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प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्॥१९॥

In Hindi:

पदपाठ : प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्॥

हिंदी में अर्थ : (प्रत्ययस्य) दूसरे पुरुष के ज्ञान = चित्तवृत्ति में संयम करने से (परचित्तज्ञानम्) योगी को दूसरे के चित्त का ज्ञान होता है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : प्रत्यये संयमात्प्रत्ययस्य साक्षात्करणात्ततः परचित्तज्ञानम्॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (प्रत्यये) प्रत्यय = दूसरे पुरुष के ज्ञान = चित्त वृत्ति में (संयमात्) संयम करने से (प्रत्ययस्य) दूसरे के ज्ञान = चित्तवृत्ति का (साक्षात्करणात्) साक्षात्कार होने से (ततः) उस साक्षात्कार होने के परिणामस्वरूप (परचित्तज्ञानम्) योगी को दूसरे पुरुष के चित्त का ज्ञान होता है॥

वैदिक वृत्ति : जब योगी किसी दूसरे पुरुष के ज्ञान अर्थात् उसकी वृत्तियों में संयम करता है, तो वह उन वृत्तियों का साक्षात्कार करता हुआ = उन्हें सम्यक् रूप से जानता हुआ, उस पुरुष के चित्त का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, कि इस दूसरे पुरुष का चित्त कैसा है? चित्त की पाँच अवस्थाएँ हैं — क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध। योगी दूसरे पुरुष की वृत्तियों में संयम द्वारा यह जान लेता है कि इस पुरुष के चित्त की कौन सी अवस्था है, और उस अवस्था में कौन सी वृत्तियाँ प्रबल अवस्था में = प्रधान रूप से कार्यरत है और कौन सी वृत्तियाँ गौण अवस्था वाली हैं।

यहाँ भोज ने कहा है कि दूसरे पुरुष की मुख की आकृति और रागादि को देखकर उसमें संयम करता हुआ योगी दूसरे पुरुष के चित्त की राग युक्त अथवा रागरहित अवस्था का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार योगी वृत्तियों में संयम करता हुआ यह जान लेता है कि दूसरे पुरुष का चित्त राग, द्वेष, मोह, अंहकार, क्रोध, ईर्ष्या, अधर्म आदि युक्त है अथवा मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा, ज्ञान, वैराग्य, धर्म आदि युक्त है। परन्तु इस सभी अवस्था का ज्ञान एक सीमा तक ही सम्भव है, जिसका स्पष्टीकरण अगले सूत्र में किया गया है।

इस में यह जानना चाहिए कि योगी उन्हीं पुरुषों के चित्त का ज्ञान प्राप्त करता है जिनकी वृत्तियों, मुखादि आकृतियों में संयम करता है; अन्य पुरुषों के चित्त का ज्ञान नहीं हो सकता।