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अथ गृहाश्रमसंस्कारविधिं वक्ष्यामः

In Hindi:

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथ गृहाश्रमसंस्कारविधिं वक्ष्यामः

महर्षि दयानन्द व्याख्या :

‘गृहाश्रम-संस्कार’ उस को कहते हैं कि जो ऐहिक और पारलौकिक सुख-प्राप्ति के लिए विवाह करके अपने सामर्थ्य के अनुसार परोपकार करना और नियत काल में यथाविधि ईश्वरोपासना और गृहकृत्य करना और सत्य धर्म में ही अपना तन, मन, धन लगाना तथा धर्मानुसार सन्तानों की उत्पत्ति करनी।



अत्र प्रमाणानि—



सोमो॑ वधू॒युर॑भवद् अ॒श्विना॑स्तामु॒भा व॒रा।



सू॒र्यां यत्पत्ये॒ शंस॑न्तीं॒ मन॑सा सवि॒ता द॑दात्॥1॥



इ॒हैव स्तं॒ मा वि यौ॑ष्टं॒ विश्व॒मायु॒र्व्यश्नुतम्।



क्रीड॑न्तौ पु॒त्रैर्नप्तृ॑भि॒र्मोद॑मानौ स्वस्त॒कौ॥2॥



अर्थः—(सोमः) सुकुमार शुभगुणयुक्त, (वधूयुः) वधू की कामना करनेहारा पति तथा वधू पति की कामना करनेहारी (अश्विना) दोनों ब्रह्मचर्य से विद्या को प्राप्त (अभवत्) होवें और (उभा) दोनों (वरा) श्रेष्ठ तुल्य गुण, कर्म, स्वभाववाले (आस्ताम्) होवें। ऐसी (यत्) जो (सूर्याम्) सूर्य की किरणवत् सौन्दर्य गुणयुक्त, (पत्ये) पति के लिये (मनसा) मन से (शंसन्तीम्) गुण-कीर्त्तन करनेवाली वधू है उस को पुरुष और इसी प्रकार के पुरुष को स्त्री (सविता) सकल जगत् का उत्पादक परमात्मा (ददात्) देता है, अर्थात् बड़े भाग्य से दोनों स्त्री-पुरुषों का, जो कि तुल्य गुण, कर्म, स्वभाव हों, जोड़ा मिलता है॥1॥



हे स्त्रि और पुरुष ! मैं परमेश्वर आज्ञा देता हूं कि जो तुम्हारे लिये पूर्व विवाह में प्रतिज्ञा हो चुकी है, जिस को तुम दोनों ने स्वीकार किया है, (इहैव) इसी में (स्तम्) तत्पर रहो, (मा वियौष्टम्) इस प्रतिज्ञा से वियुक्त मत होओ। (विश्वमायुर्व्यश्नुतम्) ऋतुगामी होके वीर्य का अधिक नाश न करके सम्पूर्ण आयु, जो 100 सौ वर्षों से कम नहीं है, उस को प्राप्त होओ और पूर्वोक्त धर्मरीति से (पुत्रैः) पुत्रों और (नप्तृभिः) नातियों के साथ (क्रीडन्तौ) क्रीड़ा करते हुए (स्वस्तकौ) उत्तम गृहवाले (मोदमानौ) आनन्दित होकर गृहाश्रम में प्रीतिपूर्वक वास करो॥2॥



सु॒म॒ङ्ग॒ली प्र॒तर॑णी गृ॒हाणां॑ सु॒शेवा॒ पत्ये॒ श्वशु॑राय श॒म्भूः।



स्यो॒ना श्व॒श्र्वै प्र गृहान् वि॑शे॒मान्॥3॥



स्यो॒ना भ॑व॒ श्वशु॑रेभ्यः स्यो॒ना पत्ये॑ गृ॒हेभ्यः॑।



स्यो॒नास्यै सर्व॑स्यै वि॒शे स्यो॒ना पु॒ष्टायै॑षां भव॥4॥



या दु॒र्हार्दो॑ युव॒तयो॒ याश्चे॒ह ज॑रती॒रपि॑।



वर्चो॒ न्व१॒॑स्यै सं द॒त्ताथास्तं॑ वि॒परे॑तन॥5॥



आ रो॑ह॒ तल्पं॑ सुमन॒स्यमा॑ने॒ह प्र॒जां ज॑नय॒ पत्ये॑ अ॒स्मै।



इ॒न्द्रा॒णीव॑ सु॒बुधा॒ बुध्य॑माना॒ ज्योति॑रग्रा उ॒षसः॒ प्रति॑ जागरासि॥6॥



अर्थः—हे वरानने! तू (सुमङ्गली) अच्छे मङ्गलाचरण करने तथा (प्रतरणी) दोष और शोकादि से पृथक् रहनेहारी, (गृहाणाम्) गृह-कार्यों में चतुर और तत्पर रहकर (सुशेवा) उत्तम सुखयुक्त होके (पत्ये) पति (श्वशुराय) श्वशुर और (श्वश्र्वै) सासु के लिए (शम्भूः) सुखकर्त्री और (स्योना) स्वयं प्रसन्न हुई (इमान्) इन (गृहान्) घरों में सुखपूर्वक (प्रविश) प्रवेश कर॥3॥



हे वधू! तू (श्वशुरेभ्यः) श्वशुरादि के लिये (स्योना) सुखदाता, (पत्ये) पति के लिये (स्योना) सुखदाता, और (गृहेभ्यः) गृहस्थ सम्बन्धियों के लिये (स्योना) सुखदायक (भव) हो। और (अस्यै) इस (सर्वस्यै) सब (विशे) प्रजा के अर्थ (स्योना) सुखप्रद, और (एषाम्) इन के (पुष्टाय) पोषण के अर्थ तत्पर (भव) हो॥4॥



(याः) जो (दुर्हार्दः) दुष्ट हृदयवाली अर्थात् दुष्टात्मा (युवतयः) जवान स्त्रियां, (च) और (याः) जो (इह) इस स्थान में (जरतीः) बुड्ढी=वृद्ध दुष्ट स्त्रियां हों, वे (अपि) भी (अस्यै) इस वधू को (नु) शीघ्र (वर्चः) तेज (सं दत्त) देवें। (अथ) इसके पश्चात् (अस्तम्) अपने-अपने घरों को (विपरेतन) चली जावें, और फिर इस के पास कभी न आवें॥5॥



हे वरानने! तू (सुमनस्यमाना) प्रसन्नचित्त होकर (तल्पम्) पर्यङ्क पर (आरोह) चढ़के शयन कर। और (इह) इस गृहाश्रम में स्थिर रहकर (अस्मै) इस (पत्ये) पति के लिये (प्रजां जनय) प्रजा को उत्पन्न कर। (सुबुधा) सुन्दर ज्ञानी (बुध्यमाना) उत्तम शिक्षा को प्राप्त (इन्द्राणीव) सूर्य की कान्ति के समान तू (उषसः) उषःकाल से (अग्रा) पहली (ज्योतिः) ज्योति के तुल्य (प्रति जागरासि) प्रत्यक्ष सब कामों में जागती रह॥6॥



दे॒वा अग्रे॒ न्यपद्यन्त॒ पत्नीः॒ सम॑स्पृशन्त त॒न्वस्त॒नूभिः॑।



सू॒र्येव॑ नारि वि॒श्वरू॑पा महि॒त्वा प्र॒जाव॑ती॒ पत्या॒ सं भ॑वेह॒॥7॥



सं पि॑तरा॒वृत्वि॑ये सृजेथां मा॒ता पि॒ता च॒ रेत॑सो भवाथः।



मर्य॑ इव योषा॒मधि॑ रोहयैनां प्र॒जां कृ॑ण्वाथामि॒ह पु॑ष्यतं र॒यिम्॥8॥



तां पूष॑ञ्छि॒वत॑मा॒मेर॑यस्व॒ यस्यां॒ बीजं॑ मनु॒ष्या॒३॒॑ वप॑न्ति।



या न॑ ऊ॒रू उ॑श॒ती वि॒श्रया॑ति॒ यस्या॑मु॒शन्तः॑ प्र॒हरेम॒ शेपः॑॥9॥



अर्थः—हे सौभाग्यप्रदे (नारि) तू जैसे (इह) इस गृहाश्रम में (अग्रे) प्रथम (देवाः) विद्वान् लोग (पत्नीः) उत्तम स्त्रियों को (न्यपद्यन्त) प्राप्त होते हैं, और (तनूभिः) शरीरों से (तन्वः) शरीरों को (समस्पृशन्त) स्पर्श करते हैं, वैसे (विश्वरूपा) विविध सुन्दररूप को धारण करनेहारी, (महित्वा) सत्कार को प्राप्त होके (सूर्येव) सूर्य की कान्ति के समान (पत्या) अपने स्वामी के साथ मिलके (प्रजावती) प्रजा को प्राप्त होनेहारी (सम्भव) अच्छे प्रकार हो॥7॥



हे स्त्रीपुरुषो ! तुम (पितरौ) बालकों के जनक (ऋत्विये) ऋतुसमय में सन्तानों को (संसृजेथाम्) अच्छे प्रकार उत्पन्न करो। (माता) जननी (च) और (पिता) जनक दोनों (रेतसः) वीर्य को मिलाकर गर्भाधान करनेहारे (भवाथः) हूजिये। हे पुरुष ! (एनाम्) इस (योषाम्) अपनी स्त्री को (मर्य इव) प्राप्त होनेवाले पति के समान (अधि रोहय) सन्तानों से बढ़ा। और दोनों (इह) इस गृहाश्रम में मिलके (प्रजाम्) प्रजा को (कृण्वाथाम्) उत्पन्न करो। (पुष्यतम्) पालन-पोषण करो, और पुरुषार्थ से (रयिम्) धन को प्राप्त होओ॥8॥



हे (पूषन्) वृद्धिकारक पुरुष ! (यस्याम्) जिस में (मनुष्याः) मनुष्य लोग (बीजम्) वीर्य को (वपन्ति) बोते हैं, (या) जो (नः) हमारी (उशती) कामना करती हुई (ऊरू) ऊरू को सुन्दरता से (विश्रयाति) विशेषकर आश्रय करती है, (यस्याम्) जिस में (उशन्तः) सन्तानों की कामना करते हुए हम (शेपः) उपस्थेन्द्रिय का (प्रहरेम) प्रहरण करते हैं, (ताम्) उस (शिवतमाम्) अतिशय कल्याण करनेहारी स्त्री को सन्तानोत्पत्ति के लिये (एरयस्व) प्रेम से प्रेरणा कर॥9॥



स्यो॒नाद् योने॒रधि॒ बुध्य॑मानौ हसामु॒दौ म॑हसा॒ मोद॑मानौ।



सु॒गू सु॑पु॒त्रौ सु॑गृ॒हौ त॑राथो जी॒वावु॒षसो॑ विभा॒तीः॥10॥



इ॒हेमावि॑न्द्र॒ सं नु॑द चक्रवा॒केव॒ दम्प॑ती।



प्र॒जयै॑नौ स्वस्त॒कौ विश्व॒मायु॒र्व्यश्नुताम्॥11॥



ज॒नि॒यन्ति॑ ना॒वग्र॑वः पुत्रि॒यन्ति॑ सु॒दान॑वः।



अरि॑ष्टासू सचेवहि बृह॒ते वाज॑सातये॥12॥



अर्थः—हे स्त्रि और पुरुष ! जैसे सूर्य (विभातीः) सुन्दर प्रकाशयुक्त (उषसः) प्रभात वेला को प्राप्त होता है, वैसे (स्योनात्) सुख से (योनेः) घर के मध्य में (अधि बुध्यमानौ) सन्तानोत्पत्ति आदि की क्रिया को अच्छे प्रकार जाननेहारे, सदा (हसामुदौ) हास्य और आनन्दयुक्त, (महसा) बड़े प्रेम से (मोदमानौ) अत्यन्त प्रसन्न हुए, (सुगू) उत्तम चाल चलने से धर्मयुक्त व्यवहार में अच्छे प्रकार चलनेहारे, (सुपुत्रौ) उत्तम पुत्रवाले, (सुगृहौ) श्रेष्ठ गृहादि सामग्रीयुक्त (जीवौ) उत्तम प्रकार जीवों को धारण करते हुए (तराथः) गृहाश्रम के व्यवहारों के पार होओ॥10॥



हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त विद्वन् राजन् ! आप (इह) इस संसार में (इमौ) इन स्त्रीपुरुषों को समय पर विवाह करने को आज्ञा और ऐसी व्यवस्था दीजिये कि जिस से कोई स्त्री-पुरुष पृष्ठ 79-82 में लिखे प्रमाण से पूर्व वा अन्यथा विवाह न कर सकें, वैसे (सं नुद) सब को प्रसिद्धि से प्रेरणा कीजिए जिस से ब्रह्मचर्यपूर्वक शिक्षा को पाके (दम्पती) जाया और पति (चक्रवाकेव) चकवा चकवी के समान एक-दूसरे से प्रेमबद्ध रहें। और गर्भाधानसंस्कारोक्तविधि से (प्रजया) उन्नत हुई प्रजा से (एनौ) ये दोनों (स्वस्तकौ) सुखयुक्त होके (विश्वम्) सम्पूर्ण 100 सौ वर्षपर्यन्त (आयुः) आयु को (व्यश्नुताम्) प्राप्त होवें॥11॥



हे मनुष्यो ! जैसे (सुदानवः) विद्यादि उत्तम गुणों के दान करनेहारे (अग्रवः) उत्तम स्त्री-पुरुष (जनियन्ति) पुत्रोत्पत्ति करते और (पुत्रीयन्ति) पुत्र की कामना करते हैं, वैसे (नौ) हमारे भी सन्तान उत्तम होवें। तथा (अरिष्टासू) बल, प्राण का नाश न करनेहारे होकर (बृहते) बड़े (वाजसातये) परोपकार के अर्थ विज्ञान और अन्न आदि के दान के लिए (सचेवहि) कटिबद्ध सदा रहें, जिस से हमारे सन्तान भी उत्तम होवें॥12॥



प्र बु॑ध्यस्व सु॒बुधा॒ बुध्य॑माना दीर्घायु॒त्वाय॑ श॒तशा॑रदाय।



गृ॒हान् ग॑च्छ गृ॒हप॑त्नी॒ यथासो॑ दी॒र्घं त॒ आयुः॑ सवि॒ता कृ॑णोतु॥13॥



सहृ॑दयं सांमन॒स्यमवि॑द्वेषं कृणोमि वः।



अ॒न्यो अ॒न्यम॒भि ह॑र्यत व॒त्सं जा॒तमि॑वा॒घ्न्या॥14॥



अर्थः—हे पत्नी ! तू (शतशारदाय) शतवर्ष पर्यन्त (दीर्घायुत्वाय) दीर्घकाल जीने के लिए (सुबुधा) उत्तम बुद्धियुक्त, (बुध्यमाना) सज्ञान होकर (गृहान्) मेरे घरों को (गच्छ) प्राप्त हो और (गृहपत्नी) मुझ घर के स्वामी की स्त्री (यथा) जैसे (ते) तेरा (दीर्घम्) दीर्घकाल-पर्यन्त (आयुः) जीवन (आसः) होवे, वैसे (प्रबुध्यस्व) प्रकृष्ट ज्ञान और उत्तम व्यवहार को यथावत् जान। इस अपनी आशा को (सविता) सब जगत् की उत्पत्ति और सम्पूर्ण ऐश्वर्य को देनेहारा परमात्मा (कृणोतु) अपनी कृपा से सदा सिद्ध करे। जिस से तू और मैं सदा उन्नतिशील होकर आनन्द में रहें॥13॥



हे गृहस्थो ! मैं ईश्वर तुम को जैसी आज्ञा देता हूं, वैसा ही वर्तमान करो, जिस से तुम को अक्षय सुख हो। अर्थात् (वः) तुम्हारा (सहृदयम्) जैसी अपने लिए सुख की इच्छा करते और दुःख नहीं चाहते हो, वैसे माता-पिता सन्तान स्त्री-पुरुष भृत्य मित्र पाड़ोसी और अन्य सब से समान हृदय रहो। (सांमनस्यम्) मन से सम्यक् प्रसन्नता, और (अविद्वेषम्) वैर-विरोधादिरहित व्यवहार को तुम्हारे लिये (कृणोमि) स्थिर करता हूं। तुम (अघ्न्या) हनन न करने योग्य गाय (वत्सं जातमिव) उत्पन्न हुए बछड़े पर वात्सल्यभाव से जैसे वर्तती है, वैसे (अन्यो अन्यम्) एक-दूसरे से (अभि हर्यत) प्रेमपूर्वक कामना से वर्त्ता करो॥14॥



अनु॑व्रतः पि॒तुः पु॒त्रो मा॒त्रा भ॑वतु संम॑नाः।



जा॒या पत्ये॒ मधु॑मतीं॒ वाचं॑ वदतु शन्ति॒वान्॥15॥



मा भ्राता॒ भ्रात॑रं द्विक्ष॒न्मा स्वसा॑रमु॒त स्वसा॑।



स॒म्यञ्चः॒ सव्र॑ता भू॒त्वा वाचं॑ वदत भ॒द्रया॑॥16॥



अर्थः—हे गृहस्थो ! जैसे तुम्हारा (पुत्रः) पुत्र (मात्रा) माता के साथ (संमनाः) प्रीतियुक्त मनवाला, (अनुव्रतः) अनुकूल आचरणयुक्त, (पितुः) और पिता के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार का प्रेमवाला (भवतु) होवे, वैसे तुम भी पुत्रों के साथ सदा वर्त्ता करो। जैसे (जाया) स्त्री (पत्ये) पति की प्रसन्नता के लिये (मधुमतीम्) माधुर्यगुणयुक्त (वाचम्) वाणी को (वदतु) कहे, वैसे पति भी (शन्तिवान्) शान्त होकर अपनी पत्नी से सदा मधुर भाषण किया करे॥15॥



हे गृहस्थो ! तुम्हारे में (भ्राता) भाई (भ्रातरम्) भाई के साथ (मा द्विक्षन्) द्वेष कभी न करे। (उत) और (स्वसा) बहिन (स्वसारम्) बहिन से द्वेष कभी (मा) न करे। तथा बहिन भाई भी परस्पर द्वेष मत करो, किन्तु (सम्यञ्चः) सम्यक् प्रेमादि गुणों से युक्त (सव्रताः) समान गुण, कर्म, स्वभाववाले (भूत्वा) होकर (भद्रया) मङ्गलकारक रीति से एक-दूसरे के साथ (वाचम् सुखदायक वाणी को (वदत) बोला करो॥16॥



