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Atharvaveda / 20 / 124 / 5

आ॑दि॒त्यैरिन्द्रः॒ सग॑णो म॒रुद्भि॑र॒स्माकं॑ भूत्ववि॒ता त॒नूना॑म्। ह॒त्वाय॑ दे॒वा असु॑रा॒न्यदाय॑न्दे॒वा दे॑व॒त्वम॑भि॒रक्ष॑माणाः ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 124 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : वामदेवः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : आ॒दि॒त्यै: । इन्द्र॑: । सऽग॑ण: । म॒रुत्ऽभि॑: । अ॒स्माक॑म् । भू॒तु॒ । अ॒वि॒ता । त॒नूना॑म् ॥ ह॒त्वाय॑ । दे॒वा: । असु॑रान् । यत् । आय॑न् । दे॒वा: । दे॒व॒ऽत्वम् । अ॒भि॒ऽरक्ष॑माणा: ॥१२४.५॥

पदार्थ : (सगणः) गणों [सुभट वीरों] के साथ वर्तमान (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला सभापति] (आदित्यैः) अखण्ड व्रतधारी (मरुद्भिः) शूर मनुष्यों के साथ (अस्माकम्) हमारे (तनूनाम्) शरीरों का (अविता) रक्षक (भूतु) होवें। (यत्) क्योंकि (असुरान्) असुरों [दुराचारियों] को (हत्वाय) मारकर (देवाः) विजय चाहनेवाले, (अभिरक्षमाणाः) सब ओर से रक्षा करते हुए (देवाः) विद्वानों ने (देवत्वम्) देवतापन [उत्तम पद] (आयन्) पाया है ॥॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४-६−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अथ० ६३।१-३ ॥