसे (मातरिश्वा) प्राणवायु हम को प्रिय है, वैसे (सम्) हम दोनों एक-दूसरे से सदा प्रसन्न रहेंगे। जैसे (धाता) धारण करनेहारा परमात्मा सब में (सम्) मिला हुआ सब जगत् को धारण करता है, वैसे हम दोनों एक-दूसरे को धारण करेंगे। जैसे (समुदेष्ट्री) उपदेश करनेहारा श्रोताओं से प्रीति करता है, वैसे (नौ) हमारे दोनों का आत्मा एक-दूसरे के साथ दृढ़ प्रेम को (दधातु) धारण करे॥1॥
[11](असौ) इस पद के स्थान में कन्या का नाम उच्चारण करना है। हे वरानने वा वरानन ! (यत्) जो तू (मनसा) अपनी इच्छा से मुझ को जैसे (पवमानः) पवित्र वायु (वा) जैसे (हिरण्यपर्णो वैकर्णः) तेजोमय जल आदि को किरणों से ग्रहण करनेवाला सूर्य (दूरम्) दूरस्थ पदार्थों और (दिशोऽनु) दिशाओं को प्राप्त होता है, वैसे तू प्रेमपूर्वक अपनी इच्छा से मुझ को प्राप्त होती वा होता है। उस (त्वा) तुझ को (सः) वह परमेश्वर (मन्मनसाम्) मेरे मन के अनुकूल (करोतु) करे और हे (वीर) जो आप मन से मुझ को (ऐषि) प्राप्त होते हो उस आप को जगदीश्वर मेरे मन के अनुकूल सदा रक्खे॥2॥
[12]हे वरानने ! (अपतिघ्नि) पति से विरोध न करनेहारी तू जिस के (ओम्) अर्थात् रक्षा करनेवाला, (भूः) प्राणदाता, (भुवः) सब दुःखों को दूर करेनहारा, (स्वः) सुखस्वरूप और सब सुखों के दाता आदि नाम हैं, उस परमात्मा की कृपा और अपने उत्तम पुरुषार्थ से हे (अघोरचक्षुः) प्रियदृष्टि स्त्री (एधि) हो, (शिवा) मङ्गल करनेहारी (पशुभ्यः) सब पशुओं को सुखदाता (सुमनाः) पवित्रान्तःकरणयुक्त प्रसन्नचित्त (सुवर्चाः) सुन्दर शुभ गुण, कर्म, स्वभाव और विद्या से सुप्रकाशित (वीरसूः) उत्तम वीर पुरुषों को उत्पन्न करनेहारी (देवृकामा) देवर की कामना करती हुई अर्थात् नियोग की भी इच्छा करनेहारी (स्योना) सुखयुक्त होके (नः) हमारे (द्विपदे) मनुष्यादि के लिये (शम्) सुख करनेहारी (भव) सदा हो। और (चतुष्पदे) गाय आदि पशुओं को भी (शम्) सुख देनेहारी हो। वैसे मैं तेरा पति भी वर्त्ता करूँ॥3॥
[13]हे वरानने! जैसे मैं (सौभगत्वाय) ऐश्वर्य सुसन्तानादि सौभाग्य की बढ़ती के लिये (ते) तेरे (हस्तम्) हाथ को (गृभ्णामि) ग्रहण करता हूं, तू (मया) मुझ (पत्या) पति के साथ (जरदष्टिः) जरावस्था को प्राप्त सुखपूर्वक (आसः) हो तथा हे वीर! मैं सौभाग्य की वृद्धि के लिये आपके हस्त को ग्रहण करती हूं। आप मुझ पत्नी के साथ वृद्धावस्था पर्यन्त प्रसन्न और अनुकूल रहिये। आप को मैं और मुझ को आप आज से पति-पत्नी भाव करके प्राप्त हुए हैं। (भगः) सकल ऐश्वर्ययुक्त (अर्यमा) न्यायकारी (सविता) सब जगत् की उत्पत्ति का कर्त्ता (पुरन्धिः) बहुत प्रकार के जगत् का धर्त्ता परमात्मा और (देवाः) ये सब सभामण्डप में बैठे हुए विद्वान् लोग (गार्हपत्याय) गृहाश्रम कर्म के अनुष्ठान के लिये (त्वा) तुझ को (मह्यम्) मुझे (अदुः) देते हैं। आज से मैं आप के हस्ते और आप मेरे हाथ बिक चुके हैं, कभी एक-दूसरे का अप्रियाचरण न करेंगे॥1॥
