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स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः॥५४॥

In Hindi:

पदपाठ : स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणाम् प्रत्याहारः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथ कः प्रत्याहार:—

भूमिका हिंदी अर्थ : (अथ) प्राणायाम के पश्चात् (प्रत्याहारः) प्रत्याहार (कः) क्या है ? इसको कहते हैं —

हिंदी में अर्थ : (इन्द्रियाणाम्) नेत्रादि इन्द्रियों का, (स्वविषयासम्प्रयोगे) अपने-अपने रूपादि विषयों के साथ संयोग = सम्बन्ध न होने पर (चित्तस्वरूपानुकार इव) चित्त के स्वरूप के अनुरूप हो जाना ही (प्रत्याहारः) प्रत्याहार है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : “यदा चित्तं जितं भवति, परमेश्वरस्मरणालम्बनाद्विषयान्तरे नैव गच्छति, तदेन्द्रियाणां प्रत्याहारोऽर्थान्निरोधो भवति। कस्य केषामिव? यथा चित्तं परमेश्वरस्वरूपस्थं भवति तथैवेन्द्रियाण्यप्यर्थाच्चित्ते जिते सर्वमिन्द्रियादिकं जितं भवतीति विज्ञेयम्।” (ऋ० भू॰ उपासना॰)

संस्कृत का भावार्थ — जब चित्त जीत लिया जाता है अर्थात् परमेश्वर के स्मरण रूपी आलम्बन से अन्य विषयों में नहीं जाता, तब इन्द्रियों का प्रत्याहार अर्थात् निरोध होता है। किसका किसमें जैसा ? जैसे चित्त परमेश्वर के स्वरूप में स्थित होता है वैसे ही इन्द्रियाँ भी होती हैं। अर्थात् चित्त के जीत लेने पर सभी इन्द्रियाँ आदि जीत ली जाती हैं, ऐसा जानना चाहिए॥ (लेखक)

(स्वविषया॰) प्रत्याहार उसका नाम है कि जब पुरुष अपने मन को जीत लेता है। तब इन्द्रियों का जीतना अपने आप हो जाता है। क्योंकि मन ही इन्द्रियों का चलाने वाला है। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

प्राचीन ॠषि भाष्य : स्वविषयसम्प्रयोगाभावे चित्तस्वरूपानुकार इवेति चित्तनिरोधे चित्तवन्निरुद्धानीन्द्रियाणि नेतरेन्द्रिय- जयवदुपायान्तरमपेक्षन्ते। यथा मधुकरराजं मक्षिका उत्पतन्तमनूत्पतन्ति निविशमानमनुनिविशन्ते तथेन्द्रियाणि चित्तनिरोधे निरुद्धानीत्येष प्रत्याहारः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (स्वविषयसम्प्रयोगाभावे) इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों के साथ संयोग = सन्निकर्ष के न रहने पर, वे (चित्तस्वरूपानुकार इव) चित्त के स्वरूप के अनुरूप ही (इति) हो जाती हैं। अर्थात् (चित्तनिरोधे) चित्त के निरुद्ध होने पर (चित्तवत्) चित्त के समान (इन्द्रियाणि निरुद्धानि) इन्द्रियाँ भी निरुद्ध हो जाती है। (इतरेन्द्रियजयवत्) एक इन्द्रियजय के समान, दूसरी इन्द्रियों को जीतने के लिए (उपायान्तरम्) अन्य उपाय की (न अपेक्षन्ते) अपेक्षा नहीं रहती। (यथा) जैसे (मक्षिकाः) मधुमक्खियाँ (मधुकरराजम्) मधुकरराज = राजा के (उत्पतन्तम्) उड़ने पर (अनूत्पतन्ति) पीछे-पीछे उड़ जाती हैं, और (निविशमानम्) बैठते हुए उस राजा के साथ (अनुनिविशन्ते) पीछे जाकर बैठ जाती हैं, (तथा) वैसे ही (इन्द्रियाणि) इन्द्रियाँ भी (चित्तनिरोधे) चित्त के निरुद्ध होने पर (निरुद्धानि) निरुद्ध हो जाती हैं; (इति एषः प्रत्याहारः) यह प्रत्याहार है॥

