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Rigveda / 5 / 5 / 7

वात॑स्य॒ पत्म॑न्नीळि॒ता दैव्या॒ होता॑रा॒ मनु॑षः। इ॒मं नो॑ य॒ज्ञमा ग॑तम् ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 5 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : आप्रियः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : वात॑स्य। पत्म॑न्। ई॒ळि॒ता। दैव्या॑। होता॑रा। मनु॑षः। इ॒मम्। नः॒। य॒ज्ञम्। आ। ग॒त॒म् ॥७॥

पदार्थ : हे (ईळिता) प्रशंसित (दैव्या) श्रेष्ठ गुणों में उत्पन्न (होतारा) दाता जनो ! आप दोनों (वातस्य) वायु के (पत्मन्) गिरते हैं जिसमें उस मार्ग में (नः) हम लोगों के (इमम्) इस (यज्ञम्) मिलने योग्य व्यवहार को (मनुषः) और मनुष्यों को (आ, गतम्) प्राप्त होवें ॥७॥

भावार्थ : हे स्त्री-पुरुषो ! आप दोनों धर्म्मसम्बन्धी कर्म्म के आचरण से प्रशंसित होकर इस गृहाश्रमव्यवहार को सिद्ध करो ॥७॥