[14]हे प्रिये ! (भगः) ऐश्वर्ययुक्त मैं (ते) तेरे (हस्तम्) हाथ को (अग्रभीत्) ग्रहण करता हूं। तथा (सविता) धर्मयुक्त मार्ग में प्रेरक मैं तेरे (हस्तम्) हाथ को (अग्रभीत्) ग्रहण कर चुका हूं। (त्वम्) तू (धर्मणा) धर्म से मेरी (पत्नी) भार्या (असि) है, और (अहम्) मैं धर्म से (तव) तेरा (गृहपतिः) गृहपति हूं। अपने दोनों मिलके घर के कामों की सिद्धि करें। और जो दोनों का अप्रियाचरण व्यभिचार है, उस को कभी न करें। जिस से घर के सब काम सिद्ध, उत्तम सन्तान, ऐश्वर्य और सुख की बढ़ती सदा होती रहे॥2॥
[15]हे अनघे ! (बृहस्पतिः) सब जगत् के पालन करनेहारे परमात्मा ने जिस (त्वा) तुझ को (मह्यम्) मुझे (अदात्) दिया है, (इदम्) यही तू जगत् भर में मेरी (पोष्या) पोषण करने योग्य पत्नी (अस्तु) हो। हे (प्रजावति !) तू (मया पत्या) मुझ पति के साथ (शतम्) सौ (शरदः) शरद् ऋतु अर्थात् शतवर्ष पर्यन्त (शं जीव) सुखपूर्वक जीवन धारण कर। वैसे ही वधू भी वर से प्रतिज्ञा करावे—‘हे भद्रवीर! परमेश्वर की कृपा से आप मुझे प्राप्त हुए हो। मेरे लिये आपके विना इस जगत् में दूसरा पति अर्थात् स्वामी पालन करनेहारा सेव्य इष्टदेव कोई नहीं है। न मैं आप से अन्य दूसरे किसी को मानूंगी। जैसे आप मेरे सिवाय दूसरी किसी स्त्री से प्रीति न करोगे, वैसे मैं भी किसी दूसरे पुरुष के साथ प्रीतिभाव से न वर्त्ता करूंगी। आप मेरे साथ सौ वर्ष पर्यन्त आनन्द से प्राण धारण कीजिये’॥3॥
[16]हे शुभानने ! जैसे (बृहस्पतेः) इस परमात्मा की सृष्टि में और उस की तथा (कवीनाम्) आप्त विद्वानों की (प्रशिषा) शिक्षा से दम्पती होते हैं, (त्वष्टा) जैसे बिजुली सब को व्याप्त हो रही है, वैसे तू मेरी प्रसन्नता के लिये (वासः) सुन्दर वस्त्र, और (शुभे) आभूषण तथा (कम्) मुझ से सुख को प्राप्त हो। इस मेरी और तेरी इच्छा को परमात्मा (व्यदधात्) सिद्ध करे। जैसे (सविता) सकल जगत् की उत्पत्ति करनेहारा परमात्मा (च) और (भगः) पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त (प्रजया) उत्तम प्रजा से (इमाम्) इस तुझ (नारीम्) मुझ नर की स्त्री को (परिधत्ताम्) आच्छादित शोभायुक्त करे, वैसे मैं (तेन) इस सब से (सूर्याम् इव) सूर्य की किरण के समान तुझ को वस्त्र और भूषणादि से सुशोभित सदा रक्खूंगा। तथा हे प्रिय ! आप को मैं इसी प्रकार सूर्य के समान सुशोभित आनन्द अनुकूल प्रियाचरण करके (प्रजया) ऐश्वर्य वस्त्राभूषण आदि से सदा आनन्दित रक्खूंगी॥4॥