येन॑ दे॒वा न वि॒यन्ति॒ नो च॑ विद्विषते॑ मि॒थः।



तत्कृ॑ण्मो॒ ब्रह्म॑ वो गृ॒हे सं॒ज्ञानं॒ पुरु॑षेभ्यः॥17॥



अर्थः—हे गृहस्थो ! मैं ईश्वर (येन) जिस प्रकार के व्यवहार से (देवाः) विद्वान् लोग (मिथः) परस्पर (न वियन्ति) पृथक् भाववाले नहीं होते, (च) और (नो विद्विषते) परस्पर में द्वेष कभी नहीं करते, (तत्) वही कर्म (वः) तुम्हारे (गृहे) घर में (कृण्मः) निश्चित करता हूं। (पुरुषेभ्यः) पुरुषों को (संज्ञानम्) अच्छे प्रकार चिताता हूं कि तुम लोग परस्पर प्रीति से वर्त कर बड़े (ब्रह्म) धनैश्वर्य को प्राप्त होओ॥17॥



ज्याय॑स्वन्तश्चि॒त्तिनो॒ मा वि यौ॑ष्ट संरा॒धय॑न्तः॒ सधु॑रा॒श्चर॑न्तः।



अ॒न्यो अ॒न्यस्मै॑ व॒ल्गु वद॑न्त॒ एत॑ सध्री॒चीना॑न्वः॒ संम॑नसस्कृणोमि॥18॥



अर्थः—हे गृहस्थादि मनुष्यो ! तुम (ज्यायस्वन्तः) उत्तम विद्यादि- गुणयुक्त, (चित्तिनः) विद्वान् सज्ञान, (सधुराः) धुरन्धर होकर (चरन्तः) विचरते, और (संराधयन्तः) परस्पर मिलके धन-धान्य राज्यसमृद्धि को प्राप्त होते हुए (मा वियौष्ट) विरोधी वा पृथक्-पृथक् भाव मत करो। (अन्यः) एक (अन्यस्मै) दूसरे के लिये (वल्गु) सत्य मधुर भाषण (वदन्तः) कहते हुए एक-दूसरे को (एत) प्राप्त होओ। इसीलिये (सध्रीचीनान्) समान लाभाऽलाभ से एक-दूसरे के सहायक, (संमनसः) ऐकमत्यवाले (वः) तुम को (कृणोमि) करता हूं, अर्थात् मैं ईश्वर तुम को जो आज्ञा देता हूं, इस को आलस्य छोड़कर किया करो॥18॥



स॒मा॒नी प्र॒पा स॒ह वो॑ऽन्नभा॒गः स॑मा॒ने योक्त्रे॑ स॒ह वो॑ युनज्मि।



स॒म्यञ्चो॒ऽग्निं स॑पर्यता॒रा नाभि॑मिवा॒भितः॑॥19॥



स॒ध्री॒चीना॑न्वः॒ संम॑नसस्कृणो॒म्येक॑श्रुष्टीन्त्सं॒वन॑नेन॒ सर्वा॑न्।



दे॒वा इ॑वा॒मृतं॒ रक्ष॑माणाः सा॒यंप्रा॑तः सौमन॒सो वो॑ अस्तु॥20॥



अथर्व॰ कां॰ 3। सू॰ 30। मन्त्र 1-7॥



अर्थः—हे गृहस्थादि मनुष्यो ! मुझ ईश्वर की आज्ञा से तुम्हारा (प्रपा) जलपान स्नानादि का स्थान आदि व्यवहार (समानी) एक सा हो। (वः) तुम्हारा (अन्नभागः) खान-पान (सह) साथ हुआ करे। (वः) तुम्हारे (समाने) एक से (योक्त्रे) अश्वादि यान के जोते (सह) संगी हों। और तुम को मैं धर्म्मादि व्यवहार में भी एकीभूत करके (युनज्मि) नियुक्त करता हूं। जैसे (आराः) चक्र के आरे (अभितः) चारों ओर से (नाभिमिव) बीच के नालरूप काष्ठ में लगे रहते हैं, अथवा जैसे ऋत्विज् लोग और यजमान यज्ञ में मिलके (अग्निम्) अग्नि आदि के सेवन से जगत् का उपकार करते हैं, वैसे (सम्यञ्चः) सम्यक् प्राप्तिवाले तुम मिलके धर्मयुक्त कर्मों को (सपर्यत) एक-दूसरे का हित सिद्ध किया करो॥19॥



हे गृहस्थादि मनुष्यो ! मैं ईश्वर (वः) तुम को (सध्रीचीनान्) सह वर्त्तमान, (संमनसः) परस्पर के लिये हितैषी, (एकश्रुष्टीन्) एक ही धर्मकृत्य में शीघ्र प्रवृत्त होनेवाले (सर्वान्) सब को (संवननेन) धर्मकृत्य के सेवन के साथ एक-दूसरे के उपकार में नियुक्त (कृणोमि) करता हूं। तुम (देवा इव) विद्वानों के समान (अमृतम्) व्यावहारिक वा पारमार्थिक सुख की (रक्षमाणाः) रक्षा करते हुए (सायंप्रातः) सन्ध्या और प्रातःकाल अर्थात् सब समय में एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक मिला करो। ऐसे करते हुए (वः) तुम्हारा (सौमनसः) मन का आनन्दयुक्त शुद्धभाव (अस्तु) सदा बना रहे॥20॥



श्रमे॑ण॒ तप॑सा सृ॒ष्टा ब्रह्म॑णा वि॒त्त ऋ॒ते श्रि॒ताः॥21॥



स॒त्येनावृ॑ताः श्रि॒या प्रावृ॑ता॒ यश॑सा॒ परी॑वृताः॥22॥



स्व॒धया॒ परि॑हिताः श्र॒द्धया॒ पर्यू॑ढा दी॒क्षया॑ गु॒प्ता



य॒ज्ञे प्रति॑ष्ठिता लो॒को नि॒धन॑म्॥23॥



अर्थः—हे स्त्रीपुरुषो ! मैं ईश्वर तुम को आज्ञा देता हूं कि तुम सब गृहस्थ मनुष्य लोग (श्रमेण) परिश्रम तथा (तपसा) प्राणायाम से (सृष्टाः) संयुक्त, (ब्रह्मणा) वेदविद्या परमात्मा और धनादि से (वित्ते) भोगने योग्य धनादि के प्रयत्न में, और (ऋते) यथार्थ पक्षपातरहित न्यायरूप धर्म में (श्रिताः) चलनेहारे सदा बने रहो॥21॥



(सत्येन) सत्यभाषणादि कर्मों से (आवृताः) चारों ओर से युक्त, (श्रिया) शोभा तथा लक्ष्मी से (प्रावृताः) युक्त, (यशसा) कीर्ति और धन से (परीवृताः) सब ओर से संयुक्त रहा करो॥22॥



(स्वधया) अपने ही अन्नादि पदार्थ के धारण से (परिहिताः) सब के हितकारी, (श्रद्धया) सत्य धारण में श्रद्धा से (पर्यूढाः) सब ओर से सब को सत्याचरण प्राप्त करानेहारे, (दीक्षया) नाना प्रकार के ब्रह्मचर्य



सत्यभाषणादि व्रत धारण से (गुप्ताः) सुरक्षित, (यज्ञे) विद्वानों के सत्कार शिल्पविद्या और शुभ गुणों के दान में (प्रतिष्ठिताः) प्रतिष्ठा को प्राप्त हुआ करो। और इन्हीं कर्मों से (निधनं लोकः) इस मनुष्यलोक को प्राप्त होके मृत्युपर्यन्त सदा आनन्द में रहो॥23॥



ओज॑श्च॒ तेज॑श्च॒ सह॑श्च॒ बलं॑ च॒ वाक् चे॑न्द्रि॒यं च॒ श्रीश्च॒ धर्म॑श्च॒॥24॥



अर्थः—हे मनुष्यो ! तुम जो (ओजः) पराक्रम (च) और इस की सामग्री, (तेजः) तेजस्वीपन (च) और इस की सामग्री, (सहः) स्तुति-निन्दा हानि-लाभ तथा शोकादि का सहन (च) और इस के साधन, (बलं च) बल और इस के साधन, (वाक् च) सत्य प्रिय वाणी और इस के अनुकूल व्यवहार, (इन्द्रियं च) शान्त धर्मयुक्त अन्तःकरण और शुद्धात्मा तथा जितेन्द्रियता, (श्रीश्च॒) लक्ष्मी सम्पत्ति और इस की प्राप्ति का धर्मयुक्त उद्योग, (धर्मश्च॒) पक्षपातरहित न्यायाचरण वेदोक्त धर्म और जो इस के साधन वा लक्षण हैं, उन को तुम प्राप्त होके इन्हीं में सदा वर्त्ता करो॥24॥



ब्रह्म॑ च क्ष॒त्रं च॑ रा॒ष्ट्रं च॒ विश॑श्च॒ त्विषि॑श्च॒ यश॑श्च॒ वर्च॑श्च॒ द्रवि॑णं च॥25॥



आयु॑श्च रू॒पं च॒ नाम॑ च की॒र्तिश्च॒ प्रा॒णश्चापा॒नश्च॒ चक्षु॑श्च॒ श्रोत्रं॑ च॥26॥



पय॑श्च॒ रस॒श्चान्नं॑ चान्नाद्यं॑ च ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चे॒ष्टं च॑ पू॒र्तं च॑ प्र॒जा च॑ प॒शव॑श्च॥27॥



अथर्व॰ कां॰ 12। अ॰ 5। वर्ग 1-2॥



अर्थः—हे गृहस्थादि मनुष्यो ! तुम को योग्य है कि (ब्रह्म च) पूर्ण विद्यादि शुभ गुणयुक्त मनुष्य और सब के उपकारक शम, दमादि गुणयुक्त ब्रह्मकुल, (क्षत्रं च) विद्यादि उत्तम गुणयुक्त तथा विनय और शौर्यादि गुणों से युक्त क्षत्रियकुल (राष्ट्रं च) राज्य और उस का न्याय से पालन, (विशश॑) उत्तम प्रजा और उस की उन्नति, (त्विषिश्च) सद्विद्यादि से तेज आरोग्य शरीर और आत्मा के बल से प्रकाशमान, और इस की उन्नति से (यशश॑) कीर्तियुक्त तथा इस के साधनों को प्राप्त हुआ करो। (वर्चश्च) पढ़ी हुई विद्या का विचार और उस का नित्य पढ़ना,(द्रविणं च) द्रव्योपार्जन उस की रक्षा और धर्मयुक्त परोपकार में व्यय करने आदि कर्मों को सदा किया करो॥25॥



हे स्त्रीपुरुषो ! तुम अपना (आयुः) जीवन बढ़ाओ, (च) और सब जीवन में धर्मयुक्त उत्तम कर्म ही किया करो। (रूपं च) विषयासक्ति कुपथ्य रोग और अधर्माचरण को छोड़के अपने स्वरूप को अच्छा रक्खो और वस्त्राभूषण भी धारण किया करो, (नाम च) नामकरण के पृष्ठ 49-52 में लिखे प्रमाणे शास्त्रोक्त संज्ञाधारण और उसके नियमों को भी (कीर्तिश्च) सत्याचरण से प्रशंसा का धारण, और गुणों में दोषारोपण रूप निन्दा को छोड़ दो। (प्राणश्च) चिरकालपर्यन्त जीवन का धारण और उस के युक्ताहार विहारादि साधन, (अपानश्च) सब दुःख दूर करने का उपाय और उस की सामग्री, (चक्षुश्च) प्रत्यक्ष और अनुमान उपमान, (श्रोत्रं च) शब्दप्रमाण और उस की सामग्री को धारण किया करो॥26॥



हे गृहस्थ लोगो ! (पयश॑) उत्तम जल दूध और इस का शोधन और युक्ति से सेवन, (रसश॑) घृत दूध मधु आदि और इस का युक्ति से आहार-विहार, (अन्नं च) उत्तम चावल आदि अन्न और उस के उत्तम संस्कार किये (अन्नाद्यं च) खाने योग्य पदार्थ और उस के साथ उत्तम दाल, शाक, कढ़ी आदि, (ऋतं च) सत्य मानना और सत्य मनवाना, (सत्यं च) सत्य बोलना और बुलवाना (इष्टं च) यज्ञ करना और कराना, (पूर्त्तं च) यज्ञ की सामग्री पूरी करना तथा जलाशय और आरामवाटिका आदि का बनाना और बनवाना, (प्रजा च) प्रजा की उत्पत्ति पालन और उन्नति सदा करनी तथा करानी, (पशवश्च) गाय आदि पशुओं का पालन और उन्नति सदा करनी तथा करानी चाहिये॥27॥



कु॒र्वन्ने॒वेह कर्मा॑णि जिजीवि॒षेच्छ॒तं समाः॑।



ए॒वं त्वयि॒ नान्यथे॒तोऽस्ति न कर्म॑ लिप्यते॒ नरे॑॥1॥य॰ अ॰ 40। मन्त्र 2॥



अर्थः—मैं परमात्मा सब मनुष्यों के लिए आज्ञा देता हूं कि सब मनुष्य (इह) इस संसार में शरीर से समर्थ होके (कर्माणि) सत्कर्मों को (कुर्वन्नेव) करता ही करता (शतं समाः) 100 सौ वर्ष पर्यन्त (जिजीविषेत्) जीने की इच्छा करे, आलसी और प्रमादी कभी न होवे। (एवम्) इसी प्रकार उत्तम कर्म करते हुए (त्वयि) तुझ (नरे) मनुष्य में (इतः) इस हेतु से (अन्यथा) उलटा पापरूप (कर्म) दुःखद कर्म (न लिप्यते) लिप्यमान कभी नहीं होता, और तुम पापरूप कर्म में लिप्त कभी मत होओ। इस उत्तम कर्म से कुछ भी दुःख (नास्ति) नहीं होता। इसलिये तुम स्त्रीपुरुष सदा पुरुषार्थी होकर उत्तम कर्मों से अपनी और दूसरों की सदा उन्नति किया करो॥1॥



पुनः स्त्रीपुरुष सदा निम्नलिखित मन्त्रों के अनुकूल इच्छा और आचरण किया करें। वे मन्त्र ये हैं—



भूर्भुवः॒ स्वः। सुप्र॒जाः प्र॒जाभिः॑ स्यां सु॒वीरो॑ वी॒रैः सु॒पोषः॒ पोषैः॑।



नर्यं॑ प्र॒जां मे॑ पाहि॒ शंस्य॑ प॒शून् मे॑ पा॒ह्यथ॑र्य पि॒तुं मे॑ पाहि॥2॥



गृहा॒ मा बि॑भीत॒ मा वे॑पध्व॒मूर्जं॒ बिभ्र॑त॒ऽ एम॑सि।



ऊर्जं॒ बिभ्र॑द्वः सु॒मनाः॑ सुमे॒धा गृ॒हानैमि॒ मन॑सा॒ मोद॑मानः॥3॥यजु॰ अ॰ 3। मन्त्र 37, 41॥



अर्थः—हे स्त्री वा पुरुष ! मैं तेरा वा अपने के सम्बन्ध से (भूर्भुवः स्वः) शारीरिक वाचिक और मानस अर्थात् त्रिविध सुख से युक्त होके (प्रजाभिः) मनुष्यादि उत्तम प्रजाओं के साथ (सुप्रजाः) उत्तम प्रजायुक्त (स्याम्) होऊं। (वीरैः) उत्तम पुत्र बन्धु सम्बन्धी और भृत्यों से सह वर्तमान (सुवीरः) उत्तम वीरों से सहित होऊँ। (पोषैः) उत्तम पुष्टिकारक व्यवहारों से (सुपोषः) उत्तम पुष्टियुक्त होऊँ। हे (नर्य) मनुष्यों में सज्जन वीर स्वामिन् ! (मे) मेरी (प्रजाम्) प्रजा की (पाहि) रक्षा कीजिये। हे (शंस्य) प्रशंसा करने योग्य स्वामिन् ! आप (मे) मेरे (पशून्) पशुओं की (पाहि) रक्षा कीजिये। हे (अथर्य) अहिंसक दयालो स्वामिन् ! (मे) मेरे (पितुम्) अन्न आदि की (पाहि) रक्षा कीजिये। वैसे हे नारी ! प्रशंसनीय गुणयुक्त तू मेरी प्रजा मेरे पशु और मेरे अन्न की सदा रक्षा किया कर॥2॥



हे (गृहाः) गृहस्थ लोगो ! तुम विधिपूर्वक गृहाश्रम में प्रवेश करने से (मा बिभीत) मत डरो, (मा वेपध्वम्) मत कम्पायमान होओ। (ऊर्ज्जम्) अन्न पराक्रम तथा विद्यादि शुभ गुण से युक्त होकर गृहाश्रम को (बिभ्रतः) धारण करते हुए तुम लोगों को हम सत्योपदेशक विद्वान् लोग (एमसि) प्राप्त होते और सत्योपदेश करते हैं और अन्नपानाच्छादन-स्थान से तुम्हीं हमारा निर्वाह करते हो। इस लिये तुम्हारा गृहाश्रम व्यवहार मंो निवास सर्वोत्कृष्ट है। हे वरानने ! जैसे मैं तेरा पति (मनसा) अन्तःकरण से (मोदमानः) आनन्दित (सुमनाः) प्रसन्न मन (सुमेधाः) उत्तम बुद्धि से युक्त मुझ को, और हे मेरे पूजनीयतम पिता अदि लोगो ! (वः) तुम्हारे लिये (ऊर्ज्जम्) पराक्रम तथा अन्नादि ऐश्वर्य को (बिभ्रत्) धारण करता हुआ तुम (गृहान् गृहस्थों को (आ एमि) सब प्रकार से प्राप्त होता हूं, उसी प्रकार तुम लोग भी मुझ से प्रसन्न होके वर्ता करो॥3॥



येषा॑म॒ध्येति॑ प्र॒वस॒न् येषु॑ सौमन॒सो ब॒हुः।



गृ॒हानुप॑ह्वयामहे॒ ते नो॑ जानन्तु जान॒तः॥4॥



उप॑हूताऽ इ॒ह गाव॒ऽ उप॑हूता अजा॒वयः॑।



अथो॒ऽअन्न॑स्य की॒लाल॒ऽ उप॑हूतो गृ॒हेषु॑ नः।



क्षेमा॑य वः शान्त्यै॒ प्रप॑द्ये शि॒वं श॒ग्मं शं॒योः शं॒योः॥5॥यजु॰ अध्याय 3। मं॰ 42, 43॥



अर्थ—हे गृहस्थो ! (प्रवसन्) परदेश को गया हुआ मनुष्य (येषाम्) जिन का (अध्येति) स्मरण करता है, (येषु) जिन गृहस्थों में (बहुः) बहुत (सौमनसः) प्रीति होती है, उन (गृहान्) गृहस्थों की हम विद्वान् लोग (उपह्वयामहे) प्रशंसा करते और प्रीति से समीपस्थ बुलाते हैं। (ते) वे गृहस्थ लोग (जानतः) उन को जाननेवाले (नः) हम लोगों को (जानन्तु) सुहृद् जानें। वैसे तुम गृहस्थ और हम संन्यासी लोग आपस में मिलके पुरुषार्थ से व्यवहार और परमार्थ की उन्नति सदा किया करें॥4॥



