Rigveda / 5 / 5 / 6
सु॒प्रती॑के वयो॒वृधा॑ य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑ मा॒तरा॑। दो॒षामु॒षास॑मीमहे ॥६॥
Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 5 | Mantra No : 6
In English:
Seer : vasushruta aatreyaH | Devta : aapriyaH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : supratiike vayovRRidhaa yahvii RRItasya maataraa. doShaamuShaasamiimahe .6.
Component Words : supratiike iti su.apratiike. vayaH.avRRidhaa. yahvii iti. RRItasya. maataraa. doShaam. uShasam. iimahe .6.
In Hindi:
ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥
पदपाठ : सु॒प्रती॑के॒ इति॑ सु॒ऽप्रती॑के। व॒यः॒ऽवृधा॑। य॒ह्वी इति॑। ऋ॒तस्य॑। मा॒तरा॑। दो॒षाम्। उ॒षस॑म्। ई॒म॒हे॒ ॥६॥
पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (सुप्रतीके) उत्तम विश्वास करने (वयोवृधा) सुन्दर जीवन को बढ़ाने और (यह्वी) बड़े (ऋतस्य) सत्य के (मातरा) आदर देनेवाले (दोषाम्) रात्रि और (उषासम्) दिन की (ईमहे) याचना करते हैं, वैसे इन की आप लोग भी याचना करो ॥६॥
भावार्थ : जैसे रात्रि और दिन एक साथ ही वर्त्तमान हैं, वैसे ही जिन्होंने विवाह किया, ऐसे स्त्री पुरुष वर्त्ताव करें ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : सु॒प्रती॑के॒ इति॑ सु॒ऽप्रती॑के। व॒यः॒ऽवृधा॑। य॒ह्वी इति॑। ऋ॒तस्य॑। मा॒तरा॑। दो॒षाम्। उ॒षस॑म्। ई॒म॒हे॒ ॥६॥
पदार्थ : (सुप्रतीके) सुष्ठु प्रतीतिकरे (वयोवृधा) ये वयः कमनीयं जीवनं वर्धयतः (यह्वी) महत्यौ (ऋतस्य) सत्यस्य (मातरा) मान्यप्रदे (दोषाम्) रात्रीम् (उषासम्) दिनम्। अत्रान्येषामपीति दीर्घः। (ईमहे) याचामहे ॥६॥
अन्वय : हे मनुष्या ! यथा वयं सुप्रतीके वयोवृधा यह्वी ऋतस्य मातरा दोषामुषासमीमहे तथैते यूयमपि याचध्वम् ॥६॥
भावार्थ : यथा रात्रिदिने सहैव वर्त्तेते तथैव कृतविवाहौ स्त्रीपुरुषौ वर्त्तेयाताम् ॥६॥