[17]हे मेरे सम्बन्धी लोगो ! जैसे (इन्द्राग्नी) बिजुली और प्रसिद्ध अग्नि, (द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि, (मातरिश्वा) अन्तरिक्षस्थ वायु, मित्रावरुणा) प्राण और उदान तथा (भगः) ऐश्वर्य (अश्विना) सद्वैद्य और सत्योपदेशक (उभा) दोनों, (बृहस्पतिः) श्रेष्ठ, न्यायकारी, बड़ी प्रजा का पालन करनेहारा राजा, (मरुतः) सभ्य मनुष्य, (ब्रह्म) सब से बड़ा परमात्मा, और (सोमः) चन्द्रमा तथा सोमलतादि ओषधिगण सब प्रजा की वृद्धि और पालन करते हैं, वैसे (इमां नारीम्) इस मेरी स्त्री को (प्रजया) प्रजा से बढ़ाया करते हैं, वैसे तुम भी (वर्धयन्तु) बढ़ाया करो। जैसे मैं इस स्त्री को प्रजा आदि से सदा बढ़ाया करूंगा, वैसे स्त्री भी प्रतिज्ञा करे कि मैं भी इस मेरे पति को सदा आनन्द ऐश्वर्य और प्रजा से बढ़ाया करूंगी। जैसे ये दोनों मिलके प्रजा को बढ़ाया करते हैं, वैसे तू और मैं मिलके गृहाश्रम के अभ्युदय को बढ़ाया करें॥5॥
[18]हे कल्याणक्रोडे ! जैसे (मनसा) मन से (कुलायम्) कुल की वृद्धि को (पश्यन्) देखता हुआ (अहम्) मैं (अस्याः) इस तेरे (रूपम्) रूप को (विष्यामि) प्रीति से प्राप्त और इस में प्रेम द्वारा व्याप्त होता हूं, वैसे यह तू मेरी वधू (मयि) मुझ में प्रेम से व्याप्त होके अनुकूल व्यवहार को (वेदत्) प्राप्त होवे। जैसे मैं (मनसा) मन से भी इस तुझ वधू के साथ (स्तेयम्) चोरी को (उद्मुच्ये) छोड़ देता हूं, और किसी उत्तम पदार्थ का चोरी से (नाद्मि) भोग नहीं करता हूं, (स्वयम्) आप (श्रथ्नानः) पुरुषार्थ से शिथिल होकर भी (वरुणस्य) उत्कृष्ट व्यवहार में विघ्नरूप दुर्व्यसनी पुरुष के (पाशान्) बन्धनों को दूर करता रहूं, वैसे (इत्) ही यह वधू भी किया करे। इसी प्रकार वधू भी स्वीकार करे कि—मैं भी इसी प्रकार आप से वर्त्ता करूंगी॥6॥
[19]हे वधू ! जैसे (अहम्) मैं (अमः) ज्ञानवान् ज्ञानपूर्वक तेरा ग्रहण करनेवाला (अस्मि) होता हूं, वैसे (सा) सो (त्वम्) तू भी ज्ञानपूर्वक मेरा ग्रहण करनेहारी (असि) है। जैसे (अहम्) मैं अपने पूर्ण प्रेम से तुझ को (अमः) ग्रहण करता हूं, वैसे (सा) सो मैंने ग्रहण की हुई (त्वम्) तू मुझ को भी ग्रहण करती है। (अहम्) मैं (साम) सामवेद के तुल्य प्रशंसित (अस्मि) हूं। हे वधू ! तू (ऋक्) ऋग्वेद के तुल्य प्रशंसित है, (त्वम्) तू (पृथिवी) पृथिवी के समान गर्भादि गृहाश्रम के व्यवहारों को धारण करनेहारी है और मैं (द्यौः) वर्षा करनेहारे सूर्य के समान हूं। वह तू और मैं (तावेव) दोनों ही (विवहावहै) प्रसन्नतापूर्वक विवाह करें, (सह) साथ मिलके (रेतः) वीर्य को (दधावहै) धारण करें। (प्रजाम्) उत्तम प्रजा को (प्रजनयावहै) उत्पन्न करें, (बहून्) बहुत (पुत्रान्) पुत्रों को (विन्दावहै) प्राप्त होवें। (ते) वे पुत्र (जरदष्टयः) जरावस्था के अन्त तक जीवनयुक्त (सन्तु) रहें, (संप्रियौ) अच्छे प्रकार [एक] दूसरे से प्रसन्न, (रोचिष्णू) एक-दूसरे में रुचियुक्त, (सुमनस्यमानौ) अच्छे प्रकार विचार करते हुए (शतम्) सौ [शरदः] शरद्ऋतु अर्थात् शत वर्ष पर्यन्त एक-दूसरे को प्रेम की दृष्टि से (पश्येम) देखते रहें (शतं शरदः) सौ वर्ष पर्यन्त आनन्द से (जीवेम) जीते रहें और (शतं शरदः) सौ वर्ष पर्यन्त प्रिय वचनों को (वृणुयाम) सुनते रहें॥7॥
[20]इस पग धरने का विधि ऐसा है कि वधू प्रथम अपना जमणा पग उठाके ईशानकोण की ओर बढ़ाके धरे। तत्पश्चात् दूसरे बायें पग को उठाके जमणे पग की पटली तक धरे। अर्थात् जमणे पग के थोड़ा सा पीछे बायां पग रक्खे। इसी को एक पगला गिणना। इसी प्रकार अगले छः मन्त्रों से भी क्रिया करनी। अर्थात् 1-1 मन्त्र से 1-1 पग ईशान दिशा की ओर धरना।
[21]हे वधू ! (ते) तेरे (हृदयम्) अन्तःकरण और आत्मा को (मम) मेरे (व्रते) कर्म के अनुकूल (दधामि) धारण करता हूं। (मम) मेरे (चित्तमनु) चित्त के अनुकूल (ते) तेरा (चित्तम्) चित्त सदा (अस्तु) रहे। (मम) मेरी (वाचम्) वाणी को तू (एकमनाः) एकाग्रचित्त से (जुषस्व) सेवन किया कर। (प्रजापतिः) प्रजा का पालन करनेवाला परमात्मा (त्वा) तुझ को (मह्यम्) मेरे लिये (नियुनक्तु) नियुक्त करे।
[22]वैसे ही हे प्रिय वीर स्वामिन् ! आपका हृदय, आत्मा और अन्तःकरण मेरे प्रियाचरण कर्म में धारण करती हूं। मेरे चित्त के अनुकूल आपका चित्त सदा रहे। आप एकाग्र होके मेरी वाणी का जो कुछ मैं आपसे कहूं, उसका सेवन सदा किया कीजिए, क्योंकि आज से प्रजापति परमात्मा ने आप को मेरे आधीन किया है जैसे मुझ को आपके आधीन किया है, अर्थात् इस प्रतिज्ञा के अनुकूल दोनों वर्ता करें, जिस से सर्वदा आनन्दित और कीर्तिमान्, पतिव्रता और स्त्रीव्रत होके सब प्रकार के व्यभिचार, अप्रियभाषणादि को छोड़के परस्पर प्रीतियुक्त रहें।
[23]हे वधू वा वर! जैसे यह ध्रुव दृढ़ स्थिर है, इसी प्रकार आप और मैं एक- दूसरे के प्रियाचरणों में दृढ़ स्थिर रहें।
[24](अमुष्य) इस पद के स्थान में षष्ठीविभक्त्यन्त पति का नाम बोलना। जैसे—शिवशर्मा पति का नाम हो, तो "शिवशर्मणः" ऐसा, और (असौ) इस पद के स्थान में वधू अपने नाम को प्रथमाविभक्त्यन्त बोलके इस मन्त्र को पूरा बोले। जैसे—"भूयासं सौभाग्यदाहं शिवशर्मणस्ते"। इस प्रकार दोनों पद जोड़के बोले।
[25](अमुष्य) इस पद के स्थान में पति का नाम षष्ठ्यन्त, और (असौ) इस के स्थान में वधू का प्रथमान्त नाम जोड़कर बोले—हे स्वामिन् ! सौभाग्यदा (अहम्) मैं (अमुष्य) आप शिवशर्मा की अर्धाङ्गी (पतिकुले) आपके कुल में (ध्रुवा) निशल जैसे कि आप (ध्रुवम्) दृढ़ निश्चयवाले मेरे स्थिर पति (असि) हैं, वैसे मैं भी आप की स्थिर दृढ़ पत्नी (भूयासम्) होऊँ।