हे गृहस्थो ! (नः) अपने (गृहेषु) घरों में जिस प्रकार (गावः) गौ आदि उत्तम पशु (उपहूताः) समीपस्थ हों, तथा (अजावयः) बकरी भेड़ आदि दूध देनेवाले पशु (उपहूताः) समीपस्थ हों, (अथो) इस के अनन्तर (अन्नस्य) अन्नादि पदार्थों के मध्य में उत्तम (कीलालः) अन्नादि पदार्थ (उपहूतः) प्राप्त होवे, हम लोग वैसा प्रयत्न किया करें। हे गृहस्थो! मैं उपदेशक वा राजा (इह) इस गृहाश्रम में (वः) तुम्हारे (क्षेमाय) रक्षण तथा (शान्त्यै) निरुपद्रवता करने के लिये (प्रपद्ये) प्राप्त होता हूं। मैं और आप लोग प्रीति से मिलके (शिवम्) कल्याण (शग्मम्) व्यावहारिक सुख और (शंयोः शंयोः) पारमार्थिक सुख को प्राप्त होके अन्य सब लोगों को सदा सुख दिया करें॥5॥



सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।



यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम्॥1॥





यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत्।



अप्रमोदात् पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्त्तते॥2॥—मनु॰॥



अर्थ—हे गृहस्थो ! जिस कुल में भार्या से प्रसन्न पति और पति से भार्या सदा प्रसन्न रहती है, उसी कुल में निश्चित कल्याण होता है और दोनों परस्पर अप्रसन्न रहें तो उस कुल में नित्य कलह वास करता है॥1॥



यदि स्त्री पुरुष पर रुचि न रक्खे वा पुरुष को प्रहर्षित न करे तो अप्रसन्नता से पुरुष के शरीर में कामोत्पत्ति कभी न होके सन्तान नहीं होते और यदि होते हैं तो दुष्ट होते हैं॥2॥



स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद् रोचते कुलम्।



तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते॥3॥—मनु॰॥



अर्थ—और जो पुरुष स्त्री को प्रसन्न नहीं करता तो उस स्त्री के अप्रसन्न रहने से सब कुलभर अप्रसन्न=शोकातुर रहता है और जब पुरुष से स्त्री प्रसन्न रहती है, तब सब कुल आनन्दरूप दीखता है॥3॥



पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवरैस्तथा।



पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः॥4॥



यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।



यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥5॥



शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।



न शोचन्ति तु यत्रैता वर्द्धते तद्धि सर्वदा॥6॥



जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः।



तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः॥7॥—मनु॰॥



अर्थ—पिता, भ्राता, पति और देवर को योग्य है कि अपनी कन्या, बहिन, स्त्री और भौजाई आदि स्त्रियों की सदा पूजा करें, अर्थात् यथायोग्य मधुर भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रक्खें, जिन को कल्याण की इच्छा हो, वे स्त्रियों को क्लेश कभी न देवें॥4॥



जिस कुल में नारियों की पूजा अर्थात् सत्कार होता है, उस कुल में दिव्य गुण, दिव्य भोग और उत्तम सन्तान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा नहीं होती, वहां जानो उन की सब क्रिया निष्फल हैं॥5॥



जिस कुल में स्त्री लोग अपने-अपने पुरुषों के वेश्यागमन वा व्यभिचारादि दोषों से शोकातुर रहती हैं, वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है। और जिस कुल में स्त्रीजन पुरुषों के उत्तमाचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है॥6॥



जिन कुल और घरों में अपूजित अर्थात् सत्कार को न प्राप्त होकर स्त्रीलोग जिन गृहस्थों को शाप देती हैं, वे कुल तथा गृहस्थ जैसे विष देकर बहुतों को नाश कर देवें, वैसे चारों ओर से नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं॥7॥





तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः।



भूतिकामैर्नरैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च॥8॥—मनु॰॥



अर्थ—इस कारण ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाले पुरुषों को योग्य है कि इन स्त्रियों को सत्कार के अवसरों और उत्सवों में भूषण वस्त्रखान-पान आदि से सदा पूजा अर्थात् सत्कारयुक्त प्रसन्न रक्खें॥8॥



सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया।



सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया॥9॥—मनु॰॥



अर्थ—स्त्री को योग्य है कि सदा आनन्दित होके चतुरता से गृहकार्यों में वर्तमान रहे तथा अन्नादि के उत्तम संस्कार, पात्र, वस्त्र, गृह आदि के संस्कार और घर के भोजनादि में जितना नित्य धन आदि लगे, उस के यथायोग्य करने में सदा प्रसन्न रहे॥9॥



एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः।



उत्कर्षं योषितः प्राप्ताः स्वैः स्वैर्भर्तृगुणैः शुभैः॥10॥



अर्थ—यदि स्त्रियाँ दुष्टाचारयुक्त भी हों तथापि इस संसार में बहुत स्त्रियाँ अपने-अपने पतियों के शुभ गुणों से उत्कृष्ट हो गईं, होती हैं और होंगी भी। इसलिए यदि पुरुष श्रेष्ठ हों तो स्त्रियाँ श्रेष्ठ और दुष्ट हों तो दुष्ट हो जाती हैं। इस से प्रथम मनुष्यों को उत्तम होके अपनी स्त्रियों को उत्तम करना चाहिए॥10॥



प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः।



स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन॥11॥



उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम्।



प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्यक्षं स्त्रीनिबन्धनम्॥12॥



अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा।



दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितॄणामात्मनश्च ह॥13॥



यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः।



तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमाः॥14॥—मनु॰॥



अर्थ—हे पुरुषो ! सन्तानोत्पत्ति के लिये महाभाग्योदय करनेहारी, पूजा के योग्य, गृहाश्रम को प्रकाश करती, सन्तानोत्पत्ति करने करानेहारी घरों में स्त्रियां हैं, वे श्री अर्थात् लक्ष्मीस्वरूप होती हैं। क्योंकि लक्ष्मी शोभा धन और स्त्रियों में कुछ भेद नहीं है॥11॥



हे पुरुषो ! अपत्यों की उत्पत्ति, उत्पन्न का पालन करने आदि लोकव्यवहार को नित्यप्रति, जो कि गृहाश्रम का कार्य होता है, उस का निबन्ध करनेवाली प्रत्यक्ष स्त्री है॥12॥



सन्तानोत्पत्ति, धर्म-कार्य, उत्तम सेवा और रति तथा अपना और पितरों का जितना सुख है, वह सब स्त्री ही के आधीन होता है॥13॥



जैसे वायु के आश्रय से सब जीवों का वर्तमान सिद्ध होता है, वैसे ही गृहस्थ के आश्रय से ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी अर्थात् सब आश्रमों का निर्वाह गृहस्थ के आश्रय से होता है॥14॥



यस्मात् त्रयोऽप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम्।



गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही॥15॥



स सन्धार्यः प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता।



सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः॥16॥



सर्वेषामपि चैतेषां वेदस्मृतिविधानतः।



गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः स त्रीनेतान् बिभर्ति हि॥17॥



अर्थ—जिस से ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी इन तीन आश्रमियों को अन्न, वस्त्रादि दान से नित्यप्रति गृहस्थ धारण पोषण करता है, इसलिये व्यवहार में गृहाश्रम सब से बड़ा है॥15॥



हे स्त्रीपुरुषो! जो तुम अक्षय[1]मुक्ति-सुख और इस संसार के सुख की इच्छा रखते हो तो जो दुर्बलेन्द्रिय और निर्बुद्धि पुरुषों के धारण करने योग्य नहीं है, उस गृहाश्रम को नित्य प्रयत्न से धारण करो॥16॥



वेद और स्मृति के प्रमाण से सब आश्रमों के बीच में गृहाश्रम श्रेष्ठ है, क्योंकि यही आश्रम ब्रह्मचारी आदि तीनों आश्रमों का धारण और पालन करता है॥17॥



यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्।



तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम्॥18॥



उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः।



तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनाम्॥19॥



आसनावसथौ शय्यामनुव्रज्यामुपासनाम्।



उत्तमेषूत्तमं कुर्याद्धीनं हीने समे समम्॥20॥



पाषण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालव्रतिकान् शठान्।



हैतुकान् वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्॥21॥



अर्थ—हे मनुष्यो! जैसे सब बड़े-बड़े नद और नदी सागर में जाकर स्थिर होते हैं, वैसे ही सब आश्रमी गृहस्थ ही को प्राप्त होके स्थिर होते हैं॥18॥



यदि गृहस्थ होके पराये घर में भोजनादि की इच्छा करते हैं तो वे बुद्धिहीन गृहस्थ अन्य से प्रतिग्रहरूप पाप करके जन्मान्तर में अन्नादि के दाताओं के पशु बनते हैं। क्योंकि अन्य से अन्नादि का ग्रहण करना अतिथियों का काम है, गृहस्थों का नहीं॥19॥



जब गृहस्थ के समीप अतिथि आवें, तब आसन, निवास, शय्या, पश्चाद् गमन और समीप में बैठना आदि सत्कार जैसे का वैसा, अर्थात् उत्तम का उत्तम, मध्यम का मध्यम और निकृष्ट का निकृष्ट करे। ऐसा न हो कि इसे कभी न समझें॥20॥



किन्तु जो पाखण्डी वेदनिन्दक नास्तिक ईश्वर वेद और धर्म को न मानें, अधर्माचरण करनेहारे, हिंसक, शठ, मिथ्याभिमानी, कुतर्की और वकवृत्ति, अर्थात् पराये पदार्थ हरने वा बहकाने में बगुले के समान अतिथिवेशधारी बनके आवें, उन का वचनमात्र से भी सत्कार गृहस्थ कभी न करे॥21॥



दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः।



दशध्वजसमो वेषो दशवेषसमो नृपः॥22॥



न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथञ्चन ।



अजिह्मामशठां शुद्धां जीवेद् ब्राह्मणजीविकाम्॥23॥



सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवाऽऽरमेत् सदा।



शिष्यांश्च शिष्याद् धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः॥24॥



परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ।



धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकविक्रुष्टमेव च॥25॥—मनु॰॥



अर्थ—दश हत्या के समान चक्र अर्थात् कुम्हार, गाड़ी से जीविका करनेहारे, दश चक्र के समान ध्वज अर्थात् धोबी, मद्य को निकाल कर बेचनेहारे, दश ध्वज के समान वेष अर्थात् वेश्या, भड़ुआ भांड, दूसरे की नकल अर्थात् पाषाणमूर्तियों के पूजक (=पूजारी) आदि और दश वेष के समान जो अन्यायकारी राजा होता है, उन के अन्न आदि का ग्रहण अतिथि लोग कभी न करें॥22॥



गृहस्थ जीविका के लिये भी कभी शास्त्रविरुद्ध लोकाचार का वर्त्ताव न वर्त्ते। किन्तु जिस में किसी प्रकार की कुटिलता, मूर्खता, मिथ्यापन वा अधर्म न हो, उस वेदोक्त कर्म-सम्बन्धी जीविका को करे॥23॥



सत्य, धर्म, आर्य अर्थात् आप्त पुरुषों के व्यवहार और शौच=पवित्रता ही में सदा गृहस्थ लोग प्रवृत्त रहें और सत्यवाणी, भोजनादि के लोभरहित, हस्तपादादि की कुचेष्टा छोड़कर धर्म से शिष्यों और सन्तानों को उत्तम शिक्षा सदा किया करें॥24॥



यदि बहुत सा धन, राज्य और अपनी कामना अधर्म से सिद्ध होती हो तो भी अधर्म सर्वथा छोड़ देवें। और वेदविरुद्ध धर्माभास जिस के करने से उत्तरकाल में दुःख और संसार की उन्नति का नाश हो, वैसा नाममात्र धर्म और कर्म कभी न किया करें॥25॥



सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।



योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः॥26॥



क्षान्त्या शुध्यन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिणः।



प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमाः ॥27॥



अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति।



विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति॥28॥



दशावरा वा परिषद् यं धर्मं परिकल्पयेत्।



त्र्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत्॥29॥



दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।



दण्डः सुप्तेषु जागर्त्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः॥30॥



तस्याहुः सम्प्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम्।



समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम्॥31॥ —मनु॰॥



अर्थ—जो धर्म ही से पदार्थों का सञ्चय करना है, वही सब पवित्रताओं में उत्तम पवित्रता, अर्थात् जो अन्याय से किसी पदार्थ का ग्रहण नहीं करता, वही पवित्र है। किन्तु जल-मृत्तिकादि से जो पवित्रता होती है, वह धर्म के सदृश उत्तम नहीं है॥26॥



विद्वान् लोग क्षमा से, दुष्टकर्मकारी सत्सङ्ग और विद्यादि शुभ गुणों के दान से, गुप्त पाप करनेहारे विचार से त्याग कर और ब्रह्मचर्य तथा सत्यभाषणादि से वेदवित् उत्तम विद्वान् शुद्ध होते हैं॥27॥



किन्तु जल से ऊपर के अग् पवित्र होते हैं, आत्मा और मन नहीं। मन तो सत्य मानने, सत्य बोलने और सत्य करने से शुद्ध और जीवात्मा विद्या योगाभ्यास और धर्माचरण ही से पवित्र तथा बुद्धि ज्ञान से ही शुद्ध होती है, जल मृत्तिकादि से नहीं॥28॥



गृहस्थ लोग छोटों बड़ों वा राजकार्यों के सिद्ध करने में कम से कम 10 दश अर्थात् ऋग्वेदज्ञ, यजुर्वेदज्ञ, सामवेदज्ञ, हैतुक (=नैयायिक), तर्ककर्त्ता, नैरुक्त (=निरुक्तशास्त्रज्ञ), धर्माध्यापक, ब्रह्मचारी, स्नातक और वानप्रस्थ विद्वानों, अथवा अतिन्यूनता करे तो तीन वेदवित् (=ऋग्वेदज्ञ, यजुर्वेदज्ञ और सामवेदज्ञ) विद्वानों की सभा से कर्त्तव्याकर्त्तव्य धर्म और अधर्म का जैसा निश्चय हो, वैसा ही आचरण किया करें॥29॥



और जैसा विद्वान् लोग दण्ड ही को धर्म जानते हैं, वैसा सब लोग जानें, क्योंकि दण्ड ही प्रजा का शासन अर्थात् नियम में रखने वाला, दण्ड ही सब का सब ओर से रक्षक और दण्ड ही सोते हुओं में जागता है। चोरादि दुष्ट भी दण्ड ही के भय से पापकर्म नहीं कर सकते॥30॥



उस दण्ड को अच्छे प्रकार चलानेहारे उस राजा को कहते हैं कि जो सत्यवादी, विचार करके ही कार्य का कर्त्ता, बुद्धिमान्, विद्वान्, धर्म, काम और अर्थ का यथावत् जाननेहारा हो॥31॥



सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।



न शक्यो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेषु च॥32॥



शुचिना सत्यसन्धेन यथाशास्त्रानुसारिणा।



प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता॥33॥



अदण्ड्यान्दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्।



अयशो महद् आप्नोति नरकं चैव गच्छति॥34॥



अर्थ—जो राजा उत्तम सहायरहित, मूढ़, लोभी, जिस ने ब्रह्मचर्यादि उत्तम कर्मों से विद्या और बुद्धि की उन्नति नहीं की, जो विषयों में फंसा हुआ है, उस से वह दण्ड कभी न्यायपूर्वक नहीं चल सकता॥32॥



इसलिए जो पवित्र, सत्पुरुषों का सङ्गी, राजनीतिशास्त्र के अनुकूल चलनेहारा, धार्मिक पुरुषों के सहाय से युक्त, बुद्धिमान् राजा हो, वही इस दण्ड को धारण करके चला सकता है॥33॥



जो राजा अनपराधियों को दण्ड देता, और अपराधियों को दण्ड नहीं देता है, वह इस जन्म में बड़ी अपकीर्ति को प्राप्त होता और मरे पश्चात् नरक अर्थात् महादुःख को पाता है॥34॥



मृगयाक्षा दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः।



तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः॥35॥



पैशुन्यं साहसं द्रोह ईर्ष्याऽसूयार्थदूषणम् ।



वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः॥36॥



द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः।



तं यत्नेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभौ गणौ॥37॥



अर्थ—जिस राजा में शिकार खेलना, द्यूत और प्रसन्नता के लिए भी चौपड़ आदि खेलना, दिन में सोना, हंसी ठट्ठा, मिथ्यावाद करना, स्त्रियों के साथ सदा अधिक निवास में मोहित होना, मद्यपानादि नशाओं का करना, गाना, बजाना, नाचना वा इन का देखना और वृथा इधर- उधर घूमते फिरना, ये दश दुर्गुण काम से होते हैं॥35॥



और चुगली खाना, विना विचारे काम कर बैठना, जिस किसी से वृथा वैर बांधना, दूसरे की स्तुति सुन वा बढ़ती देखके हृदय में जला करना, दूसरों के गुणों में दोष और दोषों में गुण स्थापन करना, बुरे कामों में धन का लगाना, क्रूर वाणी और विना विचारे पक्षपात से किसी को करडा दण्ड देना, ये आठ दोष क्रोधी पुरुष में उत्पन्न होते हैं। ये 18 अठारह दुर्गुण हैं, इन को राजा अवश्य छोड़ देवे॥36॥



और जो इन कामज और क्रोधज 18 अठारह दोषों के मूल जिस लोभ को सब विद्वान् लोग जानते हैं, उस को प्रयत्न से राजा जीते, क्योंकि लोभ ही से पूर्वोक्त 18 अठारह और अन्य दोष भी बहुत से होते हैं। इसलिए हे गृहस्थ लोगो ! चाहे वह राजा का ज्येष्ठ पुत्र क्यों न हो, परन्तु ऐसे दोषवाले मनुष्य को राजा कभी न करना। यदि भूल से हुआ हो तो उस को राज्य से च्युत करके किसी योग्य पुरुष को, जो कि राजा के कुल का हो, राज्याधिकारी करना, तभी प्रजा में आनन्द-मङ्गल सदा बढ़ता रहेगा॥37॥



सैन्यापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च।



सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति॥38॥



मौलान् शास्त्रविदः शूरान् लब्धलक्षान् कुलोद्गतान्।



सचिवान् सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान्॥39॥



अन्यानपि प्रकुर्वीत शुचीन् प्राज्ञानवस्थितान्।



सम्यगर्थसमाहर्तॄन् अमात्यान् सुपरीक्षितान्॥40॥



अर्थ—जो वेदशास्त्रवित् धर्मात्मा, जितेन्द्रिय, न्यायकारी और आत्मा के बल से युक्त पुरुष होवे, उसी को सेना, राज्य, दण्डनीति और प्रधान पद का अधिकार देना, अन्य क्षुद्राशयों को नहीं॥38॥



