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ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्॥५५॥

In Hindi:

पदपाठ : ततः परमा वश्यता इन्द्रियाणाम्॥

हिंदी में अर्थ : (ततः) प्रत्याहार की सिद्धि होने से (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियों की (परमा) उत्कृष्ट = सर्वोत्कृष्ट (वश्यता) वश्यता = वशीकारता हो जाती है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : ततस्तदन्तरं स्वस्वविषयासम्प्रयोगेऽर्थात् स्वस्वविषयनिवृत्तौ सत्यामिन्द्रियाणां परमा वश्यता यथावद् विजयो जायते स उपासको यदायदेश्वरोपासनं कर्त्तुं प्रवर्तते तदा तदैव चित्तस्येन्द्रियाणाञ्च वश्यत्वं कर्त्तुं शक्नोति॥ (ऋ० भू॰ उपासना॰)

संस्कृत का भावार्थ — तत्पश्चात् अपने-अपने विषय के संयोग न होने पर, अर्थात् अपने-अपने विषयों की निवृत्ति होने पर, इन्द्रियों की परम वशीकारता अर्थात् विधिवत् विजय हो जाती है। वह उपासक जब-जब ईश्वर की उपासना करने में प्रवृत्त होता है, तब-तब चित्त और इन्द्रियों को अपने वश में कर सकता है। (लेखक)

(ततः पर०) जब वह मनुष्य जितेन्द्रिय होके जहाँ अपने मन को ठहराना वा चलाना चाहे, उसी में ठहरा और चला सकता है और फिर उसको ज्ञान हो जाने से सदा सत्य में प्रीति हो जाती है और असत्य में कभी नहीं। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

प्राचीन ॠषि भाष्य : शब्दादिष्वव्यसनमिन्द्रियजय इति केचित्। सक्तिर्व्यसनं व्यस्यत्येनं श्रेयस इति। अविरुद्धा प्रतिपत्तिर्न्याय्या। शब्दादिसम्प्रयोगः स्वेच्छयेत्यन्ये। रागद्वेषाभावे सुखदुःखशून्यं शब्दादिज्ञानमिन्द्रियजय इति केचित् चित्तैकाग्र्यादप्रतिपत्तिरेवेति जैगीषव्यः। ततश्च परमा त्वियं वश्यता यच्चित्तनिरोधे निरुद्धानीन्द्रियाणि नेतरेन्द्रियजयवत्प्रयत्नकृतमुपायान्तरमपेक्षन्ते योगिन इति॥

इति पातञ्जलयोगसूत्रे व्यासभाष्ये साधनपादः द्वितीयः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (१) इन्द्रियों का (शब्दादिषु) शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श — इन विषयों में (अव्यसनम्) अव्यसन = आसक्ति न होना और न फँसना (इन्द्रियजयः) इन्द्रियजय है; (इति) इस प्रकार (केचित्) कुछ विद्वान् = आचार्य मानते हैं। यहाँ व्यसन क्या है ? इसको कहते हैं — (सक्तिः व्यसनम्) आसक्ति ही व्यसन है। क्योंकि (एनम्) जो प्राणी को (श्रेयसः) श्रेयस = कल्याण से (व्यस्यति) दूर कर देता है, (इति) यह व्यसन है। और (अविरुद्धा) शास्त्रों के अनुकूल (प्रतिपत्तिः) विषयों की प्राप्ति = भोग करना (न्याय्या) न्याययुक्त = उचित है। (यह व्यसन नहीं माना गया और यह इन्द्रियजय है।)

(२) (स्वेच्छया) स्वेच्छा से = भोगों के वशीभूत न होकर (शब्दादिसम्प्रयोगः) इन्द्रियों का शब्दादि विषयों से संयोग होना इन्द्रियजय है, (इति अन्ये) ऐसा अन्य विद्वान् कहते हैं।

(३) (रागद्वेषाभावे) राग और द्वेष के अभावपूर्वक, (सुखदुःखशून्यम्) सुख-दुःख रहित होकर (शब्दादिज्ञानम्) शब्दादि विषयों का ज्ञान करना = अनुभव करना (इन्द्रियजयः) इन्द्रियजय है, (इति) इस प्रकार (केचित्) कुछ विद्वान् मानते हैं।

(४) (चित्तैकाग्र्यात्) चित्त की एकाग्रता के होने से (अप्रतिपत्तिः) शब्दादि विषयों में इन्द्रियों की प्रवृत्ति न होना (एव) ही इन्द्रिय-वश्यता अर्थात् इन्द्रियजय है, (इति) ऐसा (जैगीषव्यः) ऋषि जैगीषव्य का मत है।

(च) और (ततः) उन तीन प्रकार के इन्द्रियजय से (इयम् वश्यता) यह चतुर्थ प्रकार की इन्द्रिय-वश्यता (तु) तो (परमा) सर्वोत्कृष्ट है (यत्) जोकि (चित्तनिरोधे) चित्त के निरोध होने पर (इन्द्रियाणि) इन्द्रियाँ भी (निरुद्धानि) निरुद्ध हो जाती है। इसमें (योगिनः) योगी लोग (इतरेन्द्रियजयवत्) अन्य इन्द्रियों के जय के समान (प्रयत्नकृतम्) प्रयत्न से किए जाने वाले (उपायान्तरम्) अन्य उपायों की (न अपेक्षन्ते इति) अपेक्षा नहीं रखते॥