[26]हे वरानने! जैसे (द्यौः) सूर्य की कान्ति वा विद्युत् (ध्रुवा) सूर्यलोक वा पृथिव्यादि में निश्चल, जैसे (पृथिवी) भूमि अपने स्वरूप में (ध्रुवा) स्थिर, जैसे (इदम्) यह (विश्वम्) सब (जगत्) संसार प्रवाह स्वरूप में (ध्रुवम्) स्थिर है। जैसे (इमे) ये प्रत्यक्ष (पर्वताः) पहाड़ (ध्रुवासः) अपनी स्थिति में स्थिर हैं, वैसे (इयम्) यह तू मेरी (स्त्री) (पतिकुले) मेरे कुल में (ध्रुवा) सदा स्थिर रह॥
[27]हे स्वामिन्! जैसे आप मेरे समीप (ध्रुवम्) दृढ़ सङ्कल्प करके स्थिर (असि) हैं या जैसे मैं (त्वा) आप को (ध्रुवम्) स्थिर दृढ़ (पश्यामि) देखती हूं वैसे ही सदा के लिये मेरे साथ आप दृढ़ रहियेगा। क्योंकि मेरे मन के अनुकूल (त्वा) आप को (बृहस्पतिः) परमात्मा (अदात्) समर्पित कर चुका है। वैसे मुझ पत्नी के साथ उत्तम प्रजायुक्त होके (शतं शरदः) सौ वर्ष पर्यन्त (सम् जीव) जीविये तथा हे वरानने पत्नी! (पोष्ये) धारण और पालन करने योग्य (मयि) मुझ पति के निकट (ध्रुवा) स्थिर (एधि) रह। (मह्यम्) मुझ को अपनी मनसा के अनुकूल तुझे परमात्मा ने दिया है। तू (मया) मुझ (पत्या) पति के साथ (प्रजावती) बहुत उत्तम प्रजायुक्त होकर सौ वर्ष पर्यन्त आनन्दपूर्वक जीवन धारण कर। वधू-वर ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करें कि जिस से कभी उलटे विरोध में न चलें॥
[28]हे वधू वा वर! जैसे अन्न के साथ प्राण, प्राण के साथ अन्न तथा अन्न और प्राण का अन्तरिक्ष के साथ सम्बन्ध है, वैसे (ते) तेरे (हृदयम्) हृदय (च) और (मनः) मन (च) और चित्त आदि को (सत्यग्रन्थिना) सत्यता की गांठ से (बध्नामि) बांधती वा बांधता हूं॥1॥
[29]हे वर! हे स्वामिन् वा पत्नी! (यदेतत्) जो यह (तव) तेरा (हृदयम्) आत्मा वा अन्तःकरण है, (तत्) वह (मम) मेरा (हृदयम्) आत्मा अन्तःकरण के तुल्य प्रिय (अस्तु) हो। और (मम) मेरा (यदिदम्) जो यह (हृदयम्) आत्मा प्राण और मन है, (तत्) सो (तव) तेरे (हृदयम्) आत्मादि के तुल्य प्रिय (अस्तु) सदा रहे॥2॥
[30](असौ) हे यशोदे ! जो (प्राणस्य) प्राण का पोषण करनेहारा (षड्विंशः) 26 छब्बीसवाँ तत्त्व (अन्नम्) अन्न है, (तेन) उससे (त्वा) तुझ को (बध्नामि) दृढ़ प्रीति से बांधता वा बांधती हूं॥3॥
[31]हे वधू ! (अर्यमा) न्यायकारी दयालु (प्रजापतिः) परमात्मा कृपा करके (आजरसाय) जरावस्था-पर्यन्त जीने के लिये (नः) हमारी (प्रजाम्) उत्तम प्रजा को शुभ गुण, कर्म और स्वभाव से (आजनयतु) प्रसिद्ध करे, (समनक्तु) उस से उत्तम सुख को प्राप्त करे, और वे शुभगुणयुक्त (मङ्गलीः) स्त्रीलोग सब कुटुम्बियों को आनन्द (अदुः) देवें, उन में से एक तू हे वरानने ! (पतिलोकम्) पति के घर वा सुख को (आविश) प्रवेश वा प्राप्त हो। (नः) हमारे (द्विपदे) पिता आदि मनुष्यों के लिए (शम्) सुखकारिणी और (चतुष्पदे) गौ आदि को (शम्) सुखकर्त्ता (भव) हो॥1॥