और जो अपने राज्य में उत्पन्न, शास्त्रों के जाननेहारे शूरवीर, जिन का विचार निष्फल न होवे, कुलीन धर्मात्मा स्वराज्यभक्त हों, उन 7 सात वा 8 आठ पुरुषों को अच्छी प्रकार परीक्षा करके मन्त्री करे और इन्हीं की सभा में आठवाँ वा नववाँ राजा हो। ये सब मिलके कर्त्तव्याकर्त्तव्य कामों का विचार किया करें॥39॥



इसी प्रकार अन्य भी राज्य और सेना के अधिकारी, जितने पुरुषों से राज्यकार्य सिद्ध हो सके, उतने ही पवित्र धार्मिक विद्वान् चतुर स्थिरबुद्धि पुरुषों को राज्य-सामग्री के वर्धक नियत करे॥40॥



दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम्।



इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम्॥41॥



अलब्धमिच्छेद् दण्डेन लब्धं रक्षेदवेक्षया।



रक्षितं वर्धयेद् वृद्ध्या वृद्धं पात्रेषु निःक्षिपेत्॥42॥—मनु॰॥



अर्थ—जो सब शास्त्र में निपुण, नेत्रादि के सङ्केत, स्वरूप तथा चेष्टा से दूसरे के हृदय की बात को जाननेहारा, शुद्ध, बड़ा स्मृतिमान्, देशकाल को जाननेहारा, सुन्दर जिस का स्वरूप, बड़ा वक्ता और अपने कुल में मुख्य हो, उस और स्वराज्य और पर-राज्य के समाचार देनेहारे अन्य दूतों को भी नियत करे॥41॥



तथा राजादि राजपुरुष अलब्ध राज्य की प्राप्ति की इच्छा दण्ड से, और प्राप्त राज्य की रक्षा संभाल से, रक्षित राज्य और धन को व्यापार और ब्याज से बढ़ा, और सुपात्रों के द्वारा सत्य विद्या और सत्य धर्म के प्रचार आदि उत्तम व्यवहारों में बढ़े हुए धन आदि पदार्थों का व्यय करके सब की उन्नति सदा किया करें॥42॥



विधि— सदा स्त्रीपुरुष 10 दश बजे शयन और रात्रि के पिछले प्रहर वा 4 बजे उठके प्रथम हृदय में परमेश्वर का चिन्तन करके धर्म और अर्थ का विचार किया करें और धर्म और अर्थ के अनुष्ठान वा उद्योग करने में यदि कभी पीड़ा भी हो तथापि धर्मयुक्त पुरुषार्थ को कभी न छोड़ें, किन्तु सदा शरीर और आत्मा की रक्षा के लिए युक्त आहार-विहार, औषधसेवन, सुपथ्य आदि से निरन्तर उद्योग करके व्यावहारिक और पारमार्थिक कर्त्तव्य कर्म की सिद्धि के लिए ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना भी किया करें कि जिस से परमेश्वर की कृपादृष्टि और सहाय से महाकठिन कार्य भी सुगमता से सिद्ध हो सकें।



इस के लिए निम्नलिखित मन्त्र हैं—







प्रा॒तर॑ग्निं प्रा॒तरिन्द्रं॑ हवामहे प्रा॒तर्मि॒त्रावरु॑णा प्रा॒तर॑श्विना॑।



प्रा॒तर्भगं॑ पू॒षणं॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॑ प्रा॒तः सोम॑मु॒त रु॒द्रं हु॑वेम॥1॥[2]



प्रा॒त॑र्जितं॒ भग॑मु॒ग्रं हु॑वेम व॒यं पु॒त्रमदि॑ते॒र्यो वि॑ध॒र्ता।



आ॒ध्रश्चि॒द्यं मन्य॑मानस्तु॒रश्चि॒द्राजा॑ चि॒द्यं भगं॑ भ॒क्षीत्याह॑॥2॥[3]



भग॒ प्रणे॑त॒र्भग॒ सत्य॑राधो॒ भगे॒मां धिय॒मुद॑वा॒ दद॑न्नः।



भग॒ प्र णो॑ जनय॒ गोभि॒रश्वै॒र्भग॒ प्र नृभि॑र्नृ॒वन्तः॑ स्याम॥3॥[4]



उ॒तेदानीं॒ भग॑वन्तः स्यामो॒त प्र॑पि॒त्व उ॒त मध्ये॒ अह्ना॑म्।



उ॒तोदि॑ता मघव॒न्त्सूर्य॑स्य व॒यं दे॒वानां॑ सुम॒तौ स्या॑म॥4॥[5]



भग॑ ए॒व भग॑वाँ अस्तु देवा॒स्तेन॑ व॒यं भग॑वन्तः स्याम।



तं त्वा॑ भग॒ सर्व॒ इज्जो॑हवीति॒ स नो॑ भग पुरए॒ता भ॑वे॒ह॥5॥[6]ऋ॰ मं॰ 7। सू॰ 41॥



इस प्रकार परमेश्वर की प्रार्थना उपासना करनी॥



तत्पश्चात् शौच, दन्तधावन, मुखप्रक्षालन करके स्नान करें। पश्चात् एक कोश वा डेढ़ कोश एकान्त जंगल में जाके योगाभ्यास की रीति से परमेश्वर की उपासना कर, सूर्योदय-पर्यन्त अथवा घड़ी, आध घड़ी दिन चढ़े तक घर में आके, सन्ध्योपासनादि नित्यकर्म नीचे लिखे प्रमाणे यथाविधि उचित समय में किया करें। इन नित्य करने के योग्य कर्मों में लिखे हुए मन्त्रों का अर्थ और प्रमाणपञ्चमहायज्ञविधिमें देख लेवें। प्रथम शरीरशुद्धि, अर्थात् स्नान-पर्यन्त कर्म करके सन्ध्योपासन का आरम्भ करें।



आरम्भ में दक्षिण हस्त में जल लेके-



ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा॥1॥



ओम् अमृतापिधानमसि स्वाहा॥2॥



ओं सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा॥3॥



इन 3 तीन मन्त्रों में से एक-एक से एक-एक आचमन कर, दोनों हाथ धो, कान, आँख, नासिका आदि का शुद्ध जल से स्पर्श करके, शुद्ध देश, पवित्रासन पर, जिधर की ओर का वायु हो, उधर को मुख करके, नाभि के नीचे से मूलेन्द्रिय को ऊपर संकोच करके हृदय के वायु को बल से बाहर निकालके यथाशक्ति रोके। पश्चात् धीरे-धीरे भीतर लेके भीतर थोड़ा सा रोके। यह एक प्राणायाम हुआ। इसी प्रकार कम से कम तीन प्राणायाम करे। नासिका को हाथ से न पकड़े। इस समय परमेश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना हृदय में करके-



ओं शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये। शंयोरभि स्रवन्तु नः॥—यजुः अ॰ 36।



इस मन्त्र को एक वार पढ़के तीन आचमन करे। पश्चात् पात्र में से मध्यमा अनामिका अंगुलियों से जलस्पर्श करके प्रथम दक्षिण और पश्चात् वाम अंगों का निम्नलिखित मन्त्रों से स्पर्श करे-



ओं वाक् वाक्॥—इस मन्त्र से मुख का दक्षिण और वाम पार्श्व।



ओं प्राणः प्राणः॥—इस से दक्षिण और वाम नासिका के छिद्र।



ओं चक्षुश्चक्षुः॥—इस से दक्षिण और वाम नेत्र



ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्॥—इस से दक्षिण और वाम श्रोत्र।



ओं नाभिः॥—इस से नाभि।



ओं हृदयम्॥—इस से हृदय।



ओं कण्ठः॥—इस से कण्ठ।



ओं शिरः॥—इस से मस्तक।



ओं बाहुभ्यां यशोबलम्॥— इस से दोनों भुजाओं के मूल स्कन्ध, और—



ओं करतलकरपृष्ठे॥—इस से दोनों हाथों के ऊपर-तले स्पर्श करके, मार्जन करे—



ओं भूः पुनातु शिरसि॥—इस मन्त्र से शिर पर।



ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः॥—इस मन्त्र से दोनों नेत्रों पर।



ओं स्वः पुनातु कण्ठे॥—इस मन्त्र से कण्ठ पर।



ओं महः पुनातु हृदये॥—इस मन्त्र से हृदय पर।



ओं जनः पुनातु नाभ्याम्॥—इस से नाभि पर।



ओं तपः पुनातु पादयोः॥—इस से दोनों पगों पर।



ओं सत्यं पुनातु पुनः शिरसि॥—इस से पुनः मस्तक पर।



ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र॥—इस मन्त्र से सब अंगों पर छींटा देवे।



पुनः पूर्वोक्त रीति से प्राणायाम की क्रिया करता जावे, और नीचे लिखे मन्त्र का जप भी करता जाय—



ओं भूः। ओं भुवः। ओं स्वः। ओं महः। ओं जनः। ओं तपः। ओं सत्यम्॥



इसी रीति से कम से कम 3 तीन और अधिक से अधिक 21 इक्कीस प्राणायाम करे।



तत्पश्चात् सृष्टिकर्त्ता परमात्मा और सृष्टिक्रम का विचार नीचे लिखित मन्त्रों से करे और जगदीश्वर को सर्वव्यापक न्यायकारी सर्वत्र सर्वदा सब जीवों के कर्मों के द्रष्टा को निश्चित मानके पाप की ओर अपने आत्मा और मन को कभी न जाने देवे, किन्तु सदा धर्मयुक्त कर्मों में वर्तमान रक्खे—



ओम् ऋ॒तञ्च॑ स॒त्यञ्चा॒भी॑द्धात्तप॒सोऽध्य॑जायत।



ततो॒ रात्र्य॑जायत॒ ततः॑ समु॒द्रो अ॑र्ण॒वः॥1॥



स॒मु॒द्राद॑र्ण॒वादधि॑ संवत्स॒रो अ॑जायत।



अ॒हो॒रा॒त्राणि॑ वि॒दध॒द्विश्व॑स्य मिष॒तो व॒शी॥2॥



सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसौ॑ धा॒ता य॑थापू॒र्वम॑कल्पयत्।



दिवं॑ च पृथि॒वीञ्चा॒न्तरि॑क्ष॒मथो॒ स्वः॑॥3॥ऋ॰ मं॰ 10। सू॰ 190॥



इन मन्त्रों को पढ़के पुनः (शन्नो देवी॰) इस मन्त्र से 3 तीन आचमन करके निम्नलिखित मन्त्रों से सर्वव्यापक परमात्मा की स्तुति-प्रार्थना करे—



ओं प्राची॒ दिग॒ग्निरधि॑पतिरसि॒तो र॑क्षि॒तादि॒त्या इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥1॥



दक्षि॑णा॒ दिगिन्द्रोऽधि॑पति॒स्तिर॑श्चिराजी रक्षि॒ता पि॒तर॑ इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥2॥



प्र॒तीची॒ दिग्वरु॒णोऽधि॑पतिः॒ पृदा॑कू रक्षि॒तान्न॒मिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥3॥



उदी॑ची॒ दिक् सोमोऽधि॑पतिः स्व॒जो र॑क्षि॒ताशनि॒रिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥4॥



ध्रु॒वा दिग्विष्णु॒रधि॑पतिः क॒ल्माष॑ग्रीवो रक्षि॒ता वी॒रुध॒ इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒३॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥5॥



ऊ॒र्ध्वा दिग्बृह॒स्पति॒रधि॑पतिः श्वि॒त्रो र॑क्षि॒ता व॒र्षमिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒3॒॑स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥6॥



अथर्व॰ का॰ 3। सू॰ 27। मं॰ 1-6॥



इन मन्त्रों को पढ़ते जाना, और अपने मन से चारों ओर बाहर भीतर परमात्मा को पूर्ण जान कर निर्भय निश्शट उत्साही आनन्दित पुरुषार्थी रहना।



तत्पश्चात् परमात्मा का उपस्थान, अर्थात् परमेश्वर के निकट मैं और मेरे अतिनिकट परमात्मा है ऐसी बुद्धि करके करे—



जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑मरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेदः॑ ।



स नः॑ पर्ष॒दति॑ दु॒र्गाणि॒ विश्वा॑ ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तात्य॒ग्निः॥1॥



ऋ॰ मं॰ 1। सू॰ 99। मं॰ 1॥



चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑वं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः। आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॒न्तरि॑क्ष॒॑ सूर्य॑ऽआ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च॥3॥यजुः अ॰ 13। मं॰ 46॥



उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑। दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म्॥2॥—यजुः अ॰ 33। मन्त्र 31॥



उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ स्वः पश्य॑न्त॒ऽ उत्त॑रम्। दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम्॥1॥



यजुः अ॰ 35। मन्त्र 14॥



तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत्। पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तं जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तं शृणु॑याम श॒रदः॑ श॒तं प्रब्र॑वाम श॒रदः॑ श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रदः॑ श॒तम्भूय॑श्च श॒रदः॑ श॒तात्॥4॥यजुः अ॰ 36। मं॰ 24॥



इन मन्त्रों से परमात्मा का उपस्थान करके, पुनः (शन्नो देवी॰) इस से 3 तीन आचमन करके, पृष्ठ 72-73 में लिखे प्रमाणे, अथवा पञ्चमहायज्ञविधि में लिखे प्रमाणेगायत्रीमन्त्रका अर्थ-विचारपूर्वक परमात्मा की स्तुतिप्रार्थनोपासना करे। पुनः—



"हे परमेश्वर दयानिधे ! आपकी कृपा से जपोपासनादि कर्मों को करके हम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि को शीघ्र प्राप्त होवें।"पुनः—



ओं नमः॑ शम्भ॒वाय॑ च मयोभ॒वाय॑ च॒ नमः॑ शङ्क॒राय॑ च



मयस्क॒राय॑ च॒ नमः॑ शि॒वाय॑ च शि॒वत॑राय च॥यजुः अ॰ 16। मं॰ 41॥



इस से परमात्मा को नमस्कार करके, (शन्नो देवी॰) इस मन्त्र से 3 तीन आचमन करके अग्निहोत्र का आरम्भ करे॥



॥इति संक्षेपतः सन्ध्योपासनविधिः समाप्तः॥1॥



अथाग्निहोत्रम्



जैसे सायं प्रातः दोनों सन्धिवेलाओं में सन्ध्योपासन करें, इसी प्रकार दोनों स्त्री-पुरुष[7]अग्निहोत्र भी दोनों समय में नित्य किया करें।



पृष्ठ 19 में लिखे प्रमाणेअग्न्याधान समिदाधान, और पृष्ठ 20 मंय लिखे प्रमाणे (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि 4 चार मन्त्रों से यथाविधि कुण्ड के चारों ओर जल-प्रोक्षण करके, शुद्ध किये हुए सुगन्ध्यादियुक्त घी को तपाके पात्र में लेके, कुण्ड से पश्चिम भाग में पूर्वाभिमुख बैठके पृष्ठ 31 में लिखे प्रमाणेआघारावाज्यभागाहुति4 चार देके, नीचे लिखे हुए मन्त्रों से प्रातःकाल अग्निहोत्र करे—



ओं सूर्यो॒ ज्योति॒र्ज्योतिः॒ सूर्यः॒ स्वाहा॑॥1॥



ओं सूर्यो॒ वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्चः॒ स्वाहा॑॥2॥



ओं ज्योतिः॒ सूर्यः॒ सूर्यो॒ ज्योतिः॒ स्वाहा॑॥3॥



ओं स॒जूर्दे॑वेन॑ सवि॒त्रा स॒जूरु॒षसेन्द्र॑वत्या। जु॒षा॒णः सूर्यो॑ वेतु॒ स्वाहा॑॥4॥



अब नीचे लिखे हुए मन्त्र सायंकाल में अग्निहोत्र के जानो—



ओम् अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑र॒ग्निः स्वाहा॑॥1॥



ओम् अ॒ग्निर्वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्च॒ स्वाहा॑॥2॥



ओम् अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑र॒ग्निः स्वाहा॑॥3॥



इस मन्त्र को मन से उच्चारण करके तीसरी आहुति देनी।



ओं सजूर्देवेन सवित्रा सजू रात्र्येन्द्रवत्या। जुषाणोऽअग्निर्वेतु स्वाहा॥4॥



अब निम्नलिखित मन्त्रों से प्रातःसायं आहुति देनी चाहिए।



ओं भूरग्नये प्राणाय स्वाहा॥ इदमग्नये प्राणाय इदं न मम॥1॥



ओं भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा॥ इदं वायवेऽपानाय इदं न मम॥2॥



ओं स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा॥ इदमादित्याय व्यानाय इदं न मम॥3॥



ओं भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा॥



इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः इदं न मम॥4॥



ओम् आपो ज्योतीरसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरों स्वाहा॥5॥



ओं यां मे॒धां दे॑वग॒णाः पि॒तर॑श्चो॒पास॑ते।



तया॒ माम॒द्य मे॒धयाग्ने॑ मे॒धावि॑नं कुरु॒ स्वाहा॑॥6॥यजुः अ॰ 32। मं॰ 14॥



ओं विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव। यद् भ॒द्रन्तन्न॒ऽ आ सु॑व॒ स्वाहा॑॥7॥यजुः॰ अ॰ 30। मं॰ 3॥



ओम् अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान् विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान्।



यु॒यो॒ध्यस्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठान्ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम॒ स्वाहा॑॥8॥यजुः अ॰ 40। मं॰ 16॥



इन 8 आठ मन्त्रों से एक-एक मन्त्र करके एक-एक आहुति देनी, ऐसे 8 आठ आहुति देके—



ओं सर्वं वै पूर्णं स्वाहा॥



इस मन्त्र से 3 तीन पूर्णाहुति अर्थात् एक-एक वार पढ़के एक-एक करके 3 तीन आहुति देवे॥



॥ इत्यग्निहोत्रविधिः संक्षेपतः समाप्तः॥2॥





अथ पितृयज्ञः



अग्निहोत्रविधि पूर्ण करके तीसरा पितृयज्ञ करे, अर्थात् जीते हुए माता-पिता आदि की यथावत् सेवा करनी ‘पितृयज्ञ’ कहाता है॥3॥





अथ बलिवैश्वदेवविधिः



ओम् अग्नये स्वाहा॥1॥



ओं सोमाय स्वाहा॥2॥



ओम् अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा॥3॥



ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा॥4॥



ओं धन्वन्तरये स्वाहा॥5॥



ओं कुह्वै स्वाहा॥6॥



ओम् अनुमत्यै स्वाहा॥7॥



ओं प्रजापतये स्वाहा॥8॥



ओं द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा॥9॥



ओं स्विष्टकृते स्वाहा॥10॥



इन 10 दश मन्त्रों से घृतमिश्रित भात की, यदि भात न बना हो तो क्षार और लवणान्न को छोड़के जो कुछ पाक में बना हो, उसी की 10 दश आहुति करे।