वैदिक वृत्ति : प्रत्याहार का अभ्यास करने से, साधक का, इन्द्रियों पर सर्वोत्कृष्ट वश्यता = वशीकारता = नियन्त्रण हो जाता है। अर्थात् ऐसा साधक जितेन्द्रिय हुआ जहाँ भी अपने मन को ठहराना अथवा चलाना चाहे, वहाँ वह अपनी इच्छानुसार ठहरा वा चला सकता है। महर्षि दयानन्द इसको स्पष्ट करते हुए संस्कृत में लिखते हैं — इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों से निवृत्त हो जाने पर इन्द्रियजय की स्थिति की प्राप्ति होती है, और ऐसा उपासक जब-जब चित्त को आन्तरिक विषयों अर्थात् आत्मा और परमात्मा की ओर लगाना चाहता है तब-तब वह ऐसा करने में समर्थ होता है। अतः आन्तरिक साधना हेतु इन्द्रियजय की स्थिति की प्राप्ति होना परम आवश्यक है, अन्यथा साधक आगे की साधना अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि को प्राप्त नहीं कर सकता।

यह इन्द्रियजय की स्थिति क्या है ? इस पर विभिन्न आचार्यों = विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत रहे हैं, जो कि निम्न प्रकार है —

१. किन्हीं आचार्यों के अनुसार इन्द्रियों का शब्दादि विषयों में व्यसन अर्थात् आसक्ति का न होना ही इन्द्रियजय है। यहाँ व्यसन से अभिप्राय उस आसक्ति से है जो प्राणी को श्रेयस = कल्याण के पथ से दूर कर देती है। अर्थात् यदि पुरुष शास्त्रानुकूल शब्दादि विषयों को प्राप्त करता और भोगता है तो इसमें दोष नहीं और यह इन्द्रियजय में बाधक नहीं है।

२. कुछ आचार्य ऐसा मानते हैं कि भोगों के वश में न होकर, बल्कि स्वेच्छा से = स्वतन्त्रतापूर्वक व्यक्ति जब इन्द्रियों को शब्दादि विषयों में लगाता है तो यह इन्द्रियजय है। अर्थात् जब भी वह विषयों को अपनी इच्छा से प्राप्त करना चाहे, तभी करें अन्यथा नहीं।

३. अन्य कुछ विद्वान् ऐसा भी मानते हैं कि व्यक्ति राग और द्वेष से रहित होकर, सुख-दुःख से भी रहित होकर शब्दादि विषयों का ज्ञान प्राप्त करता है तो यह इन्द्रियजय है। अर्थात् यदि व्यक्ति राग-द्वेष से युक्त है, अथवा विषयों की प्राप्ति होने पर सुख-दुःख का अनुभव करता है, तो यह इन्द्रियजय नहीं है।

४. किसी प्राचीन ऋषि जैगीषव्य ने भी महर्षि पतञ्जलि की भावना के अनुकूल ही कहा है कि “चित्त की एकाग्रता से शब्दादि विषयों में इन्द्रियों की प्रवृत्ति न होना ही इन्द्रियजय है।” और यही मत महर्षि व्यास को भी स्वीकार्य है।

वस्तुतः पहले के तीनों मतों में चाहे आसक्ति रहित होकर, चाहे स्वेच्छा पूर्वक, चाहे राग-द्वेष रहित होकर इन्द्रियों को शब्दादि विषयों में लगाया जाता है; और ऐसा होने से बाह्य विषयों की प्राप्ति चित्त में होगी ही और इस प्रकार वृत्ति-निरोध नहीं होगा। ऐसे में साधक एक विषयता = एकाग्रता और निरुद्धावस्था की प्राप्ति में समर्थ नहीं हो पायेगा। और फिर इस प्रकार विषयों की प्राप्ति चाहे वर्त्तमान में दुःखों को प्राप्त न भी कराए; परन्तु परिणाम, ताप और संस्कार दुःखों की प्राप्ति तो पुरुष को परिणामस्वरूप होगी ही।१ परिणामस्वरूप चित्त में वैसे संस्कारों की प्रबलता से पुरुष के लिए संसारचक्र चालू रहेगा ही। अतः ये तीनों ही स्थितियाँ साधक के लिए इन्द्रियजय की स्थितियाँ नहीं हैं। हाँ, व्युत्थान काल में सामान्य मनुष्य और साधक के लिए भी उत्कृष्ट स्थितियाँ हैं। अतः साधक को चित्त के निरोध पूर्वक इन्द्रियजय की स्थिति को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।

॥इति सतीशार्यविरचितायां पातञ्जलयोगसूत्रव्यासभाष्यराजमार्तण्डवृत्तिव्याख्यायां

वैदिकयोगमीमांसायां साधनपादः द्वितीयः॥