वैदिक वृत्ति : प्रत्याहार का शाब्दिक अर्थ है — प्रति = विपरीत, आहार = विषय अर्थात् इन्द्रियों को विषय का ग्रहण न करके लौटा देना; और यह स्थिति मनोनियन्त्रण के बिना सम्भव नहीं होती।

श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसन और घ्राण पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, और इनके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच विषय हैं। ये पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषय का ग्रहण करती हैं। चित्त का सम्बन्ध जिस ज्ञानेन्द्रिय से होता है वही इन्द्रिय अपने विषय को ग्रहण कर चित्त में उपलब्ध कराती है। चित्त की गति अत्यधिक होने से मनुष्य को ऐसा प्रतीत होता है कि वह सभी इन्द्रियों से एक साथ सम्बद्ध हो रहा है, जिससे सभी इन्द्रियाँ एक साथ अपने-अपने विषय को ग्रहण कर रही हैं। वस्तुतः चित्त का सम्बन्ध एक समय में एक ही इन्द्रिय से होता है; और वही इन्द्रिय, उस काल में, अपने विषय को ग्रहण करती है। अतः कार्यरत एक इन्द्रिय के काल में अन्य इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय को ग्रहण नहीं करतीं, वे उस काल में वस्तुतः चित्त के स्वरूप का अनुकरण करती हैं। परन्तु मन = चित्त की गति अत्यधिक तीव्र होने के कारण, इन्द्रियों का इस प्रकार से हुआ निरोध, पुरुष को अनुभव में नहीं आता।

वृत्तिनिरोध हेतु साधक को सर्वप्रथम बाह्यजगत् में उपलब्ध विषयों के प्रति तृष्णा रहित होना होता है, इन बाह्य विषयों से संयोग = सम्बन्ध का प्रत्यक्ष साधन ज्ञानेन्द्रियाँ ही हैं। अतः इन इन्द्रियाँ का निरोध करना किसी भी साधक के लिए परमावश्यक है। जब नेत्रादि इन्द्रियाँ बाह्य रूप आदि विषयों से विमुख होकर चित्त के स्वरूप का अनुकरण करती हैं तो इसे प्रत्याहार कहते हैं।

इन्द्रियाँ, विषयों के साथ संयोग का प्रत्यक्ष साधन होते हुए भी, मन = चित्त से ही नियन्त्रित रहती हैं। अतः महर्षि दयानन्द कहते हैं कि “जब पुरुष अपने मन को जीत लेता है, तब इन्द्रियों को जीतना अपने आप हो जाता है, क्योंकि मन ही इन्द्रियों को चलाने वाला है।”

इसी तथ्य को महर्षि व्यास भी कहते हैं कि चित्त का निरोध होने पर इन्द्रियाँ भी निरुद्ध हो जाती हैं, अर्थात् अपने-अपने विषय को ग्रहण नहीं करती। इसमें उदाहरण देते हुए कहा है कि — जैसे मधुमक्खियाँ अपने राजा के अनुसार कार्य करती हैं, जहाँ से वह उड़ता है, उसके पीछे-पीछे सभी मक्खियाँ उड़ जाती हैं; और जहाँ वह बैठता है, उसके पीछे-पीछे सभी मक्खियाँ बैठ जाती हैं। इसी प्रकार इन्द्रियाँ भी चित्त का अनुसरण करती हैं।