तत्पश्चात् निम्नलिखित मन्त्रों से बलि दान करे—



ओं सानुगायेन्द्राय नमः॥1॥—इस से पूर्व।



ओं सानुगाय यमाय नमः॥2॥—इस से दक्षिण।



ओं सानुगाय वरुणाय नमः॥3॥—इस से पश्चिम।



ओं सानुगाय सोमाय नमः॥4॥—इस से उत्तर।



ओं मरुद्भ्यो नमः॥5॥— इस से द्वार।



ओं अद्भ्यो नमः॥6॥—इस से जल।



ओं वनस्पतिभ्यो नमः॥7॥— इस से मूसल और ऊखल।



ओं श्रियै नमः॥8॥— इस से ईशान।



ओं भद्रकाल्यै नमः॥9॥— इस से नैऋर्त्य।



ओं ब्रह्मपतये नमः॥10॥



ओं वास्तुपतये नमः॥11॥—इन से मध्य।



ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः॥12॥



ओं दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः॥13॥



ओं नक्तंचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः॥4॥—इन से ऊपर।



ओं सर्वात्मभूतये नमः॥15॥— इस से पृष्ठ।



ओं पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः॥16॥—इस से दक्षिण।



इन मन्त्रों से एक पत्तल वा थाली में यथोक्त दिशाओं में भाग धरना। यदि भाग धरने के समय कोई अतिथि आ जाए तो उसी को दे देना, नहीं तो अग्नि में धर देना। तत्पश्चात् घृतसहित लवणान्न लेके—



शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम्।



वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद् भुवि॥



अर्थ—कुत्ता, पतित, चाण्डाल, पापरोगी, काक और कृमि—इन 6 छह नामों से 6 छह भाग पृथिवी में धरे और वे 6 छह भाग जिस- जिस के नाम हैं, उस-उस को देना चाहिए॥4॥





अथातिथियज्ञः



पांचवाँ—जो धार्मिक, परोपकारी, सत्योपदेशक, पक्षपात रहित शान्त, सर्वहितकारक विद्वानों की अन्नादि से सेवा, उन से प्रश्नोत्तर आदि करके विद्या प्राप्त होना ‘अतिथियज्ञ’ कहाता है, उस को नित्य किया करें। इस प्रकार पञ्चमहायज्ञों को स्त्री-पुरुष प्रतिदिन करते रहें॥5॥



इस के पश्चात्पक्षयज्ञअर्थात्पौर्णमासीऔरअमावस्याके दिन नैत्यिक अग्निहोत्र की आहुति दिये पश्चात् पूर्वोक्त प्रकार पृष्ठ 13 में लिखे प्रमाणे स्थालीपाक बनाके निम्नलिखित मन्त्रों से विशेष आहुति करें—



ओम् अग्नये स्वाहा॥1॥



ओम् अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा॥2॥



ओं विष्णवे स्वाहा॥3॥



इन 3 तीन मन्त्रों से स्थालीपाक की 3 तीन आहुति देनी।



तत्पश्चात् पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणेव्याहृतिआज्याहुति 4 चार देनी, परन्तु इस में इतना भेद है कि अमावास्या के दिन—



ओम् अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा॥इस मन्त्र के बदले—



ओम् इन्द्राग्नीभ्यां स्वाहा॥



इस मन्त्र को बोलके स्थालीपाक की आहुति देवे।



इस प्रकार पक्षयाग अर्थात् जिस के घर में अभाग्य से अग्निहोत्र न होता हो तो सर्वत्र पक्षयागादि में पृष्ठ 12-14 में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड, यज्ञसामग्री, यज्ञमण्डप; पृष्ठ 18-19 में लिखे प्रमाणेअग्न्याधान, समिदाधान; पृष्ठ 20-21 में लिखे प्रमाणेआघारावाज्यभागाहुति; और पृष्ठ 20 में लिखे प्रमाणे वेदी के चारों ओर जलसेचन करके, पृष्ठ 4-11 में लिखे प्रमाणेईश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरणभी यथायोग्य करें।



और जब-जब नवान्न आवे, तब-तबनवशस्येष्टिऔर संवत्सर के आरम्भ में निम्नलिखित विधि करें, अर्थात् जब-जब नवीन अन्न आवे, तब-तब शस्येष्टि करके नवीन अन्न के भोजन का आरम्भ करे।



नवशस्येष्टिऔरसंवत्सरेष्टिकरना हो तो जिस दिन प्रसन्नता हो वही शुभ दिन जाने। ग्राम और शहर के बाहर किसी शुद्ध खेत में यज्ञमण्डप करके पृष्ठ 4-24 तक लिखे प्रमाणे सब विधि करके प्रथमआघारावाज्यभागाहुति4 चार औरव्याहृतिआहुति 4 चार तथाअष्टाज्याहुति8 आठ, ये 16 सोलह आज्याहुति करके, कार्यकर्त्ता—



ओं पृथिवी द्यौः प्रदिशो दिशो यस्मै द्युभिरावृताः।



तमिहेन्द्रमुपह्वये शिवा नः सन्तु हेतयः स्वाहा॥1॥



ओं यन्मे किञ्चिदुपेप्सितमस्मिन् कर्मणि वृत्रहन्।



तन्मे सर्वं समृध्यतां जीवतः शरदः शतं स्वाहा॥2॥



ओं सम्पत्तिर्भूतिर्भूमिर्वृष्टिर्ज्यैष्ठ्यं श्रैष्ठ्यं श्रीः प्रजामिहावतु स्वाहा॥ इदमिन्द्राय इदन्न मम॥3॥



ओं यस्याभावे वैदिकलौकिकानां भूतिर्भवति कर्मणाम्। इन्द्रपत्नीमुपह्वये सीतां सा मे त्वनपायिनी भूयात् कर्मणि कर्मणि स्वाहा॥ इदमिन्द्रपत्न्यै इदन्न मम॥4॥



ओम् अश्वावती गोमती सूनृतावती बिभर्त्ति या प्राणभृतो अतन्द्रिता। खलमालिनीमुर्वरामस्मिन् कर्मण्युपह्वये ध्रुवांसा मे त्वनपायिनी भूयात् स्वाहा॥ इदं सीतायै इदन्न मम॥5॥



इन मन्त्रों से प्रधान होम की 5 पांच आज्याहुति करके—



ओं सीतायै स्वाहा॥1॥



ओं प्रजायै स्वाहा॥2॥



ओं शमायै स्वाहा॥3॥



ओं भूत्यै स्वाहा॥4॥



इन चार मन्त्रों से चार और पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणे (यदस्य॰) मन्त्र से स्विष्टकृत् होमाहुति 1 एक, ऐसे 5 पांच स्थालीपाक की आहुति देके, पश्चात् पृष्ठ 22-23 में लिखे प्रमाणेअष्टाज्याहुति, पृष्ठ 21 में लिखे प्रमाणेव्याहृतिआहुति 4 चार, ऐसे 12 बारहआज्याहुतिदेके, पृष्ठ 23-24, 4-11 में लिखे प्रमाणेवामदेव्यगान, ईश्वरोपासना, स्वस्तिवाचनऔरशान्तिकरणकरके यज्ञ की समाप्ति करें॥





अथ शालाकर्मविधिं वक्ष्यामः



‘शाला’ उस को कहते हैं—जो मनुष्य और पश्वादि के रहने अथवा पदार्थ रखने के अर्थ गृह वा स्थानविशेष बनाते हैं। इस के दो विषय हैं-एक प्रमाण और दूसरा विधि। उस में से प्रथम प्रमाण और पश्चात् विधि लिखेंगे।



अत्र प्रमाणानि—



उ॒प॒मितां॑ प्रति॒मिता॒मथो॑ परि॒मिता॑म् उ॒त। शाला॑या वि॒श्ववा॑राया न॒द्धानि॒ वि चृ॑तामसि॥1॥



ह॒वि॒र्धान॑मग्नि॒शालं॒ पत्नी॑नां॒ सद॑नं॒ सदः॑। सदो॑ दे॒वाना॑मसि देवि शाले॥2॥



अर्थ—मनुष्यों को योग्य है कि जो कोई किसी प्रकार का घर बनावें तो वह (उपमिताम्) सब प्रकार की उत्तम उपमायुक्त कि जिस को देखके विद्वान् लोग सराहना करें। (प्रतिमिताम्) प्रतिमान अर्थात् एक द्वार के सामने दूसरा द्वार कोणे और कक्षा भी सम्मुख हों। (अथो) इस के अनन्तर (परिमिताम्) वह शाला चारों ओर की परिमाण से समचौरस हो। (उत) और (शालायाः) शाला (विश्ववारायाः) अर्थात् उस घर के द्वार चारों ओर के वायु को स्वीकार करनेवाले हों। (नद्धानि) उस के बन्धन और चिनाई दृढ़ हों। हे मनुष्यो ! ऐसी शाला को जैसे हम शिल्पी लोग (विचृतामसि) अच्छे प्रकार ग्रन्थित अर्थात् बन्धनयुक्त करते हैं, वैसे तुम भी करो॥1॥



उस घर में एक (हविर्धानम्) होम करने के पदार्थ रखने का स्थान, (अग्निशालम्) अग्निहोत्र का स्थान, (पत्नीनाम्) स्त्रियों के (सदनम्) रहने का (सदः) स्थान, और (देवानाम्) पुरुषों और विद्वानों के रहने-बैठने, मेल-मिलाप करने और सभा का (सदः) स्थान तथा स्नान, भोजन, ध्यान आदि का भी पृथक्-पृथक् एक-एक घर बनावे। इस प्रकार की (देवि) दिव्य कमनीय (शाले) बनाई हुई शाला (असि) सुखदायक होती है॥2॥



अ॒न्त॒रा द्यां च॑ पृथि॒वीं च यद्व्यच॒स्तेन॒ शालां॒ प्रति॑ गृह्णामि त इ॒माम्।



यद॒न्तरि॑क्षं॒ रज॑सो वि॒मानं॒ तत् कृ॑ण्वे॒ऽहमु॒दरं॑ शेव॒धिभ्यः॑। तेन॒ शालां॒ प्रति॑ गृह्णामि॒ तस्मै॑॥3॥



ऊर्ज॑स्वती॒ पय॑स्वती पृथि॒व्यां निमि॑ता मि॒ता।



वि॒श्वा॒न्नं बिभ्र॑ती शाले॒ मा हिं॑सीः प्रतिगृह्ण॒तः॥4॥



अर्थः—उस शाला में (अन्तरा) भिन्न-भिन्न (पृथिवीम्) शुद्ध भूमि अर्थात् चारों ओर स्थान शुद्ध हों। (च) और (द्याम्) जिस में सूर्य का प्रतिभास आवे, वैसी प्रकाशस्वरूप भूमि के समान दृढ़ शाला बनावे। (च) और (यत्) जो (व्यचः) उस की व्याप्ति अर्थात् विस्तार हे स्त्रि ! (ते) तेरे लिये है, (तेन) उसी से युक्त (इमाम्) इस (शालाम्) घर को बनाता हूं, तू इस में निवास कर, और मैं भी निवास के लिये इस को (प्रतिगृह्णामि) ग्रहण करता हूं। (यत्) जो उस के बीच में (अन्तरिक्षम्) पुष्कल अवकाश और (रजसः) उस घर का (विमानम्) विशेष मान-परिमाणयुक्त लम्बी ऊंची छत, और (उदरम्) भीतर का प्रसार विस्तारयुक्त होवे, (तत्) उस को (शेवधिभ्यः) सुख के आधाररूप अनेक कक्षाओं से सुशोभित (अहम्) मैं (कृण्वे) करता हूं। (तेन) उस पूर्वोक्त लक्षणमात्र से युक्त (शालाम्) शाला को (तस्मै) उस गृहाश्रम के सब व्यवहारों के लिये (प्रतिगृह्णामि) ग्रहण करता हूं॥3॥



जो (शाले) शाला (ऊर्जस्वती) बहुत बलारोग्य पराक्रम को बढ़ानेवाली, और धन-धान्य से पूरित सम्बन्धवाली, (पयस्वती) जल दूध रसादि से परिपूर्ण, (पृथिव्याम्) पृथिवी में (मिता) परिमाणयुक्त (निमिता) निर्मित की हुई (विश्वान्नम्) सम्पूर्ण अन्नादि ऐश्वर्य को (बिभ्रती) धारण करती हुई (प्रतिगृह्णतः) ग्रहण करनेहारों को रोगादि से (मा हिंसीः) पीड़ित न करे, वैसा घर बनाना चाहिये॥4॥



ब्रह्म॑णा॒ शालां॒ निमि॑तां क॒विभि॒र्निमि॑तां मि॒ताम्।



इ॒न्द्रा॒ग्नी र॑क्षतां॒ शाला॑म॒मृतौ॑ सो॒म्यं सदः॑॥5॥



अर्थः—(अमृतौ) स्वरूप से नाशरहित (इन्द्राग्नी) वायु और पावक, (कविभिः) उत्तम विद्वान् शिल्पियों ने (मिताम्) प्रमाणयुक्त अर्थात् माप में ठीक जैसी चाहिये वैसी (निमिताम्) बनाई हुई (शालाम्) शाला को, और (ब्रह्मणा) चारों वेदों के जाननेहारे विद्वान् ने सब ऋतुओं में सुख देनेहारी (निमिताम्) बनाई (शालाम्) शाला को प्राप्त होकर रहनेवालों को (रक्षताम्) रक्षा करें। अर्थात् चारों ओर का शुद्ध वायु आके अशुद्ध वायु को निकालता रहे, और जिसमें सुगन्ध्यादि घृत का होम किया जाय, वह अग्नि दुर्गन्ध को निकाल सुगन्ध को स्थापन करे। वह (सोम्यम्) ऐश्वर्य आरोग्य सर्वदा सुखदायक (सदः) रहने के लिये उत्तम घर है। उसी को निवास के लिये ग्रहण करे॥5॥



या द्विप॑क्षा॒ चतुष्पक्षा॒ षट्प॑क्षा॒ या नि॑मी॒यते॑।



अ॒ष्टाप॑क्षां॒ दश॑पक्षां॒ शालां॒ मान॑स्य॒ पत्नी॑म॒ग्निर्गर्भ॑ इ॒वाश॑ये॥6॥



अर्थ—हे मनुष्यो ! (या) जो (द्विपक्षा) दो पक्ष अर्थात् मध्य में एक और पूर्व पश्चिम में एक-एक शालायुक्त घर, अथवा (चतुष्पक्षा) जिस के पूर्व पश्चिम दक्षिण और उत्तर में एक-एक शाला, और इन के मध्य में पांचवीं बड़ी शाला, वा (षट्पक्षा) एक बीच में बड़ी शाला और दो-दो पूर्व-पश्चिम तथा एक-एक उत्तर-दक्षिण में शाला हों, या) जो ऐसी शाला (निमीयते) बनाई जाती है, वह उत्तम होती है। और इस से भी जो (अष्टापक्षाम्) चारों ओर दो-दो शाला और उन के बीच में एक नवमी शाला हो, अथवा (दशपक्षाम्) जिस के मध्य में दो शाला और उन के चारों दिशाओं में दो-दो शाला हों, उस (मानस्य) परिमाण के योग से बनाई हुई (शालाम्) शाला को जैसे (पत्नीम्) पत्नी को प्राप्त होके (अग्निः) अग्निमय आर्त्तव और वीर्य (गर्भ इव) गर्भरूप होके (आशये) गर्भाशय में ठहरता है, वैसे सब शालाओं के द्वार दो-दो हाथ पर सूधे बराबर हों॥



और जिस की चारों ओर की शालाओं का परिमाण तीन-तीन गज और मध्य की शालाओं का छह-छह गज से परिमाण न्यून न हो और चार-चार गज चारों दिशाओं की, और आठ-आठ गज मध्य की शालाओं का परिमाण हो, अथवा मध्य की शालाओं का दश-दश गज अर्थात् बीस-बीस हाथ से विस्तार अधिक न हो, बनाकर गृहस्थों को रहना चाहिए। यदि वह सभा का स्थान हो, तो बाहर की ओर द्वारों में चारों ओर कपाट और मध्य में गोल-गोल स्तम्भे बनाकर चारों ओर खुला बनाना चाहिए कि जिस के कपाट खोलने से चारों ओर का वायु उस में आवे। और सब घरों के चारों ओर वायु आने के लिए अवकाश तथा वृक्ष फल और पुष्करणी कुण्ड भी होने चाहियें, वैसे घरों में सब लोग रहें॥6॥



प्र॒तीचीं॑ त्वा प्रती॒चीनः॒ शाले॒ प्रैम्यहिंस॑तीम्।



अ॒ग्निर्ह्य१॒॑न्तराप॑श्च ऋ॒तस्य॑ प्रथ॒मा द्वाः॥7॥



अर्थः—जो (शाले) शालागृह (प्रतीचीनः) पूर्वाभिमुख तथा जो गृह (प्रतीचीम्) पश्चिम द्वारयुक्त, (अहिंसतीम्) हिंसादि दोष रहित, अर्थात् पश्चिम द्वार के सम्मुख पूर्व द्वार, जिस में (हि) निश्चय कर (अन्तः) बीच में (अग्निः) अग्नि का घर (च) और (आपः) जल का स्थान (ऋतस्य) और सत्य के ध्यान के लिये एक स्थान (प्रथमा) प्रथम (द्वाः) द्वार है, मैं (त्वा) उस शाला को (प्रैमि) प्रकर्षता से प्राप्त होता हूं॥7॥





मा नः॒ पाशं॒ प्रति॑ मुचो गु॒रुर्भा॒रो ल॒घुर्भ॑व।



व॒धूमि॑व त्वा शाले यत्र॒ कामं॑ भरामसि॥8॥अथर्व॰ कां॰ 9। अ॰ 2। वर्ग 3॥



अर्थः—हे शिल्पि लोगो! जैसे (नः) हमारी (शाले) शाला अर्थात् गृह (पाशम्) बन्धन को (मा प्रतिमुचः) कभी न छोड़े, जिस में (गुरुर्भारः) बड़ा भार (लघुर्भव) छोटा होवे, वैसी बनाओ। (त्वा) उस शाला को (यत्र कामम्) जहां जैसी कामना हो वहां वैसी हम लोग (वधूमिव) स्त्री के समान (भरामसि) स्वीकार करते हैं, वैसे तुम भी ग्रहण करो॥8॥



इस प्रकार प्रमाणों के अनुसार जब घर बन चुके, तब प्रवेश करते समय क्या-क्या विधि करना, सो नीचे लिखे प्रमाणे जानो—



अथ विधिः— जब घर बन चुके, तब उस की शुद्धि अच्छे प्रकार करा, चारों दिशाओं के बाहरले द्वारों में 4 चार वेदी, और एक वेदी घर के मध्य बनावे, अथवा तांबे का वेदी के समान कुण्ड बनवा लेवे कि जिस से सब ठिकाने एक कुण्ड ही में काम हो जावे सब प्रकार की सामग्री अर्थात् पृष्ठ 13-14 में लिखे प्रमाणे समिधा, घृत, चावल, मिष्ट, सुगन्ध, पुष्टिकारक द्रव्यों को लेके शोधन कर प्रथम दिन रख लेवे। जिस दिन गृहपति का चित्त प्रसन्न होवे, उसी शुभ दिन में गृहप्रतिष्ठा करे।