[32]इस मन्त्र का अर्थ पृष्ठ 112 में लिखे प्रमाणे जानना॥2॥
[33]ईश्वर पुरुष और स्त्री को आज्ञा देता है कि हे (मीढ्वः) वीर्य-सेचन करनेहारे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त इस वधू के स्वामिन् ! (त्वम्) तू (इमाम्) इस वधू को (सुपुत्राम्) उत्तम पुत्रयुक्त (सुभगाम्) सुन्दर सौभाग्य भोगवाली (कृणु) कर। (अस्याम्) इस वधू में (दश) दश (पुत्रान्) पुत्रों को (आधेहि) उत्पन्न कर, अधिक नहीं। और हे स्त्री ! तू भी अधिक कामना मत कर, किन्तु दश पुत्र और (एकादशम्) ग्यारहवें (पतिम्) पति को प्राप्त होकर सन्तोष (कृधि) कर। यदि इस से आगे सन्तानोत्पत्ति का लोभ करोगे तो तुम्हारे दुष्ट अल्पायु निर्बुद्धि सन्तान होंगे। और तुम भी अल्पायु रोगग्रस्त हो जाओगे। इसलिये अधिक सन्तानोत्पत्ति न करना॥
तथा (पतिमेकादशं कृधि) इस पाद का अर्थ नियोग में दूसरा होगा—अर्थात् जैसे पुरुष को विवाहित स्त्री में दश पुत्र उत्पन्न करने की आज्ञा परमात्मा की है, वैसी ही आज्ञा स्त्री को भी है कि दश पुत्र तक चाहे विवाहित पति से अथवा विधवा हुए पश्चात् नियोग से करे करावे। वैसे ही एक स्त्री के लिये एक पति से एक वार विवाह, और पुरुष के लिये भी एक स्त्री से एक ही वार विवाह करने की आज्ञा है। जैसे विधवा हुए पश्चात् स्त्री नियोग से सन्तानोत्पत्ति करके पुत्रवती होवे, वैसे पुरुष भी विगतस्त्री होवे तो नियोग से पुत्रवान् होवे॥3॥
[34]हे वरानने ! तू (श्वशुरे) मेरा पिता जो कि तेरा श्वशुर है, उस में प्रीति करके (सम्राज्ञी) सम्यक् प्रकाशमान चक्रवर्ती राजा की राणी के समान पक्षपात छोड़के प्रवृत्त (भव) हो। (श्वश्र्वाम्) मेरी माता जो कि तेरी सासु है, उस में प्रेमयुक्त होके उसी की आज्ञा में (सम्राज्ञी) सम्यक् प्रकाशमान (भव) रहा कर। (ननान्दरि) जो मेरी बहिन और तेरी ननन्द है, उस में भी (सम्राज्ञी) प्रीतियुक्त और (देवृषु) मेरे भाई जो तेरे देवर और ज्येष्ठ अथवा कनिष्ठ हैं, उन में भी (सम्राज्ञी) प्रीति से प्रकाशमान (अधि भव) अधिकारयुक्त हो, अर्थात् सब से अविरोधपूर्वक प्रीति से वर्ता कर॥4॥
[35]इस मन्त्र का अर्थ पृष्ठ 112 में लिखे प्रमाणे समझ लेना॥
[36]इस से उत्तम ‘नमस्ते’ यह वेदोक्त वाक्य अभिवादन के लिए नित्यप्रति स्त्री-पुरुष, पिता-पुत्र अथवा गुरु-शिष्य आदि के लिए है। प्रातः सायम् अपूर्व समागम में जब-जब मिलें, तब-तब इसी वाक्य से परस्पर वन्दन करें॥