ज्ञानेन्द्रियाँ केवल बाह्यविषयों को ग्रहण कर चित्त तक पहुँचाती हैं, वे आन्तरिक विषयों को ग्रहण करने में असमर्थ हैं; दूसरी ओर चित्त बाह्य और आन्तरिक दोनों विषयों को ग्रहण करने वाला है। चित्त ही इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किए हुए विषयों को पुरुष = आत्मा को उपलब्ध कराता है। चित्त जब बाह्यविषयों से निरुद्ध होकर आन्तरिक विषयों को ग्रहण करता है, तो परिणामस्वरूप बाह्यविषयों का आलम्बन न होने से, बाह्यविषयों को ग्रहण करने वाली इन्द्रियाँ भी निरुद्ध हो जाती हैं। इसी तथ्य को महर्षि दयानन्द इस सूत्र पर संस्कृत भाषा में इस प्रकार कहते हैं — “जब चित्त जीत लिया जाता है अर्थात् परमेश्वर के स्मरण रूपी आलम्बन से अन्य विषयों में नहीं जाता, तब इन्द्रियों का प्रत्याहार अर्थात् निरोध होता है ......।” जब चित्त आन्तरिक विषयों में आत्मा और परमात्मा के स्वरूप का चिन्तन करता हुआ, बाह्यविषयों से विमुख रहता है, तो इन्द्रियाँ स्वतः ही निरुद्ध हो जाती हैं। क्यों ? क्योंकि ये आन्तरिक विषय इन्द्रियों द्वारा ग्रहण नहीं होते। चित्त द्वारा विषयान्तर, अर्थात् बाह्यविषयों की ओर उन्मुख, न होने से ही इन्द्रियों का निरोध हो जाता है।

प्रत्याहार की सिद्धि हेतु अपर वैराग्य का पालन करना परम आवश्यक है। दृष्ट और आनुश्रविक विषयों के प्रति तृष्णा का न होना ही वैराग्य है। बाह्य दृष्ट और आनुश्रविक विषयों में राग = आसक्ति = तृष्णा के होने पर चित्त का, और उसका अनुसरण करने वाली इन्द्रियों का, इनसे विमुख होना सम्भव नहीं हो सकता।

प्रत्याहार की सिद्धि के होने पर ही योग के आन्तरिक अङ्गों — धारणा, ध्यान और समाधि की सिद्धि निर्भर करती है। साधक की आन्तरिक साधना प्रत्याहार की स्थिति की प्राप्ति के बाद ही वास्तविक रूप से आरम्भ होती है। प्रत्याहार पर्यन्त अङ्गों को योग में बाह्य-अङ्ग ही माना है। अतः प्रत्याहार की सिद्धि का कारण ब्रह्मविद्या का श्रवण, वेदादि सत्यशास्त्रों का पठन तथा अपरवैराग्य के पालन, आदि को मुख्य रूप से जानना चाहिए। इस प्रकार चित्त पर नियन्त्रण करके ही इन्द्रियों का निरोध किया जा सकता है।

“प्रत्याहारेण संसर्गान्” मनु॰ ६.७२ पर अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द कहते हैं — “प्रत्याहार से संग से हुए दोषों को छुड़ा कर ......” अर्थात् बाह्यविषयों के संग से हुए दोषों को छुड़ाकर .... ईश्वर के गुणों को धारण कर, सब दोषों को भस्म कर देवे। वेदमन्त्रों में अन्तः एवं बाह्य करणों की सबलता, निर्दोषता और पवित्रता को प्रत्यहार का प्रमुख साधन कहा है, क्योंकि उपरोक्त प्रकार से संग दोषों से रहित सबल, निर्दोष और पवित्र इन्द्रियों और अन्तःकरण वाला साधक ही हेय संसार में आसक्ति रहित हो पाता है। वेद में जहाँ-जहाँ इन्द्रियों को बलवती बनाने का आदेश है, वहाँ-वहाँ उन्हें पवित्रता की ओर ले जाने के लिए सम्पूर्ण चरित्र को शुद्ध करने का भी आदेश है।

अतः इस प्रकार से संगदोषों को दूर करने हेतु, चित्त का निरोध कर, इन्द्रियों को बाह्य विषयों से विमुख करके ही, इन्द्रियों को जीतना चाहिए।