वहां ऋत्विज् होता अध्वर्यु और ब्रह्मा का वरण करे, जो कि धर्मात्मा विद्वान् हों। वे सब वेदी से पश्चिम दिशा में बैठें। उन में से होता का आसन और उस पर वह पूर्वाभिमुख, अध्वर्यु का उत्तर में उस पर दक्षिणाभिमुख, उद्गाता का पूर्व दिशा में आसन उस पर वह पश्चिमाभिमुख और ब्रह्मा का दक्षिण दिशा में उत्तमासन बिछा कर उत्तराभिमुख। इस प्रकार चारों आसनों पर चारों पुरुषों को बैठावे, और गृहपति सर्वत्र पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठा करे। ऐसे ही घर के मध्य वेदी के चारों ओर दूसरे आसन बिछा रक्खे।



पश्चात् निष्क्रम्यद्वार, जिस द्वार से मुख्य करके घर से निकलना और प्रवेश करना होवे, अर्थात् जो मुख्य द्वार हो, उसी द्वार के समीप ब्रह्मा सहित बाहर ठहर कर—



ओम् अच्युताय भौमाय स्वाहा॥



इस से एक आहुति देकर, ध्वजा का स्तम्भ जिस में ध्वजा लगाई हो, खड़ा करे और घर के ऊपर चारों कोणों पर 4 चार ध्वजा खड़ी करे तथा कार्यकर्त्ता गृहपति स्तम्भ खड़ा करके उस के मूल में जल से सेचन करे, जिससे वह दृढ़ रहे।



पुनः द्वार के सामने बाहर जाकर नीचे लिखे चार मन्त्रों से जलसेचन करे—



ओम् इमामुच्छ्रयामि भुवनस्य नाभिं वसोर्द्धारां प्रतरणीं वसूनाम्।



इहैव ध्रुवां निमिनोमि शालां क्षेमे तिष्ठतु घृतमुच्छ्रयमाणा॥1॥



इस मन्त्र से पूर्व द्वार के सामने जल छिटकावे।



अश्वावती गोमती सूनृतावत्युच्छ्रयस्व महते सौभगाय।



आ त्वा शिशुराक्रन्दन् त्वा गावो धेनवो वाश्यमानाः॥2॥



इस मन्त्र से दक्षिण द्वार।



आ त्वा कुमारस्तरुण आ वत्सो जगदैः सह।



आ त्वा परिस्रुतः कुम्भ आ दध्नः कलशैरुप।



क्षेमस्य पत्नी बृहती सुवासा रयिं नो धेहि सुभगे सुवीर्यम्॥3॥



इस मन्त्र से पश्चिम द्वार।



अश्वावद् गोमदूर्जस्वत् पर्णं वनस्पतेरिव।



अभि नः पूर्यतां रयिरिदमनुश्रेयो वसानः॥4॥



इस मन्त्र से उत्तर द्वार के सामने जल छिटकावे। तत्पश्चात् सब द्वारों पर पुष्प और पल्लव तथा कदली-स्तम्भ वा कदली के पत्ते भी द्वारों की शोभा के लिये लगाकर, पश्चात् गृहपति—



हे ब्रह्मन्! प्रविशामीति।ऐसा वाक्य बोले। और ब्रह्मा—



वरं भवान् प्रविशतु॥



ऐसा प्रत्युत्तर देवे। और ब्रह्मा की अनुमति से—



ओम् ऋचं प्रपद्ये शिवं प्रपद्ये॥



इस वाक्य को बोलके भीतर प्रवेश करे और जो घृत गरम कर, छान, सुगन्ध मिलाकर रक्खा हो, उस को पात्र में लेके जिस द्वार से प्रथम प्रवेश करे, उसी द्वार से प्रवेश करके, पृष्ठ 18-20 में लिखे प्रमाणे आचमन करकेअग्न्याधान, समिदाधान,जलप्रोक्षणपृष्ठ 20-21 में लिखे प्रमाणे घृत कीआघारावाज्यभागाहुति4 चार औरव्याहृतिआहुति 4 चार, नवमीस्विष्टकृत्आज्याहुति एक, अर्थात् दिशाओं की द्वारस्थ वेदियों मेंअग्न्याधानसे लेकेस्विष्टकृत्आहुतिपर्यन्त विधि करके, पश्चात् पूर्वदिशा द्वारस्थ कुण्ड में—



ओं प्राच्या॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑॥1॥



ओं दे॒वेभ्यः॑ स्वा॒ह्येभ्यः॒ स्वाहा॑॥2॥



इन दो मन्त्रों से पूर्व द्वारस्थ वेदी में दो घृताहुति देवे। वैसे ही—



ओं दक्षि॑णाया दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑॥1॥



ओं दे॒वेभ्यः॑ स्वा॒ह्येभ्यः॒ स्वाहा॑॥2॥



इन दो मन्त्रों से दक्षिण द्वारस्थ वेदी में एक-एक मन्त्र करके दो आज्याहुति और—



ओं प्र॒तीच्या॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑॥1॥



ओं दे॒वेभ्यः॑ स्वा॒ह्येभ्यः॒ स्वाहा॑॥2॥



इन दो मन्त्रों से दो आज्याहुति पश्चिमदिशाद्वारस्थ कुण्ड में देवे।



ओम् उदी॑च्या दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑॥1॥



ओं दे॒वेभ्यः॑ स्वा॒ह्येभ्यः॒ स्वाहा॑॥2॥



इन से उत्तर दिशास्थ वेदी में दो आज्याहुति देवे। पुनः मध्यशालास्थ वेदी के समीप जाके स्व-स्व दिशा में बैठके—



ओं ध्रु॒वाया॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑॥1॥



ओं दे॒वेभ्यः॑ स्वा॒ह्येभ्यः॒ स्वाहा॑॥2॥



इन से मध्य वेदी में दो आज्याहुति।



ओम् ऊ॒र्ध्वाया॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑॥1॥



ओं दे॒वेभ्यः॑ स्वा॒ह्येभ्यः॒ स्वाहा॑॥2॥



इन से भी दो आहुति मध्यवेदी में। और—



ओं दि॒शोदि॑शः॒ शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑॥1॥



ओं दे॒वेभ्यः॑ स्वा॒ह्येभ्यः॒ स्वाहा॑॥2॥



इन से भी दो आज्याहुति मध्यस्थ वेदी में देके, पुनः पूर्व दिशास्थ द्वारस्थ वेदी में अग्नि को प्रज्वलित करके वेदी के दक्षिण भाग में ब्रह्मासन तथा होता आदि के पूर्वोक्त प्रकार आसन बिछवा, उसी वेदी के उत्तर भाग में एक कलश स्थापन कर, पृष्ठ 13 में लिखे प्रमाणे स्थालीपाक बनाके, पृथक् निष्क्रम्यद्वार के समीप जा ठहर कर ब्रह्मादिसहित गृहपति मध्यशाला में प्रवेश करके ब्रह्मादि को दक्षिणादि आसन पर बैठा, स्वयं पूर्वाभिमुख बैठके संस्कृत घी अर्थात् जो गरम कर छान, जिस में कस्तूरी आदि सुगन्ध मिलाया हो, पात्र में लेके सब के सामने एक-एक पात्र भरके रक्खे। और चमसा में लेके—



ओं वास्तो॑ष्पते॒ प्रति॑ जानीह्य॒स्मान्त्स्वा॑वे॒शो अ॑नमी॒वो भ॑वा नः।



यत्त्वेम॑हे॒ प्रति॒ तन्नो॑ जुषस्व॒ शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॒ स्वाहा॑॥1॥



वास्तो॑ष्पते प्र॒तर॑णो न एधि गय॒स्फानो॒ गोभि॒रश्वे॑भिरिन्दो।



अ॒जरा॑सस्ते स॒ख्ये स्या॑म पि॒तेव॑ पु॒त्रान् प्रति॑ तन्नो जुषस्व॒ स्वाहा॑॥2



वास्तो॑ष्पते श॒ग्मया॑ सं॒सदा॑ ते सक्षी॒महि॑ र॒ण्वया॑ गातु॒मत्या॑।



पा॒हि क्षेम॑ उत॒ योगे॒ वरं॑ नो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॒ स्वाहा॑॥3॥ऋ॰ मं॰ 7। सू॰ 54॥



अ॒मी॒व॒हा वा॑स्तोष्पते॒ विश्वा॑ रू॒पाण्या॑वि॒शन्।



सखा॑ सु॒शेव॑ एधि नः॒ स्वाहा॑॥4॥ऋ॰ मं॰ 7। सू॰ 55। मं॰ 1॥



इन 4 चार मन्त्रों से 4 चार आज्याहुति देके, जो स्थालीपाक अर्थात् भात बनाया हो, उस को दूसरे कांसे के पात्र में लेके, उस पर यथायोग्य घृत सेचन करके अपने-अपने सामने रक्खे और पृथक्-पृथक् थोड़ा-थोड़ा लेकर—



ओम् अग्निमिन्द्रं बृहस्पतिं विश्वाँश्च देवानुपह्वये।



सरस्वतीञ्च वाजीञ्च वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा॥1॥



सर्पदेवजनान्त्सर्वान् हिमवन्तं सुदर्शनम्। वसूँश्च रुद्रानादित्यानीशानं जगदैः सह।



एतान्त्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा॥2॥



पूर्वाह्णमपराह्णं चोभौ मध्यन्दिना सह। प्रदोषमर्धरात्रं च व्युष्टां देवीं महापथाम्।



एतान्त्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा॥3॥



ओं कर्तारञ्च विकर्तारं विश्वकर्माणमोषधींश्च वनस्पतीन्।



एतान्त्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा॥4॥



धातारं च विधातारं निधीनां च पतिं सह।



एतान्त्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा॥5॥



स्योनं शिवमिदं वास्तु दत्तं ब्रह्मप्रजापती। सर्वाश्च देवताश्च स्वाहा॥6॥



स्थालीपाक अर्थात् घृतयुक्त भात की इन छह मन्त्रों से छह आहुति देकर कांस्यपात्र में उदुम्बर=गूलर, पलाश के पत्ते, शाड्वल=तृणविशेष, गोमय, दही, मधु, घृत, कुशा और यव को लेके उन सब वस्तुओं को मिलाकर—



ओं श्रीश्च त्वा यशश्च पूर्वे सन्धौ गोपायेताम्॥1॥



इस मन्त्र से पूर्व द्वार।



यज्ञश्च त्वा दक्षिणा च दक्षिणे सन्धौ गोपयेताम्॥2॥



इस से दक्षिण द्वार।



अन्नञ्च त्वा ब्राह्मणश्च पश्चिमे सन्धौ गोपायेताम्॥3॥



इस से पश्चिम द्वार।



ऊर्क् च त्वा सूनृता चोत्तरे सन्धौ गोपायेताम्॥4॥



इस से उत्तर द्वार के समीप उन को बखेरे, और जलप्रोक्षण भी करे।



केता च मा सुकेता च पुरस्ताद् गोपायेतामित्यग्निर्वै केताऽऽदित्यः सुकेता तौ प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु तौ मा पुरस्ताद् गोपायेताम्॥1॥



इस से पूर्व दिशा में परमात्मा का उपस्थान करके दक्षिण द्वार के सामने दक्षिणाभिमुख होके—



दक्षिणतो गोपायमानं च मा रक्षमाणा च दक्षिणतो गोपायेतामित्यहर्वै गोपायमानं रात्री रक्षमाणा ते प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु ते मा दक्षिणतो गोपायेताम्॥2॥



इस प्रकार जगदीश का उपस्थान करके पश्चिम द्वार के सामने पश्चिमाभिमुख होके—



दीदिविश्च मा जागृविश्च पश्चाद् गोपायेतामित्यन्नं वै दीदिविः प्राणो जागृविस्तौ प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु तौ मा पश्चाद् गोपायेताम्॥3॥



इस प्रकार पश्चिम दिशा में सर्वरक्षक परमात्मा का उपस्थान करके उत्तर दिशा में उत्तर द्वार के सामने उत्तराभिमुख खड़े रहके—



अस्वप्नश्च माऽनवद्राणश्चोत्तरतो गोपायेतामिति चन्द्रमा वा अस्वप्नो वायुरनवद्राणस्तौ प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु तौ मोत्तरतो गोपायेताम्॥4॥



धर्मस्थूणाराजं श्रीसूर्यामहोरात्रे द्वारफलके। इन्द्रस्य गृहा वसुमन्तो वरूथिनस्तानहं प्रपद्ये सह प्रजया पशुभिस्सह। यन्मे किञ्चिदस्त्युपहूतः सर्वगणः सखा यः साधुसंमतस्तां त्वा शाले अरिष्टवीरा गृहा नः सन्तु सर्वतः॥5॥



इस प्रकार उत्तर दिशा में सर्वाधिष्ठाता परमात्मा का उपस्थान करके, सुपात्र वेदवित् धार्मिक होता आदि सपत्नीक ब्राह्मण तथा इष्ट मित्र और सम्बन्धियों को उत्तम भोजन कराके, यथायोग्य सत्कार करके दक्षिणा दे, पुरुषों को पुरुष और स्त्रियों को स्त्री प्रसन्नतापूर्वक विदा करें। और वे जाते समय गृहपति और गृहपत्नी आदि को



‘सर्वे भवन्तोऽत्राऽऽनन्दिताः सदा भूयासुः॥‘



इस प्रकार आशीर्वाद देके अपने-अपने घर को जावें।



इसी प्रकार आराम आदि की भी प्रतिष्ठा करें। इस में इतना ही विशेष है कि जिस ओर का वायु बगीचे को जावे, उसी ओर होम करे कि जिस का सुगन्ध वृक्ष आदि को सुगन्धित करे। यदि उस में घर बना हो तो शाला के समान उस की भी प्रतिष्ठा करे॥



॥ इति शालादिसंस्कारविधिः॥



इस प्रकार गृहादि की रचना करके गृहाश्रम में जो-जो अपने अपने वर्ण के अनुकूल कर्त्तव्य कर्म हैं, उन-उन को यथावत् करें।



अथ ब्राह्मणस्वरूपलक्षणम्



अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा।



दानं प्रतिग्रहश्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्॥1॥—मनु॰॥



शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।



ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥2॥—गीता॥



अर्थ—1 एक—निष्कपट होके प्रीति से पुरुष पुरुषों को और स्त्री स्त्रियों को पढ़ावें। 2 दो-पूर्ण विद्या पढ़ें। 3 तीन—अग्निहोत्रादि यज्ञ करें। 4 चौथा—यज्ञ करावें। 5 पांच—विद्या अथवा सुवर्ण आदि का सुपात्रों को दान देवें। 6 छठा—न्याय से धनोपार्जन करने वाले गृहस्थों से दान लेवें भी।



इन में से 3 तीन कर्म—पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना धर्म[8]में और तीन कर्म—पढ़ाना, यज्ञ कराना, दान लेना जीविका हैं।



परन्तु—



प्रतिग्रहः प्रत्यवरः॥—मनु॰



जो दान लेना है वह नीच कर्म है, किन्तु पढ़ाके और यज्ञ कराके जीविका करनी उत्तम है॥1॥



(शमः) मन को अधर्म में न जाने दे, किन्तु अधर्म करने की इच्छा भी न उठने देवे। (दमः) श्रोत्रादि इन्द्रियों को अधर्माचरण से सदा दूर रक्खे, दूर रखके धर्म ही के बीच में प्रवृत्त रक्खे। (तपः) ब्रह्मचर्य विद्या योगाभ्यास की सिद्धि के लिये शीत-उष्ण, निन्दा-स्तुति, क्षुधा-तृषा, मानापमान आदि द्वन्द्व का सहना। (शौचम्) राग, द्वेष, मोहादि से मन और आत्मा को तथा जलादि से शरीर को सदा पवित्र रखना। (क्षान्तिः) क्षमा, अर्थात् कोई निन्दा-स्तुति आदि से सतावें तो भी उन पर कृपालु रहकर क्रोधादि का न करना। (आर्जवम्) निरभिमान रहना, दम्भ स्वात्मश्लाघा अर्थात् अपने मुख से अपनी प्रशंसा न करके नम्र सरल शुद्ध पवित्र भाव रखना। (ज्ञानम्) सब शास्त्रों को पढ़के, विचार कर उन के शब्दार्थ-सम्बन्धों को यथावत् जानकर पढ़ाने का पूर्ण सामर्थ्य करना। (विज्ञानम्) पृथिवी से लेके परमेश्वर-पर्यन्त पदार्थों को जान और क्रियाकुशलता तथा योगाभ्यास से साक्षात् करके यथावत् उपकार ग्रहण करना, कराना। (आस्तिक्यम्) परमेश्वर, वेद, धर्म, परलोक, परजन्म, पूर्वजन्म, कर्मफल और मुक्ति से विमुख कभी न होना। ये नव कर्म और गुण धर्म में समझना। सब से उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव को धारण करना। ये गुण, कर्म, जिन व्यक्तियों में हों, वे ब्राह्मण और ब्राह्मणी होवें। विवाह भी इन्हीं वर्ण के गुण, कर्म, स्वभावों को मिला ही के करें। मनुष्यमात्र में से इन्हीं को ब्राह्मण वर्ण का अधिकार होवे॥2॥



अथ क्षत्रियस्वरूपलक्षणम्



प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च।



विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः॥1॥—मनु॰॥



शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।



दानमीश्वरभावश्च क्षात्रकर्म स्वभावजम्॥2॥—गीता॥



अर्थ—दीर्घ ब्रह्मचर्य से (अध्ययनम्) साङ्गोपाङ्ग वेदादिशास्त्रों को यथावत् पढ़ना। (इज्या) अग्निहोत्रादि यज्ञों का करना, (दानम्) सुपात्रों को विद्या सुवर्ण आदि और प्रजा को अभयदान देना, (प्रजानां रक्षणम्) प्रजाओं का सब प्रकार से सर्वदा यथावत् पालन करना, यह धर्म क्षत्रियों के धर्म के लक्षणों में, और शस्त्रविद्या का पढ़ाना, न्यायघर और सेना में जीविका करना क्षत्रियों की जीविका है। (विषयेष्वप्रसक्तिः) विषयों में अनासक्त होके सदा जितेन्द्रिय रहना। लोभ, व्यभिचार, मद्यपानादि नशा आदि दुर्व्यसनों से पृथक् रहकर विनय सुशीलतादि शुभ कर्मों में सदा प्रवृत्त रहना॥1॥



(शौर्यम्) शस्त्र-संग्राम मृत्यु और शस्त्र प्रहारादि से न डरना। (तेजः) प्रगल्भता, उत्तम प्रतापी होकर किसी के सामने दीन वा भीरु न होना। (धृतिः) चाहे कितनी ही आपत्-विपत् क्लेश-दुःख प्राप्त हो, तथापि धैर्य रखके कभी न घबराना, (दाक्ष्यम्) संग्राम वाग्युद्ध दूतत्व न्याय विचार आदि सब में अतिचतुर बुद्धिमान् होना, (युद्धे चाप्यपलायनम्) युद्ध में सदा उद्यत रहना, युद्ध से घबराकर शत्रु के वश में कभी न होना, (दानम्) इस का अर्थ प्रथम श्लोक में आ गया, (ईश्वरभावः) जैसे परमेश्वर सब के ऊपर दया करके पितृवत् वर्तमान, पक्षपात छोड़कर धर्माऽधर्म करनेवालों को यथायोग्य सुखदुःखरूप फल देता, और अपने सर्वज्ञता आदि साधनों से सब का अन्तर्यामी होकर सब के अच्छे-बुरे कर्मों को यथावत् देखता है, वैसे प्रजा के साथ वर्तकर गुप्त दूत आदि से अपने को सर्व प्रजा वा राजपुरुषों के अच्छे-बुरे कर्मों से सदा ज्ञात रखना। रात दिन न्याय करने और प्रजा को यथावत् सुख देने, श्रेष्ठों का मान और दुष्टों को दण्ड करने में सदा प्रवृत्त रहना। और सब प्रकार से अपने शरीर को रोगरहित बलिष्ठ दृढ़ तेजस्वी दीर्घायु रखके आत्मा को न्याय धर्म में चलाकर कृतकृत्य करना आदि गुण, कर्मों का योग जिस व्यक्ति में हो, वह क्षत्रिय और क्षत्रिया होवे।



इन का भी इन्हीं गुण-कर्मों के मेल से विवाह करना। और जैसे ब्राह्मण पुरुषों और ब्राह्मणी स्त्रियों को पढ़ावे, वैसे ही राजा पुरुषों, राणी स्त्रियों का न्याय तथा उन्नति सदा किया करे। जो क्षत्रिय राजा न हों वे भी राज में ही यथाधिकार से नौकरी किया करें॥2॥





अथ वैश्यस्वरूपलक्षणम्



पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च।



वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च॥—मनु॰॥



अर्थ—(अध्ययनम्) वेदादि शास्त्रों का पढ़ना, (इज्या) अग्निहोत्रादि यज्ञों का करना, (दानम्) अन्नादि का दान देना, ये तीन धर्म के लक्षण हैं और (पशूनां रक्षणम्) गाय आदि पशुओं का पालन करना, उन के दुग्धादि का बेचना, (वणिक्पथम्) नाना देशों की भाषा, हिसाब, भूगर्भविद्या, भूमि, बीज आदि के गुण जानना और सब पदार्थों के भावाभाव समझना, (कुसीदम्) ब्याज का लेना,[9](कृषिमेव च) खेती की विद्या का जानना, अन्न आदि की रक्षा, खात और भूमि की परीक्षा, जोतना-बोना आदि व्यवहार का जानना, ये चार कर्म वैश्य की जीविका। ये गुण-कर्म जिस व्यक्ति में हों, वह वैश्य-वैश्या और इन्हीं की परस्पर परीक्षा और योग से विवाह होना चाहिये॥





अथ शूद्रस्वरूपलक्षणम्



एकमेव हि शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्।



एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषाम् अनसूयया॥—मनु॰॥



अर्थ—(प्रभुः) परमेश्वर ने (शूद्रस्य) जो विद्याहीन, जिस को पढ़ने से भी विद्या न आ सके, शरीर से पुष्ट, सेवा में कुशल हो, उस शूद्र के लिये (एतेषामेव वर्णानाम्) इन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों वर्णों की (अनसूयया) निन्दा से रहित प्रीति से सेवा करना, (एकमेव कर्म) यही एक कर्म (समादिशत्) करने की आज्ञा दी है। ये मूर्खत्वादि गुण और सेवा आदि कर्म जिस व्यक्ति में हों, वह शूद्र और शूद्रा है। इन्हीं की परीक्षा से इन का विवाह और इन को अधिकार भी ऐसा ही होना चाहिए॥



इन गुणकर्मों के योग ही से चारों वर्ण होवें तो उस कुल देश और मनुष्यसमुदाय की बड़ी उन्नति होवे और जिन का जन्म जिस वर्ण में हो उसी के सदृश गुण, कर्म, स्वभाव हों तो अतिविशेष है। अब सब ब्राह्मणादि वर्णवाले मनुष्य लोग अपने-अपने कर्मों में निम्नलिखित रीति से बर्तें—



वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः।



तद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम्॥1॥



नेहेतार्थान् प्रसङ्गेन न विरुद्धेन कर्मणा।



न विद्यमानेष्वर्थेषु नार्त्यामपि यतस्ततः॥2॥



अर्थः—ब्राह्मणादि द्विज वेदोक्त अपने कर्म को आलस्य छोड़के नित्य किया करें। उस को अपने सामर्थ्य के अनुसार करते हुए मुक्ति पर्यन्त पदार्थों को प्राप्त होते हैं॥1॥



गृहस्थ कभी किसी दुष्ट के प्रसङ्ग से द्रव्यसञ्चय न करे, न विरुद्ध कर्म से, न विद्यमान पदार्थ होते हुए उन को गुप्त रखके, दूसरे से छल करके और चाहे कितना ही दुःख पड़े तदपि अधर्म से द्रव्य-सञ्चय कभी न करे॥2॥



इन्द्रियार्थेषु सर्वेषु न प्रसज्येत कामतः।



अतिप्रसक्तिं चैतेषां मनसा सन्निवर्तयेत्॥3॥



सर्वान् परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः।



यथा तथाऽध्यापयँस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता॥4॥



अर्थ—इन्द्रियों के विषयों में काम से कभी न फंसे और विषयों की अत्यन्त प्रसक्ति अर्थात् प्रसंग को मन से अच्छे प्रकार दूर करता रहे॥3॥



जो स्वाध्याय और धर्म-विरोधी व्यवहार वा पदार्थ हैं, उन सब को छोड़ देवे। जिस-किसी प्रकार से विद्या को पढ़ाते रहना ही गृहस्थ को कृतकृत्य होना है॥4॥





बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च।



नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमांश्चैव वैदिकान्॥5॥



यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति।



तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते॥6॥



न संवसेच्च पतितैर्न चाण्डालैर्न पुक्कशैः।



न मूर्खैर्नावलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः॥7॥



नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।



आमृत्योः प्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥8॥



सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।



प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥9॥



अर्थ—हे स्त्री पुरुषो! तुम जो धर्म धन और बुद्ध्यादि को अत्यन्त शीघ्र बढ़ानेहारे हितकारी शास्त्र हैं उन को और वेद के भागों की विद्याओं को नित्य देखा करो॥5॥



मनुष्य जैसे-जैसे शास्त्र का विचार कर उस के यथार्थ भाव को प्राप्त होता है, वैसे-वैसे अधिक-अधिक जानता जाता है और इस की प्रीति विज्ञान ही में होती जाती है॥6॥



सज्जन गृहस्थ लोगों को योग्य है कि जो पतित दुष्ट कर्म करनेहारे हों न उन के, न चाण्डाल, न कञ्जर, न मूर्ख, न मिथ्याभिमानी और न नीच निश्चयवाले मनुष्यों के साथ कभी निवास करें॥7॥



गृहस्थ लोग कभी प्रथम पुष्कल धनी होके पश्चात् दरिद्र हो जायें, उस से अपने आत्मा का अवमान न करें कि ‘हाय हम निर्धनी हो गये’ इत्यादि विलाप भी न करें, किन्तु मृत्युपर्यन्त लक्ष्मी की उन्नति में पुरुषार्थ किया करें और लक्ष्मी को दुर्लभ न समझें॥8॥



मनुष्य सदैव सत्य बोलें, और दूसरे को कल्याणकारक उपदेश करें। काणे को काणा और मूर्ख को मूर्ख आदि अप्रिय वचन उन के सम्मुख कभी न बोलें और जिस मिथ्याभाषण से दूसरा प्रसन्न होता हो उस को भी न बोलें, यह सनातन धर्म है॥9॥



अभिवादयेद् वृद्धाँश्च दद्याच्चैवासनं स्वकम्।



कृताञ्जलिरुपासीत गच्छतः पृष्ठतोऽन्वियात्॥10॥



श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यङ् निबद्धं स्वेषु कर्मसु।



धर्ममूलं निषेवेत सदाचारमतन्द्रितः॥11॥



आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः।



आचाराद् धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम्॥12॥



दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः।



दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च॥13॥



सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान् नरः।



श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति॥14॥



अर्थ—सदा विद्यावृद्धों और वयोवृद्धों को ‘नमस्ते’ अर्थात् उन का मान्य किया करे। जब वे अपने समीप आवें, तब उठकर मान्यपूर्वक ले अपने आसन पर बैठावे। और हाथ जोड़के आप समीप बैठे पूछे, वे उत्तर देवें। और जब जाने लगें, तब थोड़ी दूर पीछे-पीछे जाकर ‘नमस्ते’ कर विदा किया करे। और वृद्ध लोग हर वार निकम्मे जहां-तहां न जाया करें॥10॥



गृहस्थ सदा आलस्य को छोड़कर वेद और मनुस्मृति में वेदानुकूल कहे हुए अपने कर्मों में निबद्ध, और धर्म का मूल सदाचार, अर्थात् सत्य और सत्पुरुष आप्त धर्मात्माओं का जो आचरण है, उस का सेवन सदा किया करें॥11॥



धर्माचरण ही से दीर्घायु, उत्तम प्रजा और अक्षय धन को मनुष्य प्राप्त होता है और धर्माचार बुरे अधर्मयुक्त लक्षणों का नाश कर देता है॥12॥



और जो दुष्टाचारी पुरुष होता है, वह सर्वत्र निन्दित दुःखभागी और व्याधि से अल्पायु सदा हो जाता है॥13॥



जो सब अच्छे लक्षणों से हीन भी होकर सदाचारयुक्त, सत्य में श्रद्धा और निन्दा आदि दोषरहित होता है, वह सुख से सौ वर्ष पर्यन्त जीता है॥14॥



यद्यत् परवशं कर्म तत्तद् यत्नेन वर्जयेत्।



यद्यदात्मवशं तु स्यात् तत्तत् सेवेत यत्नतः॥15॥



सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।



एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥16॥



अधार्मिको नरो यो हि यस्य चाप्यनृतं धनम्।



हिंसारतश्च यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते॥17॥



अर्थ—मनुष्य जो-जो पराधीन कर्म हो, उस-उस को प्रयत्न से सदा छोड़े और जो-जो स्वाधीन कर्म हो, उस-उस का सेवन प्रयत्न से किया करे॥15॥



क्योंकि जितना परवश होना है वह सब दुःख और जितना स्वाधीन रहना है वह सब सुख कहाता है। यही संक्षेप से सुख और दुःख का लक्षण जानो॥16॥



जो अधार्मिक मनुष्य है और जिस का अधर्म से सञ्चित किया हुआ धन है और जो सदा हिंसा में अर्थात् वैर में प्रवृत्त रहता है, वह इस लोक और परलोक अर्थात् परजन्म में सुख को कभी नहीं प्राप्त हो सकता॥17॥





नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव।



शनैरावर्त्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति॥18॥



यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पुत्रेषु नप्तृषु।



न त्वेवन्तु कृतोऽधर्मः कर्त्तुर्भवति निष्फलः॥19॥



सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत् सदा।



शिष्याँश्च शिष्याद् धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः॥20॥



अर्थ—मनुष्य निश्चय करके जाने कि इस संसार में जैसे गाय की सेवा का फल दूध आदि शीघ्र नहीं होता, वैसे ही किये हुए अधर्म का फल भी शीघ्र नहीं होता। किन्तु धीरे-धीरे अधर्म कर्त्ता के सुखों को रोकता हुआ सुख के मूलों को काट देता है। पश्चात् अधर्मी दुःख ही दुःख भोगता है॥18॥



यदि अधर्म का फल कर्त्ता की विद्यमानता में न हो तो पुत्रों, और पुत्रों के समय में न हो तो नातियों के समय में अवश्य प्राप्त होता है। किन्तु यह कभी नहीं हो सकता कि कर्त्ता का किया हुआ कर्म निष्फल होवे॥19॥



इसलिए मनुष्यों को योग्य है कि सत्य धर्म और आर्य अर्थात् उत्तम पुरुषों के आचरणों और भीतर बाहर की पवित्रता में सदा रमण करें। अपनी वाणी, बाहू, उदर को नियम और सत्यधर्म के साथ वर्त्तमान रखके शिष्यों को सदा शिक्षा किया करें॥20॥



परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ।



धर्मं चाप्यसुखोदर्वं लोकविक्रुष्टमेव च॥21॥



धर्मं शनैस्सञ्चिनुयाद् वल्मीकमिव पुत्तिकाः।



परलोकसहायार्थं सर्वभूतान्यपीडयन्॥22॥



उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं सम्बन्धानाचरेत् सह।



निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमाँस्त्यजेत्॥23॥



वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः।



तान्तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः॥24॥



स्वाध्यायेन जपैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः।



महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः॥25॥मनु॰॥



अर्थ—जो धर्म से वर्जित धनादि पदार्थ और काम हों, उन को सर्वथा शीघ्र छोड़ देवे। और जो धर्माभास अर्थात् उत्तरकाल में दुःखदायक कर्म हैं, और जो लोगों को निन्दित कर्म में प्रवृत्त करनेवाले कर्म हैं, उन से भी दूर रहे॥21॥



जैसे दीमक धीरे-धीरे बड़े भारी घर को बना लेती हैं, वैसे मनुष्य परजन्म के सहाय के लिये सब प्राणियों को पीड़ा न देकर धर्म का सञ्चय धीरे-धीरे किया करे॥22॥



जो मनुष्य अपने कुल को उत्तम करना चाहे, वह नीच-नीच पुरुषों का सम्बन्ध छोड़कर नित्य अच्छे-अच्छे पुरुषों से सम्बन्ध बढ़ाता जावे॥23॥



जिस वाणी में सब व्यवहार निश्चित, वाणी ही जिन का मूल और जिस वाणी ही से सब व्यवहार सिद्ध होते हैं, जो मनुष्य उस वाणी को चोरता अर्थात् मिथ्याभाषण करता है, वह जानो सब चोरी आदि पाप ही को करता है। इसलिये मिथ्याभाषण को छोड़के सदा सत्यभाषण ही किया करे॥24॥



मनुष्यों को चाहिये कि धर्म से वेदादि शास्त्रों का पठन-पाठन, गायत्री-प्रणवादि का अर्थविचार, ध्यान, अग्निहोत्रादि होम, कर्मोपासना, ज्ञान-विद्या, पौर्णमास्यादि इष्टि, पञ्चमहायज्ञ, अग्निष्टोम आदि, न्याय से राज्यपालन, सत्योपदेश और योगाभ्यासादि उत्तम कर्मों से इस शरीर को ब्राह्मी अर्थात् ब्रह्मसम्बन्धी करें॥25॥



अथ सभास्वरूपलक्षणम्—जो-जो विशेष बड़े-बड़े काम हों जैसा कि राज्य, वे सब सभा से निश्चय करके किये जावें। इसमें प्रमाण—



तं स॒भा च॒ समि॑तिश्च॒ सेना॑ च॒॥1॥अथर्व॰ कां॰ 15। सू॰ 9। मं॰ 2॥



सभ्य॑ स॒भां मे॑ पाहि॒ ये च॒ सभ्याः॑ सभा॒सदः॑॥2॥अथर्व॰ कां॰ 19। सू॰ 55। मं॰ 6॥



त्रीणि॑ राजाना वि॒दथे॑ पु॒रूणि॒ परि॒ विश्वा॑नि भूषथः॒ सदां॑सि॥3॥ऋ॰ मं॰ 3। सू॰ 38। मं॰ 6॥



अर्थ—(तम्) जो कि संसार में धर्म के साथ राज्यपालनादि किया जाता है, उस व्यवहार को सभा और संग्राम तथा सेना सब प्रकार सञ्चित करे॥1॥



हे सभ्य सभा के योग्य सभापते राजन् ! तू (मे) मेरी (सभाम्) सभा की (पाहि) रक्षा और उन्नति किया कर। (ये च) और जो (सभ्याः) सभा के योग्य धार्मिक आप्त (सभासदः) सभासद् विद्वान् लोग हैं, वे भी सभा की योजना रक्षा और उस से सब की उन्नति किया करें॥2॥



जो (राजाना) राजा और प्रजा के भद्र पुरुषों के दोनों समुदाय हैं, वे (विदथे) उत्तम ज्ञान और लाभदायक इस जगत् अथवा संग्रामादि कार्यों में (त्रीणि) राजसभा, धर्मसभा और विद्यासभा, अर्थात् विद्यादि व्यवहारों की वृद्धि के लिये ये तीन प्रकार की (सदांसि) सभा नियत करें। इन्हीं से संसार की सब प्रकार उन्नति करें॥3॥



अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत्।



यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयुस्स धर्मः स्यादशङ्कितः॥1॥



धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिबृंहणः।



ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः॥2॥



अर्थः—हे गृहस्थ लोगो ! जो धर्मयुक्त व्यवहार मनुस्मृति आदि में प्रत्यक्ष न कहे हों, यदि उन में शंका होवे तो तुम जिस को शिष्ट आप्त विद्वान् कहें, उसी को शङ्कारहित कर्तव्य धर्म मानो॥1॥



शिष्ट सब मनुष्यमात्र नहीं होते, किन्तु जिन्होंने पूर्ण ब्रह्मचर्य और धर्म से साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़ें हों, जो श्रुति प्रमाण और प्रत्यक्षादि प्रमाणों ही से विधि वा निषेध करने में समर्थ धार्मिक परोपकारी हों, वे ही शिष्ट पुरुष होते हैं॥2॥



दशावरा वा परिषद् यं धर्मं परिकल्पयेत्।



त्र्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत्॥3॥



त्रैविद्यो हैतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः।



त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत् स्याद् दशावरा॥4॥



ऋग्वेदविद् यजुर्विच्च सामवेदविदेव च।



त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये॥5॥



एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद् द्विजोत्तमः।



स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः॥6॥



अर्थः—वैसे शिष्ट न्यून से न्यून 10 दश पुरुषों की सभा होवे, अथवा बड़े विद्वान् तीनों की भी सभा हो सकती है। जो सभा से धर्म-कर्म निश्चित हों, उन का भी आचरण सब लोग करें॥3॥



उन दशों में इस प्रकार के विद्वान् होवें—3 तीन वेदों के विद्वान्, चौथा हैतुक अर्थात् कारण-अकारण का ज्ञाता, पांचवां तर्की=न्यायशास्त्रवित्, छठा निरुक्त का जाननेहारा, सातवां धर्मशास्त्रवित्, आठवां ब्रह्मचारी, नववां गृहस्थ और दशवां वानप्रस्थ—इन महात्माओं की सभा होवे॥4॥



तथा ऋग्वेदवित् यजुर्वेदवित् और सामवेदवित् इन तीनों विद्वानों की भी सभा धर्मसंशय अर्थात् सब व्यवहारों के निर्णय के लिये होनी चाहिए और जितने सभा में अधिक पुरुष हों, उतनी ही उत्तमता है॥5॥



द्विजों में उत्तम अर्थात् चतुर्थाश्रमी संन्यासी अकेला भी जिस धर्म-व्यवहार के करने का निश्चय करे, वही कर्तव्य परम धर्म समझना, किन्तु अज्ञानियों के सहस्रों लाखों और क्रोडह पुरुषों का कहा हुआ धर्मव्यवहार कभी न मानना चाहिए किन्तु धर्मात्मा विद्वानों और विशेष परमविद्वान् संन्यासी का वेदादि प्रमाणों से कहा हुआ धर्म सब को मानने योग्य है॥6॥



यदि सभा में मतभेद हो तो बहुपक्षानुसार मानना और समपक्ष में उत्तमों की बात स्वीकार करनी। और दोनों पक्षवाले बराबर उत्तम हों तो वहां संन्यासियों की सम्मति लेनी। जिधर पक्षपातरहित सर्वहितैषी संन्यासियों की सम्मति होवे, वही उत्तम समझनी चाहिए।



चतुर्भिरपि चैवैतैर्नित्यमाश्रमिभिर्द्विजैः।



दशलक्षणको धर्मस्सेवितव्यः प्रयत्नतः॥7॥



धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।



धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥8॥—मनु॰॥



अर्थ—ब्रह्मचारी गृहस्थ वानप्रस्थ संन्यासी आदि सब मनुष्यों को योग्य है कि निम्नलिखित धर्म का सेवन और उस से विरुद्ध अधर्म का त्याग प्रयत्न से किया करें॥7॥



धर्म, न्याय नाम पक्षपात छोड़कर सत्य ही का आचरण और असत्य का सर्वदा परित्याग रखना। इस धर्म के ग्यारह लक्षण हैं (अहिंसा) किसी से वैर-बुद्धि करके उस के अनिष्ट करने में कभी न वर्तना। (धृतिः) सुख-दुःख हानि-लाभ में भी व्याकुल होकर धर्म को न छोड़ना, किन्तु धैर्य से धर्म ही में स्थिर रहना। (क्षमा) निन्दा-स्तुति, मानापमान का सहन करके धर्म ही करना। (दमः) मन को अधर्म से सदा हटाकर धर्म ही में प्रवृत्त रखना। (अस्तेयम्) मन, कर्म, वचन से अन्याय और अधर्म से पराये द्रव्य का स्वीकार न करना (शौचम्) राग-द्वेषादि त्याग से आत्मा और मन को पवित्र और जलादि से शरीर को शुद्ध रखना। (इन्द्रियनिग्रहः) श्रोत्रादि बाह्य इन्द्रियों को अधर्म से हटाके धर्म ही में चलाना। (धीः) वेदादि सत्यविद्या ब्रह्मचर्य सत्सङ्ग करने और कुसङ्ग दुर्व्यसन, मद्यपानादि त्याग से बुद्धि को सदा बढ़ाते रहना। (विद्या) जिससे भूमि से लेके परमेश्वरपर्यन्त का यथार्थ बोध होता है, उस विद्या को प्राप्त होना। (सत्यम्) सत्य मानना, सत्य बोलना, सत्य करना। (अक्रोधः) क्रोधादि दोषों को छोड़कर शान्त्यादि गुणों का ग्रहण करना धर्म कहाता है, इस का ग्रहण और अन्याय पक्षपात-सहित आचरण अधर्म, जो कि हिंसा=वैर-बुद्धि, अधैर्य, असहन, मन को अधर्म में चलाना, चोरी करना, अपवित्र रहना, इन्द्रियों को न जीत कर अधर्म में चलाना, कुसङ्ग, दुर्व्यसन, मद्यपानादि से बुद्धि का नाश करना, अविद्या जो कि अधर्माचरण अज्ञान है उस में फंसना, असत्य मानना असत्य बोलना, क्रोधादि दोषों में फंसकर अधर्मी दुष्टाचारी होना, ये ग्यारह अधर्म के लक्षण हैं। इन से सदा दूर रहना चाहिए॥8॥



न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा, न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्।



नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति, न तत् सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम्॥9॥—महाभारते॰॥



सभां वा न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम्।



अब्रुवन् विब्रुवन् वापि नरो भवति किल्विषी॥10॥



धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठते।



शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः॥11॥



विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः।



हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तन्निबोधत॥12॥



अर्थ—वह सभा नहीं है, जिस में वृद्ध पुरुष न होवें। वे वृद्ध नहीं हैं, जो धर्म ही की बात नहीं बोलते। वह धर्म नहीं है, जिस में सत्य नहीं और न वह सत्य है जो कि छल से युक्त हो॥9॥



मनुष्य को योग्य है कि सभा में प्रवेश न करे। यदि सभा में प्रवेश करे तो सत्य ही बोले। यदि सभा में बैठा हुआ भी असत्य बात को सुनके मौन रहे, अथवा सत्य के विरुद्ध बोले, वह मनुष्य अतिपापी है॥10॥



अधर्म से धर्म घायल होकर जिस सभा में प्राप्त होवे, उस के घाव को यदि सभासद् न पूर देवें, तो निश्चय जानो कि उस सभा में सब सभासद् ही घायल पड़े हैं॥11॥



जिस को सत्पुरुष राग-द्वेषरहित विद्वान् अपने हृदय से अनुकूल जानकर सेवन करते हैं, उसी पूर्वोक्त को तुम लोग धर्म जानो॥12॥



धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।



तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥13॥



वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम्।



वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद् धर्मं न लोपयेत्॥14॥



अर्थः—जो पुरुष धर्म का नाश करता है, उसी का नाश धर्म कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता है, उस की धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हम को न मार डाले, इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी न करना चाहिए॥13॥



जो सुख की वृष्टि करनेहारा सब ऐश्वर्य का दाता धर्म है, उस का जो लोप करता है, उस को विद्वान् लोग वृषल अर्थात् नीच समझते हैं॥14॥



न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः।



धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः॥15॥महाभारते॥



यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च।



हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः॥16॥—मनु॰॥



निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु, लक्ष्मीस्समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।



अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा, न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥17॥भर्तृहरिः॥



अर्थ—मनुष्यों को योग्य है कि काम से, अर्थात् झूठ से कामना सिद्ध होने के कारण से, वा निन्दा, स्तुति आदि के भय से भी धर्म का त्याग कभी न करें, और न लोभ से। चाहे झूठ अधर्म से चक्रवर्ती राज्य भी मिलता हो, तथापि धर्म को छोड़कर चक्रवर्ती राज्य को भी ग्रहण न करें। चाहे भोजन-छादन जलपान आदि की जीविका भी अधर्म से हो सके वा प्राण जाते हों, परन्तु जीविका के लिये भी धर्म को कभी न छोड़ें। क्योंकि जीव और धर्म नित्य हैं तथा सुख-दुःख दोनों अनित्य हैं। अनित्य के लिये नित्य का छोड़ना अतीव दुष्ट कर्म है। इस धर्म का हेतु कि जिस शरीर आदि से धर्म होता है, वह भी अनित्य है। धन्य वे मनुष्य हैं, जो अनित्य शरीर और सुख-दुःखादि के व्यवहार में वर्त्तमान होकर नित्य धर्म का त्याग कभी नहीं करते॥15॥



जिस सभा में बैठे हुए सभासदों के सामने अधर्म से धर्म और झूठ से सत्य का हनन होता है, उस सभा में सब सभासद् मरे से ही हैं॥16॥



सब मनुष्यों को यह निश्चय जानना चाहिए कि चाहे सांसारिक अपने प्रयोजन की नीति में वर्त्तनेहारे चतुर पुरुष निन्दा करें वा स्तुति करें, लक्ष्मी प्राप्त होवे अथवा नष्ट हो जावे, आज ही मरण होवे अथवा वर्षान्तर में मृत्यु प्राप्त होवे, तथापि जो मनुष्य धर्मयुक्त मार्ग से एक पग भी विरुद्ध नहीं चलते, वे ही धीर पुरुष धन्य हैं॥17॥



सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒ सं वो॒ मनां॑सि जानताम्।



दे॒वा भा॒गं यथा॒ पूर्वे॑ सं जाना॒ना उ॒पास॑ते॥1॥ऋ॰ म॰ 10। सू॰ 191। मं॰ 2॥



दृ॒ष्ट्वा रू॒पे व्याव॑रोत् सत्यानृत्रते प्र॒जाप॑तिः। अश्र॑द्धा॒मनृ॒तेऽद॑धाच्छ्र॒द्धां स॒त्ये प्र॒जाप॑तिः॥2॥



यजु॰ अ॰ 19। मं॰ 77॥



स॒ह ना॑ववतु स॒ह नौ॑ भुनक्तु स॒ह वीर्यं॑ करवावहै।



ते॒ज॒स्वि ना॒वधी॑तमस्तु॒ मा वि॑द्विषा॒वहै॑॥ ओं शान्ति॒श्शान्ति॒श्शान्तिः॑॥3॥



तै॰ आर॰ अष्टमप्रपाठकः। प्रथमानुवाकः॥



अर्थः—हे गृहस्थादि मनुष्यो! तुम को मैं ईश्वर आज्ञा देता हूं कि (यथा) जैसे (पूर्वे) प्रथम अधीतविद्यायोगाभ्यासी, (सं जानानाः) सम्यक् जाननेवाले, (देवाः) विद्वान् लोग मिलके (भागम्) सत्य असत्य का निर्णय करके, असत्य को छोड़, सत्य की (उपासते) उपासना करते हैं, वैसे (सं जानताम्) आत्मा से धर्माऽधर्म, प्रियाऽप्रिय को सम्यक् जाननेहारे (वः) तुम्हारे (मनांसि) मन एक-दूसरे से अविरोधी होकर एक पूर्वोक्त धर्म में सम्मत होवें। और तुम उसी धर्म को (सं गच्छध्वम्) सम्यक् मिलके प्राप्त होओ, जिस में तुम्हारी एक सम्मति होती है और विरुद्धवाद अधर्म को छोड़के (संवदध्वम्) सम्यक् संवाद प्रश्नोत्तर प्रीति से करके एक-दूसरे की उन्नति किया करो॥1॥



(प्रजापतिः) सकल सृष्टि की उत्पत्ति और पालन करनेहारा सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, न्यायकारी अद्वितीय स्वामी परमात्मा (सत्यानृते) सत्य और अनृत (रूपे) भिन्न-भिन्न स्वरूपवाले धर्म-अधर्म को (दृष्ट्वा) अपनी सर्वज्ञता से यथावत् देखके (व्याकरोत्) भिन्न-भिन्न निश्चित करता है। (अनृते) मिथ्याभाषणादि अधर्म में (अश्रद्धाम्) अप्रीति को और (प्रजापतिः) वही परमात्मा (सत्ये) सत्यभाषणादिलक्षणयुक्त न्याय पक्षपातरहित धर्म में तुम्हारी (श्रद्धाम्) प्रीति को (अदधात्) धारण कराता है, वैसा ही तुम करो॥2॥



हम स्त्री-पुरुष सेवक-स्वामी मित्र-मित्र पिता-पुत्रादि (सह) मिलके (नौ) हम दोनों प्रीति से (अवतु) एक-दूसरे की रक्षा किया करें और (सह) प्रीति से मिलके एक-दूसरे के (वीर्यम्) पराक्रम की बढ़ती (करवावहै) सदा किया करें। (नौ) हमारा (अधीतम्) पढ़ा- पढ़ाया (तेजस्वि) अतिप्रकाशमान (अस्तु) होवे और हम एक-दूसरे से (मा विद्विषावहै) कभी विद्वेष विरोध न करें, किन्तु सदा मित्र-भाव और एक-दूसरे के साथ सत्य प्रेम से वर्तकर सब गृहस्थों के सद्व्यवहारों को बढ़ाते हुए सदा आनन्द में बढ़ते जावें। जिस परमात्मा का यह ‘ओम्’ नाम है, उस की कृपा और अपने धर्मयुक्त पुरुषार्थ से हमारे शरीर मन और आत्मा का त्रिविध दुःख, जो कि अपने और दूसरे से होता है, नष्ट हो जावे और हम लोग प्रीति से एक-दूसरे के साथ वर्तके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि में सफल होके सदैव स्वयम् आनन्द में रहकर सब को आनन्द में रक्खें॥3॥





॥इति गृहाश्रमसंस्कारविधिः समाप्तः॥








[1]अक्षय इतना ही मात्र है कि जितना समय मुक्ति का है, उतने समय में दुःख का संयोग, जैसा विषयेन्द्रिय के संयोगजन्य सुख में होता है, वैसा नहीं होता।



[2]हे स्त्रीपुरुषो ! जैसे हम विद्वान् उपदेशक लोग (प्रातः) प्रभात वेला में (अग्निम्) स्वप्रकाशस्वरूप (प्रातः) (इन्द्रम्) परमैश्वर्य के दाता और परमैश्वर्ययुक्त, (प्रातः) (मित्रावरुणा) प्राण उदान के समान प्रिय और सर्वशक्तिमान्, (प्रातः) (अश्विना) सूर्य चन्द्र को जिस ने उत्पन्न किया है, उस परमात्मा की (हवामहे) स्तुति करते हैं, और (प्रातः) (भगम्) भजनीय सेवनीय ऐश्वर्ययुक्त, (पूषणम्) पुष्टिकर्त्ता, (ब्रह्मणस्पतिम्) अपने उपासक वेद और ब्रह्माण्ड के पालन करनेहारे, (प्रातः) (सोमम्) अन्तर्यामि प्रेरक (उत) और (रुद्रम्) पापियों को रुलानेहारे और सर्वरोगनाशक जगदीश्वर की (हुवेम) स्तुति-प्रार्थना करते हैं, वैसे प्रातः समय में तुम लोग भी किया करो॥1॥



[3](प्रातः) पांच घड़ी रात्रि रहे (जितम्) जयशील (भगम्) ऐश्वर्य के दाता, (उग्रम्) तेजस्वी, (अदितेः) अन्तरिक्ष के (पुत्रम्) पुत्ररूप सूर्य की उत्पत्ति करनेहारे, और (यः) जो कि सूर्यादि लोकों का (विधर्त्ता) विशेष करके धारण करनेहारा (आध्रः) सब ओर से धारणकर्ता, (यं चित्) जिस किसी का भी (मन्यमानः) जाननेहारा, (तुरश्चित्) दुष्टों को भी दण्डदाता, और (राजा) सब का प्रकाशक है, (यम्) जिस (भगम्) भजनीयस्वरूप को (चित्) भी (भक्षीति) इस प्रकार सेवन करता हूं, और इसी प्रकार भगवान् परमेश्वर सब को (आह) उपदेश करता है कि तुम, जो मैं सूर्यादि जगत् का बनाने और धारण करनेहारा हूं, उस=मेरी उपासना किया करो, और मेरी आज्ञा में चला करो, इस से (वयम्) हम लोग उस की (हुवेम) स्तुति करते हैं॥2॥



[4]हे (भग) भजनीयस्वरूप, (प्रणेतः) सब के उत्पादक, सत्याचार में प्रेरक, (भग) ऐश्वर्यप्रद (सत्यराधः) सत्य धन को देनेहारे, (भग) सत्याचरण करनेहारों को ऐश्वर्यदाता आप परमेश्वर ! (नः) हम को (इमाम्) इस (धियम्) प्रज्ञा को (ददत्) दीजिये, और उस के दान से हमारी (उदव) रक्षा कीजिये। हे (भग) आप (गोभिः) गाय आदि और (अश्वैः) घोड़े आदि उत्तम पशुओं के योग से राज्यश्री को (नः) हमारे लिये (प्रजनय) प्रकट कीजिये, हे (भग) आप की कृपा से हम लोग (नृभिः) उत्तम मनुष्यों से (नृवन्तः) बहुत वीर मनुष्यवाले (प्र स्याम) अच्छे प्रकार होवें॥3॥



[5]हे भगवन् ! आप की कृपा (उत) और अपने पुरुषार्थ से हम लोग (इदानीम्) इसी समय (प्रपित्वे) प्रकर्षता=उत्तमता की प्राप्ति में (उत) और (अह्नाम्) इन दिनों के (मध्ये) मध्य में (भगवन्तः) ऐश्वर्ययुक्त और शक्तिमान् (स्याम) होवें, (उत) और हे (मघवन्) परमपूजित असंख्य धन देनेहारे ! (सूर्यस्य) सूर्यलोक के (उदिता) उदय में (देवानाम्) पूर्ण विद्वान् धार्मिक आप्त लोगों की (सुमतौ) अच्छी उत्तम प्रज्ञा (उत) और सुमति में (वयम्) हम लोग (स्याम) सदा प्रवृत्त रहें॥4॥



[6]हे (भग) सकलैश्वर्यसम्पन्न जगदीश्वर ! जिस से (तम्) उस (त्वा) आप की (सर्वः) सब सज्जन (इज्जोहवीति) निश्चय करके प्रशंसा करते हैं, (सः) सो आप हे (भग) ऐश्वर्यप्रद ! (इह) इस संसार और (नः) हमारे गृहाश्रम में (पुर एता) अग्रगामी और आगे-आगे सत्यकर्मों में बढ़ानेहारे (भव) हूजिए; और जिस से (भग एव) सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त और समस्त ऐश्वर्य के दाता होने से आप ही हमारे (भगवान्) पूजनीय देव (अस्तु) हूजिए, (तेन) उसी हेतु से (देवाः वयम्) हम विद्वान् लोग (भगवन्तः) सकलैश्वर्यसम्पन्न होके सब संसार के उपकार में तन, मन, धन से प्रवृत्त (स्याम) होवें॥5॥



[7]किसी विशेष कारण से स्त्री वा पुरुष अग्निहोत्र के समय दोनों साथ उपस्थित न हो सकें तो एक ही स्त्री वा पुरुष दोनों की ओर का कृत्य कर लेवे अर्थात् एक-एक मन्त्र को दो-दो बार पढ़के दो-दो आहुति करे।



[8]धर्म नाम न्यायाचरण। न्याय नाम पक्षपात छोड़के वर्त्तना। पक्षपात छोड़ना नाम सर्वदा अहिंसादि निर्वैरता सत्यभाषणादि में स्थिर रह कर, हिंसा-द्वेषादि और मिथ्याभाषणादि से सदा पृथक् रहना, सब मनुष्यों का यही एक धर्म है। किन्तु जो-जो धर्म के लक्षण वर्ण-कर्मों में पृथक्-पृथक् आते हैं, इसी से चार वर्ण पृथक्-पृथक् गिने जाते हैं।



[9]सवा रुपये सैकड़े से अधिक, चार आने से न्यून ब्याज न लेवे न देवे। जब दूना धन आ जाये उससे आगे कौड़ी न लेवे न देवे। जितना न्यून ब्याज लेवेगा, उतना ही उसका धन बढ़ेगा और कभी धन का नाश और कुसन्तान उसके कुल में न